आज सुबह एक बहुत अजीब वाक्या हुआ...असल में पापा को गांव जाना था आज...क्योंकि गांव की रिश्तेदारी में कोई मर गया था सो उसकी तेरहवीं का भोज था।लेकिन पापा को सर्दी और हल्का बुखार हो गया था इसलिए वो गांव नहीं जा सकें,लेकिन उनको न्योता करना था...इसलिए उन्होंने गांव में किसी को फोन घूमाया।पापा फोन पर चिल्ला चिल्ला कर बोलते रहे कि " अरे !!!! हम उसके लिए फोन नहीं किए हैं...हम गांव नहीं आ रहे हैं मेरे तरफ से पचास रूपया से न्योता दे देना। " अंत में हार कर पापा ने मोबाइल मुझे दे दिया,फिर मैंने भी जब खूब जोर से अपनी बात समझाई,तो वो समझ गया। लेकिन साथ ही उसने बड़ी खुशी के साथ बोला कि शाही जी की तबियत के बारे में भी बोल देंगे और न्योता दे देंगे।फोन काटने के बाद पापा ने मुझे बताया कि असल में पापा की खेतों की देखभाल वो करता है और उसने पापा से कुछ रूपये कर्ज लिए थे....सबसे बड़ी बात वो बहरा है,तो बेचारे को लग रहा था कि पापा अपना कर्ज वापस मांग रहे हैं,लेकिन जब पूरी बात सुनी तब खुश हो गया।उस बहरे की इस बात पर मैं और पापा खूब हंसे।
ठंड बढ़ रही है और हमारा पूरा बरामदा खुला है..पेंट होने के कारण सारे पर्दे हटा दिए थे और वो पुराने थे फट भी गए हैं....इसलिए शाम होते ही बहुत ठंड लगने लगती है।तो आज की सुबह की चाय में मामी ने सजेशन दिया कि नया प्लास्टिक से ग्रिल को कवर कर दो और फिर पर्दा लगा लो...इससे लुक भी खराब नहीं होगा और ठंड से भी बचाव हो जाएगा।आज पेंटर सब भी नहीं आए...और पापा भी गांव नहीं गए,तो मैंने और मम्मी ने टाइम को यूटिलाइज किया और प्लास्टिक लेने के लिए मार्केट जाना तय किया।असल में हम छोटू(बिल्ला) को अकेले घर में नहीं छोड़ते हैं वो बहुत रोने लगता है....इसलिए छोटू को पापा पर छोड़कर हम मार्केट गए।
भगवान ने हम सबको ग्यारह नम्बर की गाड़ी दी है...अरे !!! भई मैं हमारी दो टांगों की बात कर रही हूँ।चलना हम सबके लिए बहुत जरूरी है...आज मेरी मम्मी एक महीने बाद सीढ़ी से नीचे उतरी थी।पहले मैंने उसे बहुत उत्साह-हौसला दिया कि कुछ नहीं होगा....उसको बहुत मजा आएगा,तो मेरे बहुत कहने पर वो मार्केट जाने के लिए तैयार हो गई।हम मार्केट के लिए अपने चौक तक ही गए...पर पैदल चलकर।मैंने अपनी मम्मी का हाथ थामा और धीरे धीरे चलते रहें हम।इतने दिनों बाद मम्मी बाहर निकली थी सो उसके पैर में बहुत तेज दर्द भी हो रहा था....पर मैं हौसला उसे देती जा रही थी।मेरी नजर सड़क की ठोकरों पर थी...ताकि मम्मी को चोट न लग जाए।
मम्मी का हाथ पकड़े जब मैं चल रही थी...तो मुझे बहुत अच्छा लग रहा था,मम्मी भी बाजार की भीड़ को देख रही थी और हम बातें कर रहें थे।
इसी दौरान एक दुकान पर एक महिला से मेरी बहस भी हो गई...मैं कैट फूड के बारे में पूछ रही थी तो वो महिला बोली " आपने बिल्ली पाला है !!! बिल्ली नहीं पालना चाहिए...वो मालिक का नुकसान चाहती है "....मैंने उसे जवाब में बस यही बोला कि कई सालों से हमारा छोटू हमारे घर की जान है,मुस्कान है.....वो रोज आरती लेता है,प्रसाद खाता है...।फिर वो महिला चुप होकर निकल गई।मुझे समझ में नहीं आता है कि हम किस युग में जी रहे हैं?...लोग पढ़ लिखकर भी इतने अंधविश्वासी कैसे हो सकते हैं?क्या फायदा ऐसी शिक्षा का..जो आँखों पर की पट्टी भी न खोल सके।
मार्केट लेने तो हम सिर्फ प्लास्टिक ही गए थे...पर याद कर करके बहुत सामान ले लिया...आप भी देखे...
घर आने पर मम्मी से ज्यादा मैं थक गई...जैसे ही हम सीढ़ी तक पहुंचे,हमारा छोटू गेट पर बैठकर मम्मी का इंतजार कर रहा था...फोटो दिखाती हूँ...
Bhaut sunder
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