मंगलवार, 19 अक्टूबर 2021

आग लगी सब्जी में

 अरे !!!! अरे !!!! ....थोड़ा रूके,टाइटल पढ़कर ये मत सोचे कि सब्जी में आग लग गई है...यहां बात सब्जी के बढ़ते दाम को लेकर है।आज सुबह से ही रूक रूक कर बारिश हो रही थी,ऊपर से सारी सब्जी भी फ्रिज से गायब थी मतलब खत्म हो गई थी......सो जब मैंने एक सब्जी वाले की आवाज सुनी,तो उसे रोका और दौड़कर नीचे गई सब्जी लेने।सीढ़ी से उतरते उतरते मैंने मामी को भी बोल दिया कि सब्जी वाला बहुत सारी सब्जी लेकर आया है।ये इंसान का स्वभाव होता है कि उसे जब किसी चीज की जरूरत होती है और उसी समय वो चीज मिल जाती है तो वो बहुत खुश हो जाता है।आज मम्मी बोल ही रही थी खाली आलू बचा है उसकी का चोखा( भरता ) बना देंगे....मगर तभी सब्जी वाला आ गया।

"  दाम में आग लग गया " ये कहावत बहुत लोकप्रिय है,इसका मतलब दाम बहुत बढ़ गया है।तो सब्जी के दाम में भी आग लग गया है....धनिया का पत्ता चालिस रुपये का सौ ग्राम,कद्दू भी चालिस का,परवल साठ रुपये किलो,बैगन भी साठ का....अब बताइए,जब इतनी महंगी सब्जी होगी,तो आम आदमी क्या खाएगा? गरीब तो भूखा मर जाएगा...हम समझते हैं कि भारी बारिश के कारण बिहार में सब्जी की खेती बर्बाद हो गई है और इसी कारण से दाम बढ़े हैं पर क्या गरीब-मध्यमवर्गीय परिवार का बजट ये बात समझेगा? भूखा पेट मानेगा?.....उसे तो हर हाल में दो वक्त की रोटी-दाल-सब्जी बनानी ही पड़ेगी।बिहार एक बाढ़ ग्रस्त राज्य है....यहां हर मोहल्ले,गली,सड़क पर जलजमाव भी होता रहता है...लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि मुसिबत से सरकार अपनी आँखें मूंद ले और बढ़ने दे दामों को।बिहार सरकार को कुछ उपाय सोचना ही होगा।आप जानते हैं आज मैंने एक सौ चालिस रुपये में थोड़ी सी सब्जी ली....मम्मी तो कह रही थी कि इन सब्जी सबको सजाकर अलमारी में रख दो।तो मैंने भी सजाया पर पलंग पर....आप भी देखे...

ये फोटो महंगाई के नाम----


आज हमारी सुबह की चाय बहुत खास रही....वजह थी चर्चा बिहार और बिहारी पर।महाराष्ट्र में भी बिहारी को खदेड़ा गया था कुछ साल पहले...आज कश्मीर से भी बिहारी को न सिर्फ खदेड़ा जा रहा है बल्कि बिहारी की हत्या भी हो रही है।ये सब देखकर मन बहुत दुखी होता है....हम बिहारी से कहा जाता है कि आप हमारे राज्य को रोजगार छिनते हैं,तो भाई !!!! हममे टैलेंट है तब न हमें काम मिलता है,हम योग्य हैं इसलिए नौकरी पाते हैं कोई हमें भीख नहीं देता है।कश्मीर से अपनी जान बचाने के लिए बिहारी वहां से पलायन कर रहे हैं...जिस रोजी-रोटी कमाने वो परदेश गए थे आज जान बचाकर वापस आने को मजबूर है।बिहार से पलायन इसलिए होता है क्योंकि यहां बेरोजगारी अपने चरम पर है और सरकार सोई हुई है।

इन सब बातों पर चर्चा के साथ हमने ये भी चर्चा किया कि बिहारी बहुत बड़े लापरवाह हैं....आज के समय में बिहार में मास्क लगाना,दो गज दूरी वाली बात लोग बिलकुल भूल चुके हैं।कितने बिहारी तो ये कहते हैं कि कोरोना चला गया है...समझ में नहीं आता ये अशिक्षा है या पढ़े लिखो का जाहिलपना?....न कोई ट्राफिक नियम मानता है और न ही स्वच्छता अभियान में योगदान देता है....बिहार के ज्यादातर लोग मुँह में गुटखा,खैनी,तम्बाकू चबाते रहते हैं और यहां वहां थूकते रहते हैं।इन्हीं सब बातों के कारण बाहर बिहार बदनाम होता है और खुद को बिहारी कहलवाने में लोग हिचकिचाते हैं।महाराष्ट्र के लोग आपस में मराठी भाषा में बेहिचक बात करते हैं,बंगाली भी बांग्ला भाषा में आपस में बात करते हैं....लेकिन बिहारी लोग बज्जिका,भोजपुरी भाषा में बात करने में शर्म महसूस करते हैं.....जो बिलकुल गलत बात है।

सुबह की चर्चा लम्बी रही, हमारी चाय का कप खाली हो गया था पर चर्चा चलती रही।

आज मैंने बैगन आलू की सब्जी बनाई....तेल में हींग,जीरा,तेजपत्ता,सूखा लाल मिर्च का फोड़न दिया,फिर प्याज काटकर डाला और प्याज हल्का भूरा होने तक भूना...फिर टमाटर डालकर भूना,फिर लहसून-अदरक का पेस्ट डालकर भूना...उसके बाद उसमें हल्दी,धनिया पाउडर,लाल मिर्च,कश्मीरी लाल मिर्च( इससे सब्जी का रंग बहुत अच्छा आता है और ये तीखा भी नहीं होता),नमक,गर्म मसाला डालकर करची खूब चलाई....उसके बाद बैगन-आलू डालकर उसे साथ में भूना(थोड़ा पानी भी डाला)....छोलनी( करची) से आलू बैगन को एकदम मैस(बैगन आलू नजर नहीं आना) कर दिया....और बस धनिया का पत्ता डाला और सब्जी को गैस पर से उतार लिया।बन गई आलू बैगन की मैस की हुई मस्त टेस्ट वाली सब्जी।सब्जी का फोटो दिखाती हूँ-----


आपको तो एक बात बताना भूल ही गई....कल मैंने अपना दूसरा पॉडकास्ट अपलोड कर दिया है एंकर पर....इस बार का मेरा विषय " जिन्दगी " था। कुछ न कुछ अच्छा करने की कोशिश करती रहती हूँ।

बारिश के बाद से हल्की ठंड ने दस्तक दे दी है।पंखा अब हम नहीं चलाते हैं...रात को भी एक चादर की ठंड लगती है।मेरी ये बैगन आलू की सब्जी चावल से ज्यादा रोटी के साथ अच्छी लगती है खाने में।

तो चलिए...आज के लिए बस इतना ही,कल फिर मिलते हैं...

------ अनुगुंजा



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