समय हमेशा चलता रहता है ये कभी नहीं रूकता है,समय की तुलना हम घड़ी से अक्सर करते हैं।आज मुझे मेरे नाना जी की घड़ी मिली....जो नाना जी को बहुत प्यारी थी।नाना जी हमेशा उस घड़ी को अपनी कलाई पर बांध कर रखते थे,बोलते थे कि उन्होंने 18 रुपये में इसे खरीदा था।जब भी रेडियो पर बी.बी.सी या आकाशवाणी के समाचार का वक्त होता था,तो नाना जी झट से अपनी घड़ी देखते और रेडियो ऑन कर देते थे।ये सब यादें आज भी मुझे याद है.....आज जब नाना जी की घड़ी मुझे मिली,तो सब यादें ताजा हो गई।नाना जी की वो घड़ी तो बंद पड़ गई है पर लगता है कि आज भी उसने समय को रोक रखा है,उस घड़ी की रुकी सूई बहुत कुछ एहसास कराती है...उस घड़ी से नाना जी के हाथों की खुशबू आती है,नाना जी जब आशीर्वाद देने के लिए अपना हाथ मेरे सिर पर रखते थे तो उनकी घड़ी अक्सर मेरे माथे को छू जाती थी...उसकी बेल्ट की ठंडक( घड़ी की बेल्ट स्टील की है) का एहसास मुझे आज भी होता है।आप भी देखे...मेरे नाना जी की घड़ी को----
ये आज बहुत बड़े इत्तेफाक की बात है कि आज नाना जी घड़ी मिली और आज ही मेरे भाई का ऑनलाइन " स्मार्टवॉच " आया....सही बात है सब घड़ी - घड़ी की बात है।मेरे भाई के स्मार्टवॉच में बी.पी देखा जा सकता है,ऑक्सीजन का लेबल देखा जा सकता है,दिल की धड़कन भी देखी जा सकती है...मोबाइल से पूरी तरह कनेक्ट है वो स्मार्टवॉच।आपको फोटो दिखाती हूँ----
इस स्मार्टवॉच में मिनट-सेकेंड की सूई नहीं है...सबकुछ ऑटोमेटिक है।आज के रॉकेट युग में वक्त के साथ बदलना ही पड़ेगा...तेज और तेज दौड़ना ही पड़ेगा,कम समय में ज्यादा काम करना ही होगा....अगर हम ये कहे कि इंसान को मशीन बनना ही पड़ेगा,तो गलत नहीं होगा।
लेकिन कही न कही....पहले वाला एहसास कहीं छूट सा गया है,जो फिलिंग(महसूस) हमें अपने नाना-नानी के चीजों को देखकर आती है क्या हमारे बाद की जेनरेशन को भी हमारे लिए आएगी?....शायद नहीं !!!! क्योंकि तबतक सबकुछ मेटैलिक(धातु) हो चुका होगा,भावना-एहसास खत्म हो चुकी होगी।आज के बच्चे मोबाइल पर वीडियो गेम,पबजी ही खेलते हैं शाम को दौड़कर खेलने वाली बात अब बीते जमाने की हो गई है।
आज की सुबह की चाय में हमारी चर्चा बिहार में हो रही बारिश पर रही....ये पूरा साल पानी पानी ही रहा,कभी मॉनसून की बारिश,फिर सावन,भादो,हथिया नक्षत्र की बारिश( बड़े बड़े बूंदों वाली),और फिलहाल चित्रा नक्षत्र की बारिश.....लगता है इस साल सारा मौसम,नक्षत्र वर्षा ही कराएगा बिहार में।हम सब ये भी बात कर रहे थे कि बिहार को बारिश इसलिए चुभती है क्योंकि यहां बाढ़ संग भयंकर जलजमाव होता है....और सड़क पर पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है।ऊपर से सड़कों पर बेहिसाब अतिक्रमण है,सड़क पर फैली ये फेरी वाली दुकाने सड़क की चौड़ाई को बहुत कम कर देती है....नतिजा ट्राफिक जाम होता है।तो सुबह की चाय ज्यादातर इन्हीं विषयों पर हमारी होती है।
आज हमारे चौके(रसोईघर) के खिड़की-दरवाजे की पेंटिंग हो रही थी...इसलिए आज सिर्फ परवल-आलू का लहसून-हल्दी-लाल मिर्च डालकर भुजिया ही बना,जिसे हम चावल-दाल के साथ खाए....
आज मुझे एक बात पर बहुत गुस्सा आया....कुछ दुकानदार लिखी हुई पर्ची के हिसाब से सामान नहीं देते हैं,बल्कि जो प्रोडक्ट उनके पास होता है वही दे देते हैं...जो बहुत गलत बात है।मेरे पापा की आदत है कि वो दुकान पर झोले में लिया सामान पर्ची से नहीं मिलाते हैं,जो दुकानदार दे देता है पर्ची देखकर वही लेकर आ जाते हैं।तो हमारे शहर के एक प्रतिष्ठित दुकान के दुकानदार ने अपनी मनमर्जी से किसी दूसरे ब्रांड का तेल,साबुन दे दिया,जब मैंने फोन करके उनकी गलती बताई,तो वो माफी मांगने लगे।ये तो ग्राहक के साथ धोखा है...अगर ग्राहक आप पर भरोसा करता है तो आपको भी तो अपना काम ईमानदारी से करना चाहिए।
तो चलिए आज के लिए इतना ही.....कल फिर मिलते हैं कुछ नयी बातों के साथ....
----- अनुगुंजा
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