आधा अक्टूबर बीत चुका है,ठंड की हल्की हल्की आहट हो रही है जिसे हम " गुलाबी ठंड " भी कहते हैं।सुबह-सुबह फूल-पत्तों पर ओस की बिखरी बूँदें मोती की तरह सूरज की किरणों में चमकती हैं और छूने पर हमारे हाथों में समाकर कहीं गुम हो जाती है।ऐसा लगता है कि ये ओस वक्त की तरह है जो देखते देखते ओझल हो जाता है,इसलिए हमें अपनी मुट्ठी बंद कर जीवन में आए कोई भी खुशी के पल को जी भरके महसूस कर प्रसन्न होना चाहिए।कल क्या होगा...इसकी फिक्र कभी नहीं करना चाहिए,हम " आज और अभी " में जी कर ही जिन्दगी का आनंद ले सकते हैं।
हां....तो बात शुरू हुई थी बढ़ती ठंड से,अब तो दिन भी छोटा हो गया है तुरंत शाम होकर अंधेरा हो जाता है।रात को खिड़की-पंखा बंद करके भी एक चादर की ठंड लगती है...आजकल हमारे परिवार में सबको सर्दी,गले में दर्द,खांसी की समस्या हो गई है...शायद ये भी ठंड का ही असर है।अब देखे...अभी शाम के चार बजकर सैतालिस मिनट हो रहे हैं...और अंधेरा हो रहा है...फोटो देखे...
इसे ही प्रकृति कहते हैं....तो अपने हिसाब से बदलती रहती है।ये तो इंसान है जो बदलना ही नहीं चाहता है।हम सब जानते हैं कि उम्र हमेशा बढ़ती ही रहती है और हमें अपना जीवन जीने का तरीका उम्र के हिसाब से करना चाहिए।कुछ कामों में कटौती करके हम अपने शरीर की ही रक्षा कर रहे हैं...अपनी बरसो पुरानी आदत को छोड़कर हम परिवार के और करीब जाते हैं....ये सब बातें कुछ लोग नहीं सोचते हैं।जैसे मेरी मम्मी...जो आज भी उतना ही काम करना चाहती है जितना वो आज से बीस साल पहले करती थी,कुछ भी भारी सामान उठा लेती है,घंटों रसोईघर में लगी रहती है...और मना करने पर बुरा मान जाती है।इंसान प्रकृति के जैसा अपनेआप को क्यों नहीं बदलता है? यही सवाल हमारी आज की सुबह वाली चाय का मुद्दा था।मेरी मामी ने बोला कि हालाकि वो सफाई पसंद हैं पर अब चुकी उनके घुटनों में दर्द रहता है तो वो इसलिए अब ज्यादा देर खड़ी नहीं रहती है...और पहले जैसा कोई काम तुरंत नहीं करती हैं,सोच समझकर करती हैं।यही सही भी होता है।
आप सोच रहे होंगे कि टाइटल में तो... डोसा जैसी बेसन की सब्जी थी पर अभी तक तो सब्जी का दर्शन भी नहीं हुआ...और ये क्या बातें होने लगी...तो भई !!!!! हर चीज के होने का सही समय होता है....तो पहले देखे फोटो...फिर बात आगे करते हैं....
फोटो में जितनी टेस्टी सब्जी दिख रही है...यकीन माने उससे कहीं ज्यादा खाने में लगी है।मैंने तो सिर्फ चावल और ये सब्जी खाई है...दाल आदि की जरूरत ही नहीं पड़ी।अब आते हैं इसकी रेसिपी पर...
पहले बेसन का गाढा घोल तैयार कर ले,जिसमें बेसन के साथ हल्दी,मिर्च पाउडर,लहसून,नमक और थोड़ा सा गर्म मसाला का पाउडर को पानी के साथ मिलाकर घोल तैयार कर लें।फिर तवा पर उसके बैटर को फैला ले और दो तीन बूंद ही तेल डाले...धीमी आंच पर पकाएं।थोड़ी थोड़ी देर पर छोलनी(करची) से उस बैटर को थोड़ा थोड़ा उठाकर देखे....जब एक तरफ पक जाए तो फिर करची से उस बैटर को डोसा की तरह मोड़ना शुरू करें....जैसा फोटो में है।इसी तरह करके अपनी जरूरत के हिसाब से डोसा जैसा बेसन तवे पर तैयार कर लें।फिर इसके ठंडे होने पर चाकू से इसे काट ले..आकार आप अपने हिसाब से चुन सकते हैं।
फिर कढ़ाई में तेल डालकर उसमें हींग,जीरा,मेथी दाना,सूखा लाल मिर्च,खड़ा गर्म मसाला का पूरा छोटा पैकेट,तेजपत्ता फोड़न में डालें....फिर बारिक कटा प्याज डालकर लाल करें...फिर कटा टमाटर डालें,उसके बाद हल्दी,लाल मिर्च,धनिया पाउडर,नमक,कश्मीरी लाल मिर्च(तीखा लाल) डालकर खूब भूने....जब तेल छोड़ने लगे तो उसमें पानी डाले और एक उबाल आने पर उसमें कटा हुआ बेसन का पीस डाले....फिर गैस बंद करने से पहले मैगी मसाला(सब्जी वाला) डालें...और बन गई " डोसा जैसी बेसन की सब्जी "....जरूर बनाएं।
आज मेरे घर में पेंट करने वाले पेंटर भईया सब जब आपस में बात कर रहे थे...तो उसमें से एक पेंटर भईया बोला कि वो सुबह पांच बजे उठकर घर में सबके लिए चाय बनाया,झाड़ू लगाया...फिर पत्नी ने जो खाना बनाया उसे अपने लंच बॉक्स में डाला और घर से निकल गया।इसी भईया ने कल बताया था कि इनकी बेटी इंटर फस्ट डिविजन से पास की है और इन्होंने बेटी का आर.डी.एस कॉलेज में बी.कॉम में एडमिशन भी करवा दिया है।ये सब सुनकर बहुत अच्छा लगा....कौन कहता है कि एक गरीब की बेटी पढ़ नहीं सकती,आगे बढ़ नहीं सकती....जरूरत है ऐसे माता-पिता की,जो बेटी को बोझ न समझे और उसे उसके हक का आसमां भी दें और उड़ान भरने की आजादी भी दें।तब ही तो नारी सशक्त होगी।
तो आज के लिए बस इतना ही....कल फिर मिलते हैं...
------ अनुगुंजा
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