गुरुवार, 21 अक्टूबर 2021

उठा-पटक वाली चाय

 टीवी वाला कमरा हमारे घर का इंटरटेनमेंट रूम होता है,जहां हम चाय पीने से लेकर टीवी देखते हुए सब्जी काटने तक का काम करते हैं।आज पेंटिंग कराने की बारी हमारे टीवी वाले रूम की थी...सो पूरा कमरा उलट-पुलट हो गया,ड्रेसिंग टेबल,तोसक(गद्दा),कूलर,लकड़ी के सेल्फ,सोफा,कुर्सी,टेबल,टीवी सब बाहर आ गया....टीवी वाला कमरा पूरी तरह से खाली हो गया....मगर सबसे बड़ा टास्क बचा था वो था बड़का गोदरेज अलमारी को घसकाना,लेकिन पेंटर इतने अच्छे थे कि उन्होंने इस असंभव लगने वाले काम को भी कर दिया।अब टीवी वाले रूम के बाहर का नजारा तो उठा-पटक वाला था...हमें समझ में नहीं आ रहा था कि हम सब सुबह की चाय कहां पियेंगे? क्योंकि ये पेंटर सब सुबह सात बजे ही चले आए थे...ये तो अच्छा हुआ था कि हमने कल रात ही टीवी वाला कमरा लगभग खाली कर लिया था।इसलिए कहते हैं अग्र सोची सदा सुखी...मतलब जो आगे की सोचता है वो हमेशा सुखी रहता है।किसी तरह हम सब भी इसी उठा-पटक में चाय  पिये।देखिए...आप भी उठा-पटक वाली चाय को---


चाय पीने के बाद पेंटर पेंटिंग के काम में लग गए और हम अपने रसोईघर में....आज मम्मी ने बिना लहसून-प्याज वाली कद्दू की सब्जी बनाई,जो बहुत टेस्टी थी।मम्मी ने कढ़ाई में तेल डाला,फिर तेल के गर्म होने पर उसमें जीरा,सरसो,अजवाइन,मंगरैल,हरी मिर्च,कसूरी मेथी का फोड़न डाला...उसके बाद उसमें मूली काटकर डाला,फिर उसमें कटा कद्दू डाला और फिर हल्दी,नमक डालकर...थोड़ा सा पानी डाला फिर प्लेट से ढक कर धीमी आंच पर पकाया...जब कद्दू पूरी तरह गल गया और पानी सूख गया...तो फिर धनिया का पत्ता डालकर गैस पर से सब्जी को उतार लिया।यकिन मानिए...कद्दू की सब्जी बहुत स्वादिष्ट बनी....पापा ने तो बहुत तारिफ की...मेरे पापा जल्दी किसी खाने की तारिफ नहीं करते हैं।आप भी जरूर बनाएं...कद्दू की सब्जी का फोटो डाल रही हूँ देख ले----


आज पूरे दिन टीवी बंद था....मगर इसका फायदा भी हुआ,आज हमारे पास बात करने को बहुत कुछ था.....पुरानी पड़ी किताबों को भी पढ़ने का समय मिल गया...तब मुझे लगा कि हर चीज के पीछे कुछ न कुछ अच्छा जरूर होता है।पापा, मम्मी और मैंने ने आज की बढ़ती महंगाई पर जमकर बात की,फिर पापा ने बताया कि उनके परबाबा(पापा के दादा जी के दादा) के समय एक रूपये में पूरे महीने का घर खर्च चल जाता था और पचास पैसे में चार कचौड़ी-आलू की सब्जी और दो जलेबी मिलती थी।ये सब सुनकर मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था....फिर मम्मी ने बताया कि नाना जी जब टीचर थे तो उन्हें चालिस रूपया महीना वेतन मिलता था,ये बात 1975 की है...यानि बहुत पहले की भी नहीं है।फिर आज क्या ऐसा हुआ, जो महंगाई आसमान से भी ऊँची निकल गई और मध्यमवर्गीय मुँह देखता रह गया? इस सवाल का जवाब मम्मी पापा के पास भी नहीं था।

आज के समय में सबसे ज्यादा तकलीफ में मध्यमवर्गीय परिवार ही है,क्योंकि ये न तो अमीर है और न गरीब....ये बीच में झूलता रहता है।सरकार भी कभी मध्यमवर्ग के लिए नहीं सोचती है,कोरोना काल में भी राशन,मदद सब गरीब(बी.पी.एल)को ही मिला...यहां भी मध्यमवर्ग मारा गया।बेरोजगारी का अभिशाप भी यही वर्ग झेल रहा है,महीने का अंत होते होते घर के खत्म होते बजट की मार भी यही मध्यमवर्ग खा रहा है।यही सब बातें टीवी के अभाव में हमारी आज होती रही....

आज मम्मी ने भी धूल में पड़ी फणिश्वर नाथ ' रेणु ' जी की एक किताब खोज निकाली,उसे साफ किया और लगी पढ़ने....इस किताब को पढ़कर मम्मी बहुत भावुक भी हो गई और कहानी मुझे भी सुनाई।मुझे भी उनकी कहानी बहुत मार्मिक लगी,आँखों से आंसू निकल आए।सही में बहुत महान साहित्यकार थे ' रेणु ' जी...उनकी कलम में शब्दों,भावनाओं का जादू जैसा था।आज टीवी न चलने के कारण मम्मी और मैंने इस महान साहित्यकार की रचना को जाना।मम्मी तो किताब पढ़ते पढ़ते एकदम खो गई थी....मैंने चुपके से तस्वीर ले ली----


आज की सबसे अच्छी बात ये रही कि पेंटर ने दोपहर तीन बजे तक टीवी वाले कमरे की पेंटिंग का काम न सिर्फ पूरा कर लिया...बल्कि सब सामान जगह पर ला कर रख भी दिया।फिर मैंने सफाई करना शुरू किया और टीवी वाला एकदम साफ हो गया।फिर मम्मी ने भाई को कहा कि अब टीवी लगा दो....फिर भाई ने टीवी लगा दिया और टीवी को ऑन भी कर दिया।बस शुरू हो गया..टीवी सीरियलों की भरमार।पापा,मम्मी सब खुश,सबने अपनी अपनी जगह पकड़ी और टीवी देखना चालू हो गया।

और मैंने दिनभर की बातों को अपने ब्लॉग में समेटकर लिखना शुरू कर दिया...

तो आज के लिए बस इतना ही...कल फिर मिलते हैं----

-------- अनुगुंजा








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