रविवार, 31 अक्टूबर 2021

मोबाइल से दुर्घटना

आज का समय मोबाइल के चारों तरफ घूमता है...टिक-टिक करती हुई घड़ी के समान।हम चाहें या न चाहें...मोबाइल से हमें जुड़ना ही पड़ता है।अब तो शायद ही किसी के घर लैंडलाइन वाला फोन होगा...जो अपनी बेसुरी आवाज ट्रींग-ट्रींग के लिए मशहूर था,तारों से लिपटा हुआ प्लास्टिक का डब्बा,यही थी लैंडलाइन की पहचान।

आज की सुबह मुझे पता चला कि बस से उतरते समय अपने मोबाइल पर वाट्स एप मैसेज चेक करते समय...एक मोटरसाइकिल वाले ने मेरी मौसी को जोरदार टक्कर मारकर,जख्मी कर दिया।उनका सिर फट गया और टांके भी लगे।हम सब सुनकर तो अवाक रह गए...बहुत दुख हो रहा था।मौसी को वैसे ही शुगर की बीमारी है ऊपर से ये कष्ट।भगवान से प्रार्थना है कि उनको जल्द ठीक कर दें।

मोबाइल जहां वरदान है,वहीं ये अभिशाप भी है।हम अक्सर न्यूजपेपर में भी पढ़ते हैं कि मोबाइल पर गेम खेलते हुए या मोबाइल पर बात करने के कारण हुई दुर्घटना,इयर फोन कान में लगाकर मोबाइल से बात करने के दौरान ट्रेन से कटकर मौत....इन खबरों से भरा रहता है अखबार,पर हम ही नजरअंदाज कर देते हैं।याद रखें...सावधानी ही बचाव है।


रेसिपी
कल मैंने आपसे वादा किया था कि मैं आज आपसे " आलू की चटनी " की रेसिपी शेयर करूंगी....तो हाजिर हूँ...
सबसे पहले आलू को उबाल लें,फिर हाथों से उसे अच्छी तरह तोड़कर मसल लें....
सूखी कढ़ाई में दो चम्मच पीला सरसों और एक चम्मच पचफोड़न को भूने और दरदरा पीस लें।उसके बाद इसे आलू में अच्छी तरह मिला लें।फिर नमक,हरी मिर्च,हल्दी और एक चम्मच लहसून को आलू में मिला लें।उसके बाद कढ़ाई में सरसो का तेल खूब गर्म कर लें...फिर इसमें हींग,करी पत्ता(अगर हो तो)डाले और जब कड़कड़ाने लगे तो इसमें तैयार आलू डालकर खूब भूजे।जब लगे कि अच्छी तरह भून गया है तो गैस पर से उतार लें....लो बन गयी " आलू की चटनी "....खूब खाएं चटखारे लेकर।सबसे अच्छी बात ये चटनी फ्रिज में एक सप्ताह तक बिना खराब हुए रह सकती है।

बाजार गुलजार है---

दिवाली और छठ महापर्व ने बढ़ाई सुंदरता---







शॉपिंग तो रोज होगी....जिसकी फोटो मैं आपसे जरूर शेयर करूंगी और अपने अनुभव भी बताऊंगी।वैसे अभी तक की शॉपिंग का अनुभव बहुत अच्छा नहीं रहा....हमें अपनी पसंद का सामान नहीं मिला।एक होलसेल वाले कपड़े के दुकान का अनुभव तो बहुत ही खराब रहा...मूड ऑफ हो गया,कहने को बहुत बड़ा दुकान,जहां हर तरह का कपड़ा(रेडिमेड भी)मिलता है....पर क्वालीटि एकदम बकवास थी।पुराना और आउट डेटेड माल दिखा रहा था।मेरे भाई का मूड बहुत खराब हो गया....

अगर कपड़ों की कोई अच्छी दुकान हो,तो कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं....लेकिन हां...वहां क्वालीटि अच्छी होनी चाहिए।

आज के लिए बस इतना ही....कल फिर मिलते हैं....

----- अनुगुंजा






 

शनिवार, 30 अक्टूबर 2021

मस्त छोला-भटुरा

 

मैंने आपको अपने कल के ब्लॉग में बताया था कि हम शॉपिंग करने जाने वाले हैं।सबसे अच्छी बात रही कि मैंने भाई का गुम हुआ छोटा वाला आईना आज खोज दिया था....तो भाई अपने वादे के अनुसार समोसा खिलाने वाला था पर खिलाया " छोले-भटुरे "....वो भी बहुत अच्छे रेस्टोरेंट का,बहुत टेस्टी था।फोटो देखकर मुँह में तो पानी आ ही गया होगा...है...न...

असल में शॉपिंग करते करते हम दोनों भाई-बहन को बहुत भूख लग गई थी....सो भाई ने फोन कर मम्मी को बोल दिया कि हमारा खाना न बनाए....और हमने मस्त वाला " छोला-भटुरा " खाया।

इधर मम्मी ने तब तक हमारे लिए मसाले वाली चने की दाल,आलू का चोखा,परवल की सब्जी,चावल और....."आलू की चटनी "....सही सुना आपने "आलू की चटनी" बना लिया था।हम सबका फेवरेट है आलू की चटनी....मेरी बहन महिमा को तो ये बहुत पसंद है...,ये होता ही इतना टेस्टी है कि क्या कहें....आप इसके साथ सिर्फ चावल दाल बड़े आराम से खा सकते हैं।पर अफसोस आज हमने ये नहीं खाया...क्योंकि हमने जमकर छोला भटुरा जो खाया था।आलू की चटनी का पहले फोटो देखे.....

इसकी रेसिपी मैं कल के ब्लॉग में बताऊंगी....आज फोटो से ही संतोष करें।
कल मैंने बताया था कि हमारे बॉक्स रूम की सफाई के लिए मुखियाइन(मामी की काम वाली बाई) का बेटा आने वाला था....तो बेचारा दुनिया का सबसे बिजी बंदा आया,और बोला कि आपका काम एक-दो घंटे का है,इसलिए वो शाम को आकर कर देगा...तबतक वो दिनभर वाला काम दूसरे के यहां कर लेगा।शाम को वो आया और एक घंटा भी काम नहीं किया...और ले गया 150 रूपये।वाह !!!!! पक्का प्रोफेशनल निकला....
आज रात मम्मी रोटी,चना का दाल और आलू का चोखा बनाएंगी या खिचड़ी भी बना सकती है,क्योंकि शनिवार है....देखते हैं....
बाजार में बहुत ज्यादा भीड़ है....कल बहुत सी फोटो शेयर करूंगी....कल भी शॉपिंग पर भाई के साथ जाना है....अभी शाम की चाय हमारी हो गई है...खिड़की बंद कर ली है,क्योंकि बहुत मच्छर आ जाते हैं और ठंड भी लगती है।
तो बस आज के लिए बस इतना ही...कल फिर मिलते हैं...
-----; अनुगुंजा



शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2021

न भाए मुझे परवल का भुजिया

 

मेरी मम्मी ने आज सिम्पल परवल का भुजिया बनाया,जो मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता है।मम्मी ने पहले परवल को धोया फिर काटा,क्योंकि मम्मी कहती है कि पहले सब्जी को पानी से अच्छी तरह धोना चाहिए...फिर उसके बाद काटना चाहिए,काटकर सब्जी कभी धोना नहीं चाहिए,इससे उसके पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं।परवल काटने के बाद कढ़ाई में तेल डाला,उसके बाद उसमें जीरा,सूखा लाल मिर्च,कसूरी मेथी का फोड़न डाला,फिर उसके बाद उसमें बारिक कटा प्याज डाला और उसे लाल होने तक भूना।इसी दौरान लहसून,हल्दी,नमक ,लाल मिर्च पाउडर के साथ कटा परवल डाल दिया।परवल चुकी पकने में समय लेता है इसलिए उसे प्लेट से ढक कर बनाया जाता है ताकि वो अच्छी तरह सीझ(पकना) जाए।बस बन गया परवल का भुजिया....मुझे परवल अपने बीया (बीज) के कारण पसंद नहीं आता है।वैसे घर में सबको परवल का भुजिया बहुत टेस्टी लगा।कसूरी मेथी स्वाद बदल देता है और हर खाने को टेस्टी बना देता है।

आज सुबह की चाय दो दिनों से बहुत सुकून वाली है...क्योंकि दो दिनों से पेंटर सब नहीं आ रहे हैं...असल में घर की पेंटिंग का काम लगभग खत्म हो चुका है थोड़ा ही बचा है...और इसी कारण अब पेंटर सब आनाकानी कर रहे हैं बचा हुआ छिटपुट काम करने में।आज की चाय हमारी हंसी-मजाक वाली रही...मामी और राजू मामा में बॉक्स रूम की सफाई पेंटर सबसे कराने को लेकर खूब मजाक हुआ।अंत में तय हुआ कि मुखियाइन(मामी की काम वाली बाई)का बेटा बॉक्स रूम की सफाई करेगा...जिसने अपना अपॉइंमेंट कल का दिया है,बड़ा व्यस्त रहता है बेचारा...डॉक्टर सबसे ज्यादा बीजी रहता है।मामी ने तो बोला है कि दस बार फोन करो तब ये घर से निकलता है....देखते हैं कल काम शुरू होता है या नहीं?

आजकल तो दिवाली-धनतेरस को लेकर हर दुकान,मॉल,ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स...सब ऑफर ही दे रहे हैं,समझ में नहीं आता है कि किसे खरीदे और किसे नहीं...वैसे कल और परसो भाई की छुट्टी है तो फिर हमारी शॉपिंग चलेगी।जो लूंगी...सब आप सबको दिखाऊंगी,मामी ने बोला है कि भारत जलपान के पास कपड़ों का बहुत बड़ा होलसेल दुकान है....वहां जाने का हम सोच रहे हैं भाई के साथ।फिर पंकज मार्केट से भी बहुत कुछ खरीदना है....ये सबके बारे में मामी ही बताती है...उन्हें सब पता है,कहां क्या मिलेगा...हर समस्या का हल है उनके पास। अंग्रेजी में बोलेंगे...शी इज सुपर वुमन...

आज मैंने एक कविता लिखी है....जो आज के समय में बिगड़ते बच्चों पर हैं....जरूर पढ़े....

उम्मीद करती हूँ...आपको अच्छा लगेगा...
तो आज के लिए बस इतना ही...कल फिर मिलते हैं...
----- अनुगुंजा



गुरुवार, 28 अक्टूबर 2021

मार्केटिंग ग्यारह नम्बर की गाड़ी पर

 आज सुबह एक बहुत अजीब वाक्या हुआ...असल में पापा को गांव जाना था आज...क्योंकि गांव की रिश्तेदारी में कोई मर गया था सो उसकी तेरहवीं का भोज था।लेकिन पापा को सर्दी और हल्का बुखार हो गया था इसलिए वो गांव नहीं जा सकें,लेकिन उनको न्योता करना था...इसलिए उन्होंने गांव में किसी को फोन घूमाया।पापा फोन पर चिल्ला चिल्ला कर बोलते रहे कि " अरे !!!! हम उसके लिए फोन नहीं किए हैं...हम गांव नहीं आ रहे हैं मेरे तरफ से पचास रूपया से न्योता दे देना। " अंत में हार कर पापा ने मोबाइल मुझे दे दिया,फिर मैंने भी जब खूब जोर से अपनी बात समझाई,तो वो समझ गया। लेकिन साथ ही उसने बड़ी खुशी के साथ बोला कि शाही जी की तबियत के बारे में भी बोल देंगे और न्योता दे देंगे।फोन काटने के बाद पापा ने मुझे बताया कि असल में पापा की खेतों की देखभाल वो करता है और उसने पापा से कुछ रूपये कर्ज लिए थे....सबसे बड़ी बात वो बहरा है,तो बेचारे को लग रहा था कि पापा अपना कर्ज वापस मांग रहे हैं,लेकिन जब पूरी बात सुनी तब खुश हो गया।उस बहरे की इस बात पर मैं और पापा खूब हंसे।

ठंड बढ़ रही है और हमारा पूरा बरामदा खुला है..पेंट होने के कारण सारे पर्दे हटा दिए थे और वो पुराने थे फट भी गए हैं....इसलिए शाम होते ही बहुत ठंड लगने लगती है।तो आज की सुबह की चाय में मामी ने सजेशन दिया कि नया प्लास्टिक से ग्रिल को कवर कर दो और फिर पर्दा लगा लो...इससे लुक भी खराब नहीं होगा और ठंड से भी बचाव हो जाएगा।आज पेंटर सब भी नहीं आए...और पापा भी गांव नहीं गए,तो मैंने और मम्मी ने टाइम को यूटिलाइज किया और प्लास्टिक लेने के लिए मार्केट जाना तय किया।असल में हम छोटू(बिल्ला) को अकेले घर में नहीं छोड़ते हैं वो बहुत रोने लगता है....इसलिए छोटू को पापा पर छोड़कर हम मार्केट गए।

भगवान ने हम सबको ग्यारह नम्बर की गाड़ी दी है...अरे !!! भई मैं हमारी दो टांगों की बात कर रही हूँ।चलना हम सबके लिए बहुत जरूरी है...आज मेरी मम्मी एक महीने बाद सीढ़ी से नीचे उतरी थी।पहले मैंने उसे बहुत उत्साह-हौसला दिया कि कुछ नहीं होगा....उसको बहुत मजा आएगा,तो मेरे बहुत कहने पर वो मार्केट जाने के लिए तैयार हो गई।हम मार्केट के लिए अपने चौक तक ही गए...पर पैदल चलकर।मैंने अपनी मम्मी का हाथ थामा और धीरे धीरे चलते रहें हम।इतने दिनों बाद मम्मी बाहर निकली थी सो उसके पैर में बहुत तेज दर्द भी हो रहा था....पर मैं हौसला उसे देती जा रही थी।मेरी नजर सड़क की ठोकरों पर थी...ताकि मम्मी को चोट न लग जाए।

मम्मी का हाथ पकड़े जब मैं चल रही थी...तो मुझे बहुत अच्छा लग रहा था,मम्मी भी बाजार की भीड़ को देख रही थी और हम बातें कर रहें थे।

इसी दौरान एक दुकान पर एक महिला से मेरी बहस भी हो गई...मैं कैट फूड के बारे में पूछ रही थी तो वो महिला बोली " आपने बिल्ली पाला है !!! बिल्ली नहीं पालना चाहिए...वो मालिक का नुकसान चाहती है "....मैंने उसे जवाब में बस यही बोला कि कई सालों से हमारा छोटू हमारे घर की जान है,मुस्कान है.....वो रोज आरती लेता है,प्रसाद खाता है...।फिर वो महिला चुप होकर निकल गई।मुझे समझ में नहीं आता है कि हम किस युग में जी रहे हैं?...लोग पढ़ लिखकर भी इतने अंधविश्वासी कैसे हो सकते हैं?क्या फायदा ऐसी शिक्षा का..जो आँखों पर की पट्टी भी न खोल सके।

मार्केट लेने तो हम सिर्फ प्लास्टिक ही गए थे...पर याद कर करके बहुत सामान ले लिया...आप भी देखे...

घर आने पर मम्मी से ज्यादा मैं थक गई...जैसे ही हम सीढ़ी तक पहुंचे,हमारा छोटू गेट पर बैठकर मम्मी का इंतजार कर रहा था...फोटो दिखाती हूँ...

मम्मी को देखते ही ये अपने पंजे से गेट खोलने की पूरी कोशिश करता है...और कुछ पाखंडी इसे अपशगुन मानते हैं।मेरी नजर में तो ये सारे पाखंड इंसान की खुद की विकृत बुद्धि ने बनाए हैं...इसमें भगवान का कोई हाथ नहीं है।
आज मम्मी और मैं दोनों ने अपनी ग्यारह नम्बर की गाड़ी का कुछ ज्यादा ही इस्तेमाल कर लिया था...इसलिए दोपहर का खाना सिर्फ दाल,चावल,कद्दू और पालक साग रहा...पहले ब्लॉग में आपसे कद्दू की रेसिपी शेयर कर चुकी हूँ।इसलिए आज के लिए सिर्फ फोटो....


तो बस आज के लिए इतना ही....कल फिर मिलते हैं...
----- अनुगुंजा





बुधवार, 27 अक्टूबर 2021

बिल्ली-चूहा की टॉक

 


विश्व प्रसिद्ध कार्टून " टॉम एंड जेरी " को कौन नहीं जानता है,हम सबने टीवी पर ये कार्टून खूब देखा है....आज भी जब हम इस कार्टून के बारे में सोचते हैं तो हमारे चेहरे पर मुस्कान आ जाती है।वक्त बदलता है,उम्र बढ़ती है पर बचपन हमेशा हमारे अंदर जिन्दा रहता है और इसे जिन्दा रहना भी चाहिए।आज मैंने अपने मोबाइल से कुछ ऐसी तस्वीरें ली,जो मुझे बचपन में ले गया...ऊपर फोटो देखकर आप कुछ कुछ समझ ही गए होंगे...आइए....थोड़ा सोचते हैं कि चूहा और बिल्ली आपस में क्या बात कर सकता है,एक टॉक टॉक खेलते हैं---

छोटू(बिल्ला) बोल रहा है फोन पर--- भई !!!! चूहे,क्या तुम जानते हो...रोहू मछली तीन सौ रूपये किलो है...

चूहा-- छोटू भई!!!! मैं तो कुर्सी पर बैठा हूँ,मुझे क्या मतलब....हां तुम्हारे प्लेट से लूट कर मैं खा लेता हूँ।मेरी संख्या ज्यादा है और मैं  चूहेदानी में नहीं फंसता...बल्कि दूसरों को फंसाता हूँ।

छोटू-- तुमने राशन की लाइन देखी है?

चूहा--- मैं तो बस पांच साल पर प्रकट होता हूँ और फिर जिन्न की तरह अपने चिराग में छुप जाता हूँ।

तो....कैसी लगी ये टॉक टॉक....जरूर बताए...

ये लिट्टी देखकर ये न सोचे कि इसे हमने बनाया है...अरे !!! आज मेरी काम वाली बाई सुबह दस बजे तक आई ही नहीं...जब फोन किया तो उसके बेटे ने बोला कि रास्ते में है..दो घंटा में तो मुजफ्फरपुर से पटना पहुंच सकते हैं पर मेरी बाई मेरे घर तक नहीं पहुंची।तब तक मुझे और मम्मी को बहुत भूख लग गई थी...तो मैं अपने चौक पर गई और गरमा गरम लिट्टी लेकर आ गई।मेरे चौक पर का लिट्टी-समोसा बहुत टेस्टी होता है और सबसे बड़ी बात अच्छी क्वालिटी का भी होता है गला बिलकुल नहीं जलता है।तो हमारा आज का नाश्ता हमारी बाई की कृपा से लिट्टी ही रहा।
देर बहुत हो गई थी...इसलिए मम्मी ने फटाफट आलू का भुजिया बना डाला,हम सबने दाल-भात(चावल) और आलू का भुजिया खाने में खाया।वैसे मम्मी ने कल वाली बची बेसन की सब्जी को कसूरी मेथी के फोड़न से गर्म कर लिया था...जिससे उसका टेस्ट और भी अच्छा हो गया था।
आज सुबह वाली चाय हमारी थोड़ी धड़फड़ी वाली थी...क्योंकि पेंटर सब आ गए थे ग्रिल को पेंट करने...और हमारे राजू मामा ने जल्दी जल्दी में मामी को भी आराम से बात नहीं करने दिया,हम सबने अपनी जल्दी चाय खत्म की और बरामदे को पेंटिंग के लिए खाली कर दिया।आज कोई चर्चा हुई ही नहीं....
मौसम तेजी से बदल रहा है...पछुआ हवा चल रही है,मम्मी कहती है कि यही हवा ठंड लेकर आएगी।
तो बस आज के लिए इतना ही....कल फिर मिलते हैं...
----- अनुगुंजा






मंगलवार, 26 अक्टूबर 2021

डोसा जैसी बेसन की सब्जी

 आधा अक्टूबर बीत चुका है,ठंड की हल्की हल्की आहट हो रही है जिसे हम " गुलाबी ठंड " भी कहते हैं।सुबह-सुबह फूल-पत्तों पर ओस की बिखरी बूँदें मोती की तरह सूरज की किरणों में चमकती हैं और छूने पर हमारे हाथों में समाकर कहीं गुम हो जाती है।ऐसा लगता है कि ये ओस वक्त की तरह है जो देखते देखते ओझल हो जाता है,इसलिए हमें अपनी मुट्ठी बंद कर जीवन में आए कोई भी खुशी के पल को जी भरके महसूस कर प्रसन्न होना चाहिए।कल क्या होगा...इसकी फिक्र कभी नहीं करना चाहिए,हम " आज और अभी " में जी कर ही जिन्दगी का आनंद ले सकते हैं।

हां....तो बात शुरू हुई थी बढ़ती ठंड से,अब तो दिन भी छोटा हो गया है तुरंत शाम होकर अंधेरा हो जाता है।रात को खिड़की-पंखा बंद करके भी एक चादर की ठंड लगती है...आजकल हमारे परिवार में सबको सर्दी,गले में दर्द,खांसी की समस्या हो गई है...शायद ये भी ठंड का ही असर है।अब देखे...अभी शाम के चार बजकर सैतालिस मिनट हो रहे हैं...और अंधेरा हो रहा है...फोटो देखे...


इसे ही प्रकृति कहते हैं....तो अपने हिसाब से बदलती रहती है।ये तो इंसान है जो बदलना ही नहीं चाहता है।हम सब जानते हैं कि उम्र हमेशा बढ़ती ही रहती है और हमें अपना जीवन जीने का तरीका उम्र के हिसाब से करना चाहिए।कुछ कामों में कटौती करके हम अपने शरीर की ही रक्षा कर रहे हैं...अपनी बरसो पुरानी आदत को छोड़कर हम परिवार के और करीब जाते हैं....ये सब बातें कुछ लोग नहीं सोचते हैं।जैसे मेरी मम्मी...जो आज भी उतना ही काम करना चाहती है जितना वो आज से बीस साल पहले करती थी,कुछ भी भारी सामान उठा लेती है,घंटों रसोईघर में लगी रहती है...और मना करने पर बुरा मान जाती है।इंसान प्रकृति के जैसा अपनेआप को क्यों नहीं बदलता है? यही सवाल हमारी आज की सुबह वाली चाय का मुद्दा था।मेरी मामी ने बोला कि हालाकि वो सफाई पसंद हैं पर अब चुकी उनके घुटनों में दर्द रहता है तो वो इसलिए अब ज्यादा देर खड़ी नहीं रहती है...और पहले जैसा कोई काम तुरंत नहीं करती हैं,सोच समझकर करती हैं।यही सही भी होता है।

आप सोच रहे होंगे कि टाइटल में तो... डोसा जैसी बेसन की सब्जी थी पर अभी तक तो सब्जी का दर्शन भी नहीं हुआ...और ये क्या बातें होने लगी...तो भई !!!!! हर चीज के होने का सही समय  होता है....तो पहले देखे फोटो...फिर बात आगे करते हैं....





फोटो में जितनी टेस्टी सब्जी दिख रही है...यकीन माने उससे कहीं ज्यादा खाने में लगी है।मैंने तो सिर्फ चावल और ये सब्जी खाई है...दाल आदि की जरूरत ही नहीं पड़ी।अब आते हैं इसकी रेसिपी पर...

पहले बेसन का गाढा घोल तैयार कर ले,जिसमें बेसन के साथ हल्दी,मिर्च पाउडर,लहसून,नमक और थोड़ा सा गर्म मसाला का पाउडर को पानी के साथ मिलाकर घोल तैयार कर लें।फिर तवा पर उसके बैटर को फैला ले और दो तीन बूंद ही तेल डाले...धीमी आंच पर पकाएं।थोड़ी थोड़ी देर पर छोलनी(करची) से उस बैटर को थोड़ा थोड़ा उठाकर देखे....जब एक तरफ पक जाए तो फिर करची से उस बैटर को डोसा की तरह मोड़ना शुरू करें....जैसा फोटो में है।इसी तरह करके अपनी जरूरत के हिसाब से डोसा जैसा बेसन तवे पर तैयार कर लें।फिर इसके ठंडे होने पर चाकू से इसे काट ले..आकार आप अपने हिसाब से चुन सकते हैं।

फिर कढ़ाई में तेल डालकर उसमें हींग,जीरा,मेथी दाना,सूखा लाल मिर्च,खड़ा गर्म मसाला का पूरा छोटा पैकेट,तेजपत्ता फोड़न में डालें....फिर बारिक कटा प्याज डालकर लाल करें...फिर कटा टमाटर डालें,उसके बाद हल्दी,लाल मिर्च,धनिया पाउडर,नमक,कश्मीरी लाल मिर्च(तीखा लाल) डालकर खूब भूने....जब तेल छोड़ने लगे तो उसमें पानी डाले और एक उबाल आने पर उसमें कटा हुआ बेसन का पीस डाले....फिर गैस बंद करने से पहले मैगी मसाला(सब्जी वाला) डालें...और बन गई     " डोसा जैसी बेसन की सब्जी "....जरूर बनाएं।

आज मेरे घर में पेंट करने वाले पेंटर भईया सब जब आपस में बात कर रहे थे...तो उसमें से एक पेंटर भईया बोला कि वो सुबह पांच बजे उठकर घर में सबके लिए चाय बनाया,झाड़ू लगाया...फिर पत्नी ने जो खाना बनाया उसे अपने लंच बॉक्स में डाला और घर से निकल गया।इसी भईया ने कल बताया था कि इनकी बेटी इंटर फस्ट डिविजन से पास की है और इन्होंने बेटी का आर.डी.एस कॉलेज में बी.कॉम में एडमिशन भी करवा दिया है।ये सब सुनकर बहुत अच्छा लगा....कौन कहता है कि एक गरीब की बेटी पढ़ नहीं सकती,आगे बढ़ नहीं सकती....जरूरत है ऐसे माता-पिता की,जो बेटी को बोझ न समझे और उसे उसके हक का आसमां भी दें और उड़ान भरने की आजादी भी दें।तब ही तो नारी सशक्त होगी।

तो आज के लिए बस इतना ही....कल फिर मिलते हैं...

------ अनुगुंजा





सोमवार, 25 अक्टूबर 2021

सलाम इस मेहनत को

 कोरोना काल में " वर्क फ्रॉम होम "का बहुत बोलबाला है...सब जगह यही चल रहा है।लोग अपने घरों में रहकर अपने दफ्तर,स्कूल,कॉलेज आदि का काम कर रहे हैं।जब वीडियो कॉल पर मीटिंग की बात होती है तो फिर पुरूष बेचारे केवल अच्छा फार्मल कोर्ट-बुशर्ट और हॉफ पैंट(मोबाइल कैमरे में कमर तक ही शूट होता है) पहनकर कैमरे के सामने बैठ जाते हैं और महिलाएं भी बेचारी अपने घरेलू कपड़ों को प्रोफेशनल लुक दे डालती हैं।मैं ये नहीं कहती कि ये बहुत आसान काम है...बल्कि मैं तो ये कहूंगी कि ये बहुत टफ काम है।लेकिन मेरा यहां ये कहना है कि हम अपने काम को पहाड़ बना लेते हैं और फिर यहां पर वर्क लोड असहनीय बन जाता है।जब हम ये सोचने लगेंगे कि हमसे भी ज्यादा दूसरे काम करते हैं तो फिर हमें अपना काम आसान लगने लगेगा और काम में मजा आने लगेगा।

आज मैंने पेंटर भईया  को अपने बरामदे की ग्रिल को पेंट करते देखा,तो मैं ताज्जुब में पड़ गई....कितनी मेहनत लग रही थी वहां,हर ग्रिल घूमावदार है उसे पहले सरेस कागज से घसना...एक एक कोने को,फिर उसपर पेंट लगाना.....सही में बहुत धैर्य का काम है।फोटो देखे और सोचे---


देखा...न...,ये पेंटर वाले भईया सुबह सात बजे से लेकर दोपहर तीन बजे तक लगातार पेंट करते रहें....सलाम है उनके धैर्य और मेहनत को।सही में कोई काम छोटा नहीं होता है और कोई काम बड़ा(विकराल) नहीं होता....बस करने का जज्बा होना चाहिए।

आज मैंने कद्दू और चना के दाल की सब्जी बनाई...वो भी कूकर में...पहले फोटो देखे...



उम्मीद करती हूँ देखने में सब्जी आप सबको अच्छी लग रही होगी।तो अब आते हैं इसकी रेसिपी पर...जो बहुत आसान है...

पहले चना के दाल को अच्छी तरह पानी से धोकर ,दो-तीन घंटे के लिए फुला ले...फिर कूकर में तेल डालें और तेल के गर्म होने पर उसमें हींग,कड़ी पत्ता,खड़ा गर्म मसाला का पूरा छोटा पैकेट,जीरा,तेजपत्ता,दो सूखी लाल मिर्च फोड़न में डालें।फिर फोड़न लाल हो जाने पर उसमें बारिक कटा प्याज डाले,जब प्याज लाल हो जाए तो उसमें एक टमाटर डाले...फिर दो मिनट तक भूनने के बाद उसमें अदरक-लहसून का पेस्ट डाले और तीन मिनट तक भूने..फिर इसमें हल्दी,धनिया पाउडर,लाल मिर्च पाउडर,नमक डालकर दो मिनट भूने फिर इसमें फुलाया हुआ चना दाल डाले और खूब चलाए...फिर कूकर में कटा कद्दू डाले और दो मिनट तक उसे भी चलाए....फिर थोड़ा पानी डाले और मैगी मसाला(सब्जी वाला) का एक पैकेट डाले और कूकर का ढक्कन बंद कर दे।मेरे विचार से कूकर की कम से कम पांच-छ: सीटी लगाए...इससे कद्दू और चना दाल दोनों गल जाता है और टेस्ट भी बहुत अच्छा लगता है।

हां....कल मेरे भाई ने अपना वादा तोड़ दिया और मेरे लिए समोसा नहीं लाया....मन उदास हो गया।

आज छोटू( बिल्ला) बहुत गुस्से में था...जब छोटू को गुस्सा आता है तो सारा न्यूजपेपर,बिस्तर का चादर,तकिया खोल,गद्दा सब फटता है...उसे फाड़ता है छोटू...देखिए----


सब फाड़ देने के बाद मान भी जाता है,क्या करें !!!! मम्मी के दुलार-प्यार के कारण बहुत सिरचढ़ा है...वो हमारे घर का बादशाह है और हम सब उसके प्यार में उसके गुलाम हैं।

अब हल्की हल्की ठंड बढ़ने लगी है...इससे घर में सबको सर्दी हो गई है और मम्मी के घुटनों की तकलीफ बहुत बढ़ गई है।लेकिन यही तो जीवन है...जहां सब एकसाथ चलता रहता है।

तो आज के लिए बस इतना ही....कल फिर मिलते हैं...

------ अनुगुंजा





रविवार, 24 अक्टूबर 2021

शंख की गूंज

 

हिन्दू धर्म और शंख का बहुत गहरा संबंध है,ऐसा कहा जाता है कि हर हिन्दू के घर में शंख होना चाहिए है,क्योंकि ये घर-परिवार के लिए बहुत शुभ होता है और उससे निकली शंख ध्वनि सारे वातावरण को पावन कर देती है।आज मुझे अपने घर में मेरे नाना जी का बहुत पुराना शंख मिला...जिसका फोटो ऊपर मैं डाली हूँ,ये शंख पीला पड़ गया है पर अब भी देखने में बहुत सुंदर लगता है।शंख को देखने और छूने मात्र से ही भक्ति का,विधाता की शक्ति का और हिन्दू धर्म की पवित्रता का अहसास होता है।ऐसा कहा जाता है कि कोई भी पूजा बिना शंख बजाए पूरी नहीं होती है...शंख की गूंज भक्ति और भगवान को जोड़ देती है।इन्हीं सब मान्यताओं के कारण इस धरती का सबसे प्राचीन धर्म सनातन धर्म है।

ये तो हो गई धर्म की बात....आज मेरे पापा को गांव जाना पड़ा और भाई भी बाहर ही खाना खाया...तो बचे अब बस हम        " मम्मी-बेटी "....तो मैंने सोचा कि क्यों न कुछ स्पेशल बनाया जाए,छोटी सी पार्टी ही हो जाए....अरे !!!! भई...ज्यादा न सोचे..बाहर से हमने कुछ नहीं मंगवाया,बल्कि घर में ही कुछ बना डाला।कहते हैं जल्दी का काम शैतान का होता है पर कभी कभी शैतान बनकर शैतानी करने में भी मजा आता है....तो आज मैंने बनाई " चालू बिरयानी ".....चालू शब्द पढ़कर ये मत सोचे कि बिरयानी बकवास होगी,चालू का मतलब जल्दी से है।पहले मेरी थाली की बिरयानी का फोटो देखे और फिर बात को आगे बढ़ाते हैं....


हां....तो मस्त लगी न...मेरी चालू बिरयानी.,सॉरी टेस्ट नहीं करा सकते हैं बस फोटो दिखा सकते हैं।इसको पंद्रह मिनट में मैंने बना डाला....पहले कूकर में घी डाला,फिर सात-आठ काजू को उसमें डालकर भून लिया और निकाल लिया...फिर उसमें तेजपत्ता(दो-तीन) डाला,फिर खड़ा गर्म मसाला का छोटा वाला पूरा पैकेट डाला...साथ में जीरा,गोल मरीच का पाउडर भी डाला...जब फोड़न लाल हो गया तो उसमें बारिक कटा प्याज और लम्बा कटा हरा मिर्च भी डाला और भूना....तबतक एक कटोरी चावल को अच्छे से धो लिया और थोड़ी सी हल्दी मिला लिया चावल में...बस फिर जब प्याज लाल हो गया तो उसमें हल्दी मिला चावल डाला,पानी डाला,नमक डाला और धनिया का पत्ता भी डाला....फिर कूकर का ढक्कन बंद कर गैस पर चढ़ा दिया...दो-तीन सीटी के बाद गैस पर से कूकर उतार लिया और फिर बन गई हमारी चालू बिरयानी।यकीन माने हमारी बिरयानी बहुत टेस्टी बनी थी।

आज संडे था...यानि छुट्टी का दिन.... मेरे भाई को छोटा वाला आइना हाथ में लेकर बाल झारने का बड़ा शौख है...हमारे घर में पेंटिंग का काम चल रहा है तो सब सामान इधर उधर है...कभी कुछ नहीं मिलता है तो कभी कुछ....बेचारा मेरा भाई सुबह से वो आइना खोज रहा था..जब उसने हार मान ली,तो फिर मुझसे सौदा करने आया....बोला कि अगर मैं उसे वो आइना खोजकर दे दूं,तो शाम को वो मेरे लिए समोसा लेकर आएगा।मैं भी कहां कम थी...मैंने भी उसे उसके लहराते बाल का कसम दिला डाला।हालाकि वो आइना मुझे भी नहीं मिला...पर देखते हैं कि भाई समोसा लाता है की नहीं...शाम के छ: बजने वाले हैं अभी तक तो नहीं लाया....कल बताऊंगी...कि लाया की नहीं..

भाई-बहन में इस तरह का मोल भाव चलता रहता है....कभी वो कसम देता है तो कभी हम...,फिर कसम तोड़वाते भी खूब हैं...कसम तोड़वाने का फेमस लाइन " इतना कथी? लोई..तोहर किरिया हम्मर किरिया गंगा जी में धोई "....है।

आज का दिन बड़ा सुकून वाला रहा...कोई धड़ाम भड़ाम नहीं..असल में पेंटर सब नहीं आया था सब पंचायत चुनाव में वोट डालने गया था.....चाय की चुस्की भी जबरदस्त रही,खूब दूध वाली चाय चली आज...

अरे !!!!! एक बात तो बताना ही भूल गए...आज शाम साढे सात बजे से भारत-पाकिस्तान का क्रिकेट मैच जो होने वाला है....मेरा भाई सुबह से हरा टीशर्ट पहना था और बोल रहा था कि आज पाकिस्तान जीतेगा....बस फिर क्या...मेरी मम्मी के गुस्से का घड़ा फूट पड़ा,मम्मी क्रिकेट को लेकर बहुत सीरियस हो जाती है...एकदम  " ऑउट ऑफ कंट्रोल "....क्रिकेट की बहुत इमोशनल फैन है मम्मी।हम सबकी की दुआ है कि पाकिस्तान हार जाए और ये मौका भी उसके हाथ से निकल जाए।तो जल्दी जल्दी सब काम कर लेते हैं....मैच शुरू होने से पहले तैयार जो रहना है अपनी भारतीय टीम को सपोर्ट करने के लिए...तो मेरे साथ सब बोलिए जोर से " इंडिया इंडिया "

तो बस आज के लिए इतना ही...कल फिर मिलते हैं....

------ अनुगुंजा


शनिवार, 23 अक्टूबर 2021

नीला सूट(खोया-पाया )

 आज मुझे इस बात पर पूरा विश्वास हो गया कि हर कुछ के मिलने का समय निश्चित होता है...समय से पहले कुछ भी नहीं होता है।आज से करीब दस-पंद्रह साल पहले मेरा एक नीला सूट अचानक गुम हो गया था वो सूट प्लेन ब्लू रंग में था पर उसका कपड़ा बहुत मुलायम था और मेरा सबसे फेवरेट सूट था।मैंने और मम्मी ने उस सूट को घर में हर जगह खोजा,यहां तक कल  भी उसे खोज ही रहे थे...होता है न,कि कोई कोई सामान हमारे दिल के बहुत करीब हो जाता है और उसका भुलाना हमें दुख देता है।मम्मी और मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर वो सूट जिन्न की तरह गायब कहां हो गया? इतने साल बीत गए पर जब भी कोई भी चर्चा होती थी तो मम्मी और मैं जरूर उस नीले सूट की बात करते थे।मानो वो सूट न होकर भी हमारे बीच था।आप सोच रहें होंगे कि बहुत महंगा होगा....तो बता दूं कि वो बहुत सस्ता सूट था एकदम सिंपल...पर फिर भी खास था,पता नहीं क्यों? शायद मम्मी और मैंने बहुत प्यार से सिलवाया था।

तो आज मुझे एक बहुत पुराना कपड़े वाला बैग मिला,मैंने सोचा कि वो पुराना बैग अपनी काम वाली बाई को दे देती हूँ...इतने पुराने बैग में हमारी जरूरत का कोई सामान थोड़े ही होगा,मगर अचानक मेरी मम्मी उस बैग को खोलकर देखने लगी....क्योंकि मेरी मम्मी कोई सामान जल्दी नहीं हटाती है घर से,बताया था न पिछले ब्लॉग में।फिर तेज आवाज में मम्मी " अनु " बोलकर चिल्लाई...मैं तो डर गई कि क्या हुआ,मैं जब मम्मी के पास गई तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था....मम्मी के हाथों में बरसो पुराना मेरा वही गुम हुआ नीला सूट था।आप भी देख ले...मेरे अतिसाधारण नीले सूट को...जो आम होकर भी खास है...


मुझे और मम्मी को इस सूट के लिए बस गुमशुदा केंद्र या खोया-पाया विभाग में जाने भर की देर थी....मजाक नहीं कर रही हूँ,सच में मुझे और मम्मी दोनों को बहुत प्यारा है ये सूट।इस घटना ने मुझे बताया कि ईश्वर हर चीज के मिलने या होने का समय निर्धारित करता है....और वो चीज उसी तय समय में हम तक पहुंचती है या हम उस तक पहुंच जाते हैं।मेरे भाई ने बहुत सी प्रतियोगिता परीक्षा दी,पी.टी..मेन्स पास भी किया.... इंटरव्यू भी दिया पर एक नम्बर-आधे नम्बर से उसका छूट गया....बहुत निराश होता था वो अपनी इस लगातार मिलती असफलता से,मगर उसने कोशिश नहीं छोड़ी,देता रहा परीक्षा और आज वो भारतीय जीवन बीमा निगम में डेवलपमेंट ऑफिसर है।हम सबको उसपर गर्व है।शायद इसलिए किसी ने कहा है कि कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती......अगर मम्मी दुबारा सूट खोजने की कोशिश नहीं करती तो वो हमें कभी नहीं मिलता।

भाई जी की तारिफ तो बहुत हो गई...अब जरा टांग खिचाई मैं करती हूँ...पर पहले ये फोटो देखे---


कुछ याद आया? जिनको याद नहीं आ रहा है वो कृपया मेरा कल वाला ब्लॉग पढ़े.....आज मेरे पापा मेरे लिए दाल वाली पूड़ी ले आए और मेरे मंथरा भाई का मुँह बन गया...बेचारा...

आज तो मुझपर अन्न देवता मेहरबान थे एक तरफ पूड़ी आ गई और दूसरी तरफ दिन के खाने में मम्मी ने रेस्टोरेंट से पनीर हांडी और चना दाल फ्राई मंगवाया....किसी खुशी में नहीं,बल्कि रसोईघर की फाइनल पेंटिंग चल रही थी गैस का चूल्हा बंद था इसलिए......खैर वजह जो भी हो,मेरी तो मौज हो गई....देखिए मेरी थाली....


तो आज मैं अपने भाई से जीत गई....मन खुश हुआ...

नजर का धोखा पढ़े लिखे इंसान को भी मूर्ख बना देता है...मेरी मम्मी के पास पढ़ाई की डिग्री कोई कमी नहीं है पर कल से मम्मी मुझसे कह रही थी कि तुमने ढेर रूपये वाला सिक्का देखा है? मैंने बोला ऐसा सिक्का अबतक तो नहीं आया है पर वो मानी नहीं और फिर बड़े उत्साह के साथ सिक्का दिखा डाला....सिक्का देखकर मैं और मेरा भाई खूब हंसे,असल में वो एक रूपया का सिक्का था जो भारतीय डाक के ढेर सौ वर्ष पूरे होने की खुशी में निकाला गया था....आप भी देखे मेरी मम्मी का ढेर रूपया वाला सिक्का....और हंसे...


तो चलिए आपको हंसता हुआ छोड़कर जाती हूँ...कल फिर मिलती हूँ....एक नए ब्लॉग के साथ....

----- अनुगुंजा





शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2021

मोर पंख

 

आज मैं अपने ब्लॉग की शुरूआत मोर पंख के इस फोटो से करती हूँ....हमारा घर किसी किले में छुपे रहस्य से कम नहीं होता है पता नहीं कब,क्या मिल जाए,जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।तो आज मुझे मेरे घर के स्टोर रूम से मिला ये मोर पंख....जो कई सालों से यहां पड़ा था पर आज भी देखने और छूने में उतना ही सुंदर लगता है जितना ये नया के समय लगता था।मेरी नानी भगवान श्रीकृष्ण की बहुत बड़ी भक्त थी...रोज भगवत गीता पढ़ती थी।आज जब मयूर पंख देखा तो ये सब यादें ताजा हो गई....साथ ही साथ हमारे स्कूल और मोर पंख का प्रसिद्ध किस्सा भी याद आ गया...हम सब अपनी कॉपी में मोर पंख छुपाकर रखते थे उसे चॉक का पाउडर खिलाते थे(मानो वो कोई जीवित चीज हो) और ये उम्मीद करते थे कि वो मोर पंख एक का दो हो जाएगा......आज जब ये बातें सोचती हूँ तो अपने मासूम बचपन पर हँसी आती है,हम बचपन में क्या क्या सोच लेते थे और उसपर विश्वास भी करने लगते थे।

हम चाहे घर में टेस्टी से टेस्टी खाना क्यों न बना ले,पर कई बार बाहर का खाना खाने का मन करता ही करता है...मुझे पिज्जा,बर्गर,गुपचुप,चाऊमिंग,फ्रेंच फ्राई बिलकुल नहीं पसंद है,मैं जानती हूँ कि आपको ताज्जुब हो रहा होगा पर क्या करूं मैं ऐसी ही हूँ।मुझे सड़क के किनारे छोटी सी दुकान पर बनने वाला समोसा...लाल चटनी के साथ,लिट्टी,पॉवभाजी,ठेला पर मिलने वाला छोला भटुरा बहुत अच्छा लगता है।मेरे भाई की जुबान में मुझे रोड छाप खाना अच्छा लगता है,बड़े रेस्टोरेंट,कैफे का हाई-फाई खाना मुझे हजम नहीं होता है।तो आज हुआ ये कि मेरे पूज्य पिता जी ने मुझे बताया कि मोतीझील में कहीं दाल वाली पूड़ी और आलू की मस्त सब्जी किसी ढाबे या गुमटी       ( छोटा दुकान) पर मिलती है,मैंने पापा को मना लिया था कि आज मेरे लिए पापा वो लेकर आए....पर मेरे भाई ने नारद बनकर मेरा सारा काम बिगाड़ दिया।मम्मी और पापा को इतना भड़काया कि उन्होंने मुझे वो दाल वाली पूड़ी मंगवाने से मना कर दिया।मेरे भाई को मेरे लीवर की चिंता अचानक हो गई और बोलने लगा कि वो सब तीसी के तेल में बनाते हैं इससे पेट खराब हो जाएगा।जब मम्मी ने मना कर दिया उस खाने को,तो एक मंथरा टाइप मुस्कान बिखेरता हुआ मेरा भाई अपने काम पर चला गया और साथ में वो " यस यस " भी कर रहा था,बदमाश !!!!!! भाई....

यही तो खूबी होती है भाई-बहन के रिश्ते की....जिससे हम सबसे ज्यादा लड़ते भी है,टांग भी खींचते हैं और सबसे ज्यादा प्यार भी करते हैं।वैसे बता दूं कल मेरा भाई मेरे लिए समोसा-लिट्टी लेकर आया था....मुझसे बहुत प्यार करता है पर ...हां,टांग खींचने का कोई मौका नहीं छोड़ता है।लव यू भाई......

आज मैं कुछ स्वास्थ्य पर आपको बताना चाहती हूँ....हमारे शरीर में यूरिक एसिड का बढ़ना बहुत खतरनाक होता है,इससे बहुत तरह की बीमारी हो सकती है...खासतौर से जोड़ो की.......दाल तो हम सब रोज कूकर में बनाते हैं तो क्या आप जानते हैं कि थोड़ी सी सावधानी बरत कर आप अपने दाल को यूरिक एसिड से मुक्त कर सकते हैं।तो जाने कैसे---

1. दाल को अच्छी तरह चार पांच पानी से धो ले,जबतक दाल में रखा पानी साफ न दिखने लगे।

2. दाल को लगभग एक घंटा पानी में डालकर रखें।

3.कूकर में दाल बिना छौंक के, सीधे दाल,हल्दी,नमक,पानी डालकर गैस पर चढ़ाए और कूकर का ढक्कन न लगाए।

4.कूकर गर्म होते ही दाल में से फेन निकलना शुरू हो जाएगा...यही फेन कारण बनता है यूरिक एसिड बढ़ाने का..तो करछूल की मदद से कूकर से सारा फेन बाहर निकाल ले और फिर कूकर का ढक्कन बंद कर दाल को गैस पर चढ़ा दे।

यकीन मानिए...इससे आपको पेट में गैस,एसिडिटी,यूरिक एसिड आदि में जरूर आराम मिलेगा।फोटो डालती हूँ---


ये दाल वाली बात मैंने अपने मोबाइल पर किसी चैनल पर देखी थी,मुझे अच्छी लगी तो मैंने अपनी मम्मी और मम्मी दीदी(मौसी) को भी बताया...जब से वो ऐसी दाल बना रही हैं उन्हें फायदा दिख रहा है।आप भी ट्राई करें।

तो बस आज के लिए बस इतना ही....कल फिर मिलते हैं....

----- अनुगुंजा




गुरुवार, 21 अक्टूबर 2021

उठा-पटक वाली चाय

 टीवी वाला कमरा हमारे घर का इंटरटेनमेंट रूम होता है,जहां हम चाय पीने से लेकर टीवी देखते हुए सब्जी काटने तक का काम करते हैं।आज पेंटिंग कराने की बारी हमारे टीवी वाले रूम की थी...सो पूरा कमरा उलट-पुलट हो गया,ड्रेसिंग टेबल,तोसक(गद्दा),कूलर,लकड़ी के सेल्फ,सोफा,कुर्सी,टेबल,टीवी सब बाहर आ गया....टीवी वाला कमरा पूरी तरह से खाली हो गया....मगर सबसे बड़ा टास्क बचा था वो था बड़का गोदरेज अलमारी को घसकाना,लेकिन पेंटर इतने अच्छे थे कि उन्होंने इस असंभव लगने वाले काम को भी कर दिया।अब टीवी वाले रूम के बाहर का नजारा तो उठा-पटक वाला था...हमें समझ में नहीं आ रहा था कि हम सब सुबह की चाय कहां पियेंगे? क्योंकि ये पेंटर सब सुबह सात बजे ही चले आए थे...ये तो अच्छा हुआ था कि हमने कल रात ही टीवी वाला कमरा लगभग खाली कर लिया था।इसलिए कहते हैं अग्र सोची सदा सुखी...मतलब जो आगे की सोचता है वो हमेशा सुखी रहता है।किसी तरह हम सब भी इसी उठा-पटक में चाय  पिये।देखिए...आप भी उठा-पटक वाली चाय को---


चाय पीने के बाद पेंटर पेंटिंग के काम में लग गए और हम अपने रसोईघर में....आज मम्मी ने बिना लहसून-प्याज वाली कद्दू की सब्जी बनाई,जो बहुत टेस्टी थी।मम्मी ने कढ़ाई में तेल डाला,फिर तेल के गर्म होने पर उसमें जीरा,सरसो,अजवाइन,मंगरैल,हरी मिर्च,कसूरी मेथी का फोड़न डाला...उसके बाद उसमें मूली काटकर डाला,फिर उसमें कटा कद्दू डाला और फिर हल्दी,नमक डालकर...थोड़ा सा पानी डाला फिर प्लेट से ढक कर धीमी आंच पर पकाया...जब कद्दू पूरी तरह गल गया और पानी सूख गया...तो फिर धनिया का पत्ता डालकर गैस पर से सब्जी को उतार लिया।यकिन मानिए...कद्दू की सब्जी बहुत स्वादिष्ट बनी....पापा ने तो बहुत तारिफ की...मेरे पापा जल्दी किसी खाने की तारिफ नहीं करते हैं।आप भी जरूर बनाएं...कद्दू की सब्जी का फोटो डाल रही हूँ देख ले----


आज पूरे दिन टीवी बंद था....मगर इसका फायदा भी हुआ,आज हमारे पास बात करने को बहुत कुछ था.....पुरानी पड़ी किताबों को भी पढ़ने का समय मिल गया...तब मुझे लगा कि हर चीज के पीछे कुछ न कुछ अच्छा जरूर होता है।पापा, मम्मी और मैंने ने आज की बढ़ती महंगाई पर जमकर बात की,फिर पापा ने बताया कि उनके परबाबा(पापा के दादा जी के दादा) के समय एक रूपये में पूरे महीने का घर खर्च चल जाता था और पचास पैसे में चार कचौड़ी-आलू की सब्जी और दो जलेबी मिलती थी।ये सब सुनकर मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था....फिर मम्मी ने बताया कि नाना जी जब टीचर थे तो उन्हें चालिस रूपया महीना वेतन मिलता था,ये बात 1975 की है...यानि बहुत पहले की भी नहीं है।फिर आज क्या ऐसा हुआ, जो महंगाई आसमान से भी ऊँची निकल गई और मध्यमवर्गीय मुँह देखता रह गया? इस सवाल का जवाब मम्मी पापा के पास भी नहीं था।

आज के समय में सबसे ज्यादा तकलीफ में मध्यमवर्गीय परिवार ही है,क्योंकि ये न तो अमीर है और न गरीब....ये बीच में झूलता रहता है।सरकार भी कभी मध्यमवर्ग के लिए नहीं सोचती है,कोरोना काल में भी राशन,मदद सब गरीब(बी.पी.एल)को ही मिला...यहां भी मध्यमवर्ग मारा गया।बेरोजगारी का अभिशाप भी यही वर्ग झेल रहा है,महीने का अंत होते होते घर के खत्म होते बजट की मार भी यही मध्यमवर्ग खा रहा है।यही सब बातें टीवी के अभाव में हमारी आज होती रही....

आज मम्मी ने भी धूल में पड़ी फणिश्वर नाथ ' रेणु ' जी की एक किताब खोज निकाली,उसे साफ किया और लगी पढ़ने....इस किताब को पढ़कर मम्मी बहुत भावुक भी हो गई और कहानी मुझे भी सुनाई।मुझे भी उनकी कहानी बहुत मार्मिक लगी,आँखों से आंसू निकल आए।सही में बहुत महान साहित्यकार थे ' रेणु ' जी...उनकी कलम में शब्दों,भावनाओं का जादू जैसा था।आज टीवी न चलने के कारण मम्मी और मैंने इस महान साहित्यकार की रचना को जाना।मम्मी तो किताब पढ़ते पढ़ते एकदम खो गई थी....मैंने चुपके से तस्वीर ले ली----


आज की सबसे अच्छी बात ये रही कि पेंटर ने दोपहर तीन बजे तक टीवी वाले कमरे की पेंटिंग का काम न सिर्फ पूरा कर लिया...बल्कि सब सामान जगह पर ला कर रख भी दिया।फिर मैंने सफाई करना शुरू किया और टीवी वाला एकदम साफ हो गया।फिर मम्मी ने भाई को कहा कि अब टीवी लगा दो....फिर भाई ने टीवी लगा दिया और टीवी को ऑन भी कर दिया।बस शुरू हो गया..टीवी सीरियलों की भरमार।पापा,मम्मी सब खुश,सबने अपनी अपनी जगह पकड़ी और टीवी देखना चालू हो गया।

और मैंने दिनभर की बातों को अपने ब्लॉग में समेटकर लिखना शुरू कर दिया...

तो आज के लिए बस इतना ही...कल फिर मिलते हैं----

-------- अनुगुंजा








बुधवार, 20 अक्टूबर 2021

घड़ी-घड़ी की बात

 समय हमेशा चलता रहता है ये कभी नहीं रूकता है,समय की तुलना हम घड़ी से अक्सर करते हैं।आज मुझे मेरे नाना जी की घड़ी मिली....जो नाना जी को बहुत प्यारी थी।नाना जी हमेशा उस घड़ी को अपनी कलाई पर बांध कर रखते थे,बोलते थे कि उन्होंने 18 रुपये में इसे खरीदा था।जब भी रेडियो पर बी.बी.सी या आकाशवाणी के समाचार का वक्त होता था,तो नाना जी झट से अपनी घड़ी देखते और रेडियो ऑन कर देते थे।ये सब यादें आज भी मुझे याद है.....आज जब नाना जी की घड़ी मुझे मिली,तो सब यादें ताजा हो गई।नाना जी की वो घड़ी तो बंद पड़ गई है पर लगता है कि आज भी उसने समय को रोक रखा है,उस घड़ी की रुकी सूई बहुत कुछ एहसास कराती है...उस घड़ी से नाना जी के हाथों की खुशबू आती है,नाना जी जब आशीर्वाद देने के लिए अपना हाथ मेरे सिर पर रखते थे तो उनकी घड़ी अक्सर मेरे माथे को छू जाती थी...उसकी बेल्ट की ठंडक( घड़ी की बेल्ट स्टील की है) का एहसास मुझे आज भी होता है।आप भी देखे...मेरे नाना जी की घड़ी को----



ये आज बहुत बड़े इत्तेफाक की बात है कि आज नाना जी घड़ी मिली और आज ही मेरे भाई का ऑनलाइन " स्मार्टवॉच " आया....सही बात है सब घड़ी - घड़ी की बात है।मेरे भाई के स्मार्टवॉच में बी.पी देखा जा सकता है,ऑक्सीजन का लेबल देखा जा सकता है,दिल की धड़कन भी देखी जा सकती है...मोबाइल से पूरी तरह कनेक्ट है वो स्मार्टवॉच।आपको फोटो दिखाती हूँ----

इस स्मार्टवॉच में मिनट-सेकेंड की सूई नहीं है...सबकुछ ऑटोमेटिक है।आज के रॉकेट युग में वक्त के साथ बदलना ही पड़ेगा...तेज और तेज दौड़ना ही पड़ेगा,कम समय में ज्यादा काम करना ही होगा....अगर हम ये कहे कि इंसान को मशीन बनना ही पड़ेगा,तो गलत नहीं होगा।

लेकिन कही न कही....पहले वाला एहसास कहीं छूट सा गया है,जो फिलिंग(महसूस) हमें अपने नाना-नानी के चीजों को देखकर आती है क्या हमारे बाद की जेनरेशन को भी हमारे लिए आएगी?....शायद नहीं !!!! क्योंकि तबतक सबकुछ मेटैलिक(धातु) हो चुका होगा,भावना-एहसास खत्म हो चुकी होगी।आज के बच्चे मोबाइल पर वीडियो गेम,पबजी ही खेलते हैं शाम को दौड़कर खेलने वाली बात अब बीते जमाने की हो गई है।

आज की सुबह की चाय में हमारी चर्चा बिहार में हो रही बारिश पर रही....ये पूरा साल पानी पानी ही रहा,कभी मॉनसून की बारिश,फिर सावन,भादो,हथिया नक्षत्र की बारिश( बड़े बड़े बूंदों वाली),और फिलहाल चित्रा नक्षत्र की बारिश.....लगता है इस साल सारा मौसम,नक्षत्र वर्षा ही कराएगा बिहार में।हम सब ये भी बात कर रहे थे कि बिहार को बारिश इसलिए चुभती है क्योंकि यहां बाढ़ संग भयंकर जलजमाव होता है....और सड़क पर पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है।ऊपर से सड़कों पर बेहिसाब अतिक्रमण है,सड़क पर फैली ये फेरी वाली दुकाने सड़क की चौड़ाई को बहुत कम कर देती है....नतिजा ट्राफिक जाम होता है।तो सुबह की चाय ज्यादातर इन्हीं विषयों पर हमारी होती है।

आज हमारे चौके(रसोईघर) के खिड़की-दरवाजे की पेंटिंग हो रही थी...इसलिए आज सिर्फ परवल-आलू का लहसून-हल्दी-लाल मिर्च डालकर भुजिया ही बना,जिसे हम चावल-दाल के साथ खाए....

आज मुझे एक बात पर बहुत गुस्सा आया....कुछ दुकानदार लिखी हुई पर्ची के हिसाब से सामान नहीं देते हैं,बल्कि जो प्रोडक्ट उनके पास होता है वही दे देते हैं...जो बहुत गलत बात है।मेरे पापा की आदत है कि वो दुकान पर झोले में लिया सामान पर्ची से नहीं मिलाते हैं,जो दुकानदार दे देता है पर्ची देखकर वही लेकर आ जाते हैं।तो हमारे शहर के एक प्रतिष्ठित दुकान के दुकानदार ने अपनी मनमर्जी से किसी दूसरे ब्रांड का तेल,साबुन दे दिया,जब मैंने फोन करके उनकी गलती बताई,तो वो माफी मांगने लगे।ये तो ग्राहक के साथ धोखा है...अगर ग्राहक आप पर भरोसा करता है तो आपको भी तो अपना काम ईमानदारी से करना चाहिए।

तो चलिए आज के लिए इतना ही.....कल फिर मिलते हैं कुछ नयी बातों के साथ....

----- अनुगुंजा

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2021

आग लगी सब्जी में

 अरे !!!! अरे !!!! ....थोड़ा रूके,टाइटल पढ़कर ये मत सोचे कि सब्जी में आग लग गई है...यहां बात सब्जी के बढ़ते दाम को लेकर है।आज सुबह से ही रूक रूक कर बारिश हो रही थी,ऊपर से सारी सब्जी भी फ्रिज से गायब थी मतलब खत्म हो गई थी......सो जब मैंने एक सब्जी वाले की आवाज सुनी,तो उसे रोका और दौड़कर नीचे गई सब्जी लेने।सीढ़ी से उतरते उतरते मैंने मामी को भी बोल दिया कि सब्जी वाला बहुत सारी सब्जी लेकर आया है।ये इंसान का स्वभाव होता है कि उसे जब किसी चीज की जरूरत होती है और उसी समय वो चीज मिल जाती है तो वो बहुत खुश हो जाता है।आज मम्मी बोल ही रही थी खाली आलू बचा है उसकी का चोखा( भरता ) बना देंगे....मगर तभी सब्जी वाला आ गया।

"  दाम में आग लग गया " ये कहावत बहुत लोकप्रिय है,इसका मतलब दाम बहुत बढ़ गया है।तो सब्जी के दाम में भी आग लग गया है....धनिया का पत्ता चालिस रुपये का सौ ग्राम,कद्दू भी चालिस का,परवल साठ रुपये किलो,बैगन भी साठ का....अब बताइए,जब इतनी महंगी सब्जी होगी,तो आम आदमी क्या खाएगा? गरीब तो भूखा मर जाएगा...हम समझते हैं कि भारी बारिश के कारण बिहार में सब्जी की खेती बर्बाद हो गई है और इसी कारण से दाम बढ़े हैं पर क्या गरीब-मध्यमवर्गीय परिवार का बजट ये बात समझेगा? भूखा पेट मानेगा?.....उसे तो हर हाल में दो वक्त की रोटी-दाल-सब्जी बनानी ही पड़ेगी।बिहार एक बाढ़ ग्रस्त राज्य है....यहां हर मोहल्ले,गली,सड़क पर जलजमाव भी होता रहता है...लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि मुसिबत से सरकार अपनी आँखें मूंद ले और बढ़ने दे दामों को।बिहार सरकार को कुछ उपाय सोचना ही होगा।आप जानते हैं आज मैंने एक सौ चालिस रुपये में थोड़ी सी सब्जी ली....मम्मी तो कह रही थी कि इन सब्जी सबको सजाकर अलमारी में रख दो।तो मैंने भी सजाया पर पलंग पर....आप भी देखे...

ये फोटो महंगाई के नाम----


आज हमारी सुबह की चाय बहुत खास रही....वजह थी चर्चा बिहार और बिहारी पर।महाराष्ट्र में भी बिहारी को खदेड़ा गया था कुछ साल पहले...आज कश्मीर से भी बिहारी को न सिर्फ खदेड़ा जा रहा है बल्कि बिहारी की हत्या भी हो रही है।ये सब देखकर मन बहुत दुखी होता है....हम बिहारी से कहा जाता है कि आप हमारे राज्य को रोजगार छिनते हैं,तो भाई !!!! हममे टैलेंट है तब न हमें काम मिलता है,हम योग्य हैं इसलिए नौकरी पाते हैं कोई हमें भीख नहीं देता है।कश्मीर से अपनी जान बचाने के लिए बिहारी वहां से पलायन कर रहे हैं...जिस रोजी-रोटी कमाने वो परदेश गए थे आज जान बचाकर वापस आने को मजबूर है।बिहार से पलायन इसलिए होता है क्योंकि यहां बेरोजगारी अपने चरम पर है और सरकार सोई हुई है।

इन सब बातों पर चर्चा के साथ हमने ये भी चर्चा किया कि बिहारी बहुत बड़े लापरवाह हैं....आज के समय में बिहार में मास्क लगाना,दो गज दूरी वाली बात लोग बिलकुल भूल चुके हैं।कितने बिहारी तो ये कहते हैं कि कोरोना चला गया है...समझ में नहीं आता ये अशिक्षा है या पढ़े लिखो का जाहिलपना?....न कोई ट्राफिक नियम मानता है और न ही स्वच्छता अभियान में योगदान देता है....बिहार के ज्यादातर लोग मुँह में गुटखा,खैनी,तम्बाकू चबाते रहते हैं और यहां वहां थूकते रहते हैं।इन्हीं सब बातों के कारण बाहर बिहार बदनाम होता है और खुद को बिहारी कहलवाने में लोग हिचकिचाते हैं।महाराष्ट्र के लोग आपस में मराठी भाषा में बेहिचक बात करते हैं,बंगाली भी बांग्ला भाषा में आपस में बात करते हैं....लेकिन बिहारी लोग बज्जिका,भोजपुरी भाषा में बात करने में शर्म महसूस करते हैं.....जो बिलकुल गलत बात है।

सुबह की चर्चा लम्बी रही, हमारी चाय का कप खाली हो गया था पर चर्चा चलती रही।

आज मैंने बैगन आलू की सब्जी बनाई....तेल में हींग,जीरा,तेजपत्ता,सूखा लाल मिर्च का फोड़न दिया,फिर प्याज काटकर डाला और प्याज हल्का भूरा होने तक भूना...फिर टमाटर डालकर भूना,फिर लहसून-अदरक का पेस्ट डालकर भूना...उसके बाद उसमें हल्दी,धनिया पाउडर,लाल मिर्च,कश्मीरी लाल मिर्च( इससे सब्जी का रंग बहुत अच्छा आता है और ये तीखा भी नहीं होता),नमक,गर्म मसाला डालकर करची खूब चलाई....उसके बाद बैगन-आलू डालकर उसे साथ में भूना(थोड़ा पानी भी डाला)....छोलनी( करची) से आलू बैगन को एकदम मैस(बैगन आलू नजर नहीं आना) कर दिया....और बस धनिया का पत्ता डाला और सब्जी को गैस पर से उतार लिया।बन गई आलू बैगन की मैस की हुई मस्त टेस्ट वाली सब्जी।सब्जी का फोटो दिखाती हूँ-----


आपको तो एक बात बताना भूल ही गई....कल मैंने अपना दूसरा पॉडकास्ट अपलोड कर दिया है एंकर पर....इस बार का मेरा विषय " जिन्दगी " था। कुछ न कुछ अच्छा करने की कोशिश करती रहती हूँ।

बारिश के बाद से हल्की ठंड ने दस्तक दे दी है।पंखा अब हम नहीं चलाते हैं...रात को भी एक चादर की ठंड लगती है।मेरी ये बैगन आलू की सब्जी चावल से ज्यादा रोटी के साथ अच्छी लगती है खाने में।

तो चलिए...आज के लिए बस इतना ही,कल फिर मिलते हैं...

------ अनुगुंजा



सोमवार, 18 अक्टूबर 2021

पुरानी खिड़की नई बनी

 हमारा घर बहुत पुराना है....लगभग 1960 का बना है।तो जाहिर सी बात है..घर का खिड़की-दरवाजा भी पुराना ही होगा,जबतक घर का पेंट नहीं हुआ था तबतक पूरा घर अंधेरा जैसा लगता था...सूर्य की रौशनी भी अपनी चमक बिखेर नहीं पाती थी और हमारा घर बहुत बूढ़ा जैसा लगता था।अब जब पेंटिंग हो रही है तो पूरा घर किसी बच्चे की तरह मुस्कुरा रहा है....,छत-दीवारें वही है...पर घर नया लगता है।एक नई ऊर्जा महसूस होती है...शाम-रात में भी घर से रौशनी फूटती है...इससे मन बहुत खुश रहता है।शायद इसे ही पॉजिटिव एनर्जी कहते हैं।तो सही कहा जाता है कि अगर हमें अपनी जीवन में बदलाव लाना है,निरसता को दूर करना है...तो हमें सबसे पहले अपने घर में बदलाव लाना चाहिए...

जरूरी नहीं है कि हम हमेशा अपने घर का पेंट करवाते रहे या दीवारों के रंग बदलवाते रहे...अगर हम अपने घर में रखे सामानो का जगह भी बदल दे.जैसे- ,टीवी,फ्रिज,पलंग,सोफा सेट,डाइनिंग टेबल....आदि के रखने वाली जगह में चेंज ले आए ...तो इससे भी घर में पॉजिटिविटी आती है।एक पॉजिटिव अच्छी सोच पूरे घर के माहौल को खुशनुमा बना देती है।तो जीवन के साथ घर में भी बदलाव जरूरी है।हमारी पुरानी खिड़की नई बन गई है....आप भी देखे----


उम्मीद करती हूँ हमारी खिड़की आपको भी पसंद आई होगी।ये तो बात थी हमारी सोच के अनुसार होने वाले बदलाव की...लेकिन कभी कभी जिन्दगी बिना हमसे पूछे अपनेआप चेंज ले आती है,ये बदलाव अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी।कहते है न कि कोयले की खादान में हजारों काम करते हैं पर हीरा किसी किसी को ही मिलता है और कभी किसी सुपर स्टार का बेटा नशा(ड्रग) लेने का कारण जेल की हवा खाता है...उस सुपर स्टार के जीवन में भी जो बदलाव आया,वो किसी डरावने सपने की तरह होगा,उम्मीद करती हूँ आप उस सुपर स्टार का नाम गेस कर लिए होंगे।

जब हमारे परिवार का कोई सदस्य हमसे दूर जाता है तो मन बहुत दुखी हो जाता है।एक तरफ तो हम उसकी कामयाबी की मंगलकामना करते हैं वही दूसरे तरफ उसकी कमी भी बहुत खलती है।मेरे मामा का बेटा " भास्कर " ...मेरा भाई ...आज अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए खड़गपुर चला गया....हालाकि भास्कर से मेरी रोज बात नहीं होती थी बस आते-जाते हम मिल लेते थे...लेकिन फिर भी जब वो जा रहा था तो मन बहुत खाली खाली लग रहा था और घर भी बहुत सूना लग रहा था।कोरोना के कारण मेरा भाई भास्कर लगभग दो साल से घर पर ही था...ऑनलाइन पढ़ाई करता था पर जब कॉलेज खुला तो उसे जाना पड़ा।भाई जब जा रहा था तो उसे गेट तक छोड़ने की हिम्मत भी मेरी नहीं हुई।मैं ऊपर से देखती रही और उस समय मेरी आँखों में आंसू आ गए थे....शायद यही होता है भाई-बहन का रिश्ता,राखी के धागे की डोर बहुत मजबूत होती है पर अनेक बार आंसू से भीग भी जाती है।छठ-दिवाली में भी भास्कर को छुट्टी नहीं मिलेगी...ये सुनकर मन और दुखी हो गया।खैर !!!!बहन हमेशा दुआ देती रहेगी कि तुझे सफलता जरूर मिले।

आज छोटू( बिल्ला) की तबियत ठीक नहीं थी...जैसा कि मैंने पहले बताया था कि छोटू अपाहिज है सामान्य बिल्ली की तरह दौड़ नहीं सकता है,छलांग नहीं लगा सकता है... बस किसी तरह चल लेता है।छोटू हमेशा घर में ही रहता है,कहीं बाहर नहीं जा सकता है....मेरा भाई रिषभ उसे अपने साथ,अपने पलंग पर सुलाता है....वो भी पलंग पर दो-तीन चादर से गोल गोल घेर कर घोंसला जैसा बनाकर,जिसे " गुज्जु " हम सब कहते हैं और छोटू भी ये गुज्जु शब्द को खूब समझता है।जैसे ही छोटू के मन लायक गुज्जु तैयार हो जाता है छोटू झट से आकर गुज्जु में बैठ जाता है.......अगर गुज्जु उसके मन लायक नहीं बनता है तो छोटू अपने पैर से ठीक करने की कोशिश करता है।छोटू के स्पाइन में तकलीफ है,शरीर का पिछला हिस्सा बहुत कमजोर है....आज छोटू का पिछला पैर कांप रहा था,थोड़ा चलने पर ही बैठ जाता था। उसके डॉक्टर से मम्मी बात की और डॉक्टर के अनुसार दवा दे रही है....उम्मीद करते हैं हमारा छोटू ठीक हो जाए।ये देखिए...हमारे छोटू को----


आज खाने में कुछ खास नहीं बना...क्योंकि छोटू बीमार था।हमारे घर में जो पेंटर काम कर रहें हैं वो बूढ़े हैं पर अपने काम में एकदम ईमानदार है।पेंटिंग बहुत अच्छे से करते हैं,सुबह नौ बजे से लेकर शाम के चार बजे तक लगातार काम करते हैं....बीच में सिर्फ एक बार खाना खाने जाते हैं।हम उन्हें चाय और पानी देते रहते हैं।कितनी बार जब शाम के चार बज जाते हैं और उनका काम बचा रहता है तो वो बिना घड़ी को देखे अपना काम पूरा करते हैं...फिर चाहे पांच ही क्यों न बज जाए।जाने से पहले सारा सामान जगह पर रख देते है....और अपनी मर्जी से एक्सट्रा काम भी कर देते हैं(जैसे आइना साफ करना).....उनसे ये सीखने को मिलता है कि हमें हमेशा अपने काम में अपना बेस्ट देना चाहिए।

तो बस आज के लिए इतना ही....कल फिर मिलते हैं----

----- अनुगुंजा




रविवार, 17 अक्टूबर 2021

रोहू मछली फ्राई

 जितने भी मांसाहारी( नॉनवेज खाने वाले) है उनके मुँह में पानी आ गया होगा...इस ब्लॉग का टाइटल पढ़कर,रोहू मछली फ्राई खाने की बात ही कुछ और होती है।आप ये न सोचे कि चुकी मैं मछली खाने की बात कर रही हूँ तो मैं मांसाहारी हूँ...

न बाबा रे!!!!....मैं शाकाहारी हूँ और मेरा भाई भी,लेकिन हमारे घर में हमारे मम्मी-पापा और छोटू( बिल्ला) पूरी तरह से मांसाहारी है।आपको ये जानकर ताज्जुब होगा कि मेरा भाई जन्म से शाकाहारी है पर वो अपने प्यारे छोटू के लिए मछली लेने न सिर्फ मछली बाजार जाता है,बल्कि अच्छे से देखकर ताजी मछली ही लाता है।ये होता है सच्चा प्यार....जो किसी बंधन का मोहताज नहीं है।छोटू बहुत बीमार रहता है,पर जब मछली खाता है तो बहुत खुश हो जाता है...तो बस उसके लिए।आप जानते हैं छोटू बिल्ला है पर मम्मी जब भी उसे मछली खाने को देती है तो पूरी तरह से कांटा निकाल कर,ताकि कांटा उसके गले में न अटक जाए।कुछ साल पहले छोटू के गले में ट्यूमर हो गया था जो जब फटा तो छोटू के गले में छेद हो गया था,जिसे मेरे भाई ने दिन रात की सेवा,ड्रेसिंग,दवा से पंद्रह दिनों में भर दिया।इसलिए हमारे घर की जान है छोटू।

मम्मी का सबसे फेवरेट मछली ही है....और जब ताजा मछली आता है तो मम्मी की खुशी का ठिकाना नहीं रहता है।तो बस छोटू बाबू पहले से रसोईघर में बैठ गए...और मम्मी ने मछली बनाना शुरू किया।मछली को सबसे पहले गर्म पानी और नींबू से अच्छी तरह साफ किया,फिर उसमें हल्दी,नमक,लहसून डालकर अच्छी तरह से सान( मिला) लिया....तब तक कढ़ाई का तेल गर्म हो चुका था...तो बस एक एक करके मछली का पीस तेल में डालकर छानती गई।मछली में रस नहीं लगाया,क्योंकि छोटू को रस पसंद नहीं है।सबसे पहले छोटू जी ने मछली खाया....बाकि सब बाद में....

आज मैंने दाल,भात( चावल ) और आलू का चोखा( आलू का भरता)खाने में खाया और साथ में कल वाला सोयाबिन का भुजिया भी खाया,जैसा की मैंने पहले बताया था कि मेरी मम्मी खाना बर्बाद नहीं होने देती है जब तक खाना खाने योग्य रहे...रोज रोज मसालेदार खाना ठीक नहीं होता है,कभी कभी सादा खाना भी खाना चाहिए।

जब हम कुछ ऑनलाइन सामान मंगवाते हैं,तो कभी कभी हम भी भूल जाते हैं कि क्या मंगवाया था.....आज जब पार्सल आया और मैं नीचे जाकर उसे लेकर ऊपर आई,तो भाई का पहला सवाल यही था कि हमने क्या मंगवाया था? फिर बिना टाइम बर्बाद किए हमने पहले हाथों से पैकेट खोलने की कोशिश की...जब नहीं हुआ तो कैंची का सहारा लिया।पैकेट से निकला कर्टन( परदा) जिसे हमने अपने बरामदे के लिए लिया था...कलर और कपड़ा दोनों बहुत प्यारा है,मैं इसका फोटो डाल दूंगी।ये कर्टन हमारे दीवार के कलर से बहुत अच्छा मैच कर रहा है....आखिर पसंद मम्मी की जो है।इसके साथ भाई ने प्लास्टिक के कुछ छोटे छोटे प्लांट (पौधे) भी मंगवाए थे...जो घर की सजावट में काम आएगा,उसका फोटो भी डाल दूंगी।मोबाइल पर ऑनलाइन शॉपिंग मन को बदल देता है,एक नई ताजगी ले आता है....आप कुछ सामान खरीदे या न खरीदे,पर देखने मात्र से मुड फ्रेश हो जाता है।हालाकि मेरी मम्मी ज्यादा मोबाइल पर आँख गड़ाकर उसे देखने के सख्त खिलाफ है,पर क्या करें..हम भाई-बहन डांट सुनकर भी मोबाइल पर शॉपिंग कर ही लेते हैं।

आज दो दिन के बाद मुझे न्यूजपेपर के दर्शन हुए....मन को बड़ी शांति मिली,ऐसा लगा कि दो दिनों से मैं पिंजड़े में बंद थी दिन दुनिया की कोई खबर ही नहीं थी।न्यूजपेपर पढ़ना मेरी आदत है वो भी बचपन की।लेकिन जब आज पढ़ा तो दुख ही हुआ...इन दो दिनों में न जाने कितने ऐसे खबर सामने आए,जिसे पढ़कर मन कांप गया।ऊपर से लगभग दो सालों से चलने वाले किसान आंदोलन ने तो सारी हदे ही पार कर दी....इंसानियत जैसी कोई चीज भी होती है यही भूल गए और हैवानियत कर डाली।न्यूजपेपर या न्यूजचैनल को देखकर जब मुझे बहुत गुस्सा आता है तो फिर मेरी कलम चल पड़ती है।एक कविता लिखी है आप देख ले...फोटो डाल देती हूँ।

तो चलिए आज के लिए बस इतना ही....कल फिर मिलते हैं...

------- अनुगुंजा

परदा-----


मछली फ्राई-----
मेरी कविता------



जन्मदिन मम्मी का

  अगर हो सकता तो, मैं तारें तोड़ लाती, तेरी पैरों की पायल में सजा डालती....  कदमों में "माँ" तेरी जन्नत बसती है मेरी, तेरी हर आहट ...