गुरुवार, 30 सितंबर 2021

इंद्रधनुष छूटा

 आज की सुबह मेरी मिक्सी चलाने से शुरू हुई...मुझे हरा(कूसी) केराव और प्याज जो पिसना था,मिशन था आज सुबह मम्मी और मामी के लिए जितिया व्रत का पारण बनाना.....जैसे ही मिक्सी चलाया मेरी पीठ में झुठ्ठा घुस गया....आप चौंक गए होंगे कि ये क्या हुआ ...... मेरी मम्मी ने बताया कि कभी कभी अचानक तेज जकड़न वाला दर्द हमारी पीठ या कमर में होता है जो अढाई दिन तक रहता है फिर अपनेआप ठीक हो जाता है....इसे ही झुठ्ठा कहते हैं।किसी तरह मैंने पारण का खाना बनाया और सबको पसंद भी आया।

ये झुठ्ठ तो सच साबित हो रहा था...दर्द इतना तेज था कि सांस भी नहीं ले पा रही थी।उठना-बैठना-चलना सब मुश्किल हो गया था।मेरी मौसी...जिसे मैं " मम्मी दीदी " कहती हूँ,उसने बहुत दवा बताई और लोहे का टोटका भी बताया....पर दर्द अपने चरम पर था।मेरी मम्मी दीदी " नारी " का सबसे प्यारा रूप है वो धर्म और कर्म दोनों में अव्वल है...हम तो पूजा-पाठ-व्रत आदि की हर दुविधा का समाधान उसी से पूछकर करते हैं...मम्मी कहती है कि मम्मी दीदी " पंडित जी " है हमारे घर की....

दिनभर की तकलीफ के बाद जब मैं शाम को अपने मोबाइल पर whats app status सबका देख रही थी...तो पता चला कि अभी कुछ देर पहले " इंद्रधनुष " निकला था...सबने फोटो भी डाला था......लेकिन इस दर्द के कारण मैं बाहर शाम को नहीं निकली और ' छूट गया मेरा इंद्रधनुष दर्शन '.....

मुझे बहुत अफसोस हो रहा था,मुझे प्रकृति की हर छटा देखने की प्रबल इच्छा रहती है और इंद्रधनुष देखना तो मेरा सबसे फेवरेट है....

खैर....कोई बात नहीं...हर कुछ ईश्वर पहले से तय रखता है कि क्या उसे देखना है और क्या नहीं....हम तो बस फिल्म " मेरा नाम जोकर " वाली लाइन....' हम सब तो रंगमंच की कठपुतली हैं '....

अभी भी जब मैं ब्लॉग लिख रही हूँ,तब भी बहुत दर्द हो रहा है पर क्या करें...कमिटमेंट भी कोई चीज होती है....ब्लॉग लिखना मेरा काम है जिसे मुझे हर हाल में करना है....मैं जानती हूँ मेरा ब्लॉग नया है,फॉलोअर न के बराबर हैं...पर फिर भी काम तो काम है....

आज इस दर्द के साथ एक और बात हुई....मेरे घर का पेंटर आया और बोला कि कल मेरे पैर पर पलंग गिर गया था...इसलिए चोट बहुत लग गई है और वो आज काम नहीं कर सकता है...ये बोलकर जब वो जा रहा था तो उस समय भी उसके मुँह में गुटखा था....मैंने यही सोचा कि " अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने वाली कहावत " सच हो रही है...लेकिन इसका एहसास उस पेंटर को नहीं है....जबतक एहसास होगा,तबतक कैंसर हमला कर चुका होगा।

आज मेरे छोटू( बिल्ला) की तबियत भी ठीक नहीं है...बार बार उल्टी हो रही है...दवा दिए है...थोड़ा आराम हुआ है...छोटू बीमार पड़ता है तो मेरा घर ही सूना पड़ जाता है वो मुस्कुराहट है हमारे घर का....

चलिए...फिर कल मिलते हैं...अभी दर्द बहुत तेज हो रहा है...

------ अनुगुंजा




बुधवार, 29 सितंबर 2021

तंबाकू-गुटखा मौत है

 आज का पूरा दिन बहुत व्यस्त रहा...ब्लॉग लिखने का बिलकुल समय नहीं मिला....जब घड़ी की तरफ देखा तो रात के साढे आठ बज रहे थे,तो सोचा कुछ लिखा जाए....

घर में पेंटिंग का काम चल रहा है तो पूरा घर अस्त-व्यस्त है...सब सामान किसी मछली बाजार की तरह बिखरा पड़ा है....जिसे बाद में हमें ही ठीक करना होगा,पेंटिंग के बाद घर ठीक करने के ख्याल से मन कांप जाता है पता नहीं कैसे सब काम होगा....लेकिन इस सब में एक बात बड़ी अच्छी लगती है वो है नए पेंट की खुशबू....उम्मीद करती हूँ आपको भी इसकी महक अच्छी लगती होगी...जब घर की दीवारों पर नया रंग चढ़ता है तो पूरे घर का लुक ही बदल जाता है...सब बहुत सुंदर लगने लगता है....

मेरे घर में जो पेंटर काम कर रहे हैं उनके मुँह में हमेशा गुटखा-पान मसाला भरा रहता है...पुड़िया खोलते हैं और सीधे मुँह में डाल लेते हैं....एक अजीब-सी बदबू फैल जाती है...मैंने देखा कि जो पुड़िया वो फाड़ते हैं उसपर कैंसर की चेतावनी संग मुख कैंसर की फोटो भी होती है,लेकिन इसके बावजूद वो खाते हैं और मौत को गले लगाते हैं। मैंने उनसे पूछा कि वो ऐसा क्यों करते हैं,जानबुझकर कैंसर को बुलावा क्यों देते हैं...तो उन्होंने बस यही कहा कि क्या करें " अमल(आदत)" है...छूटती ही नहीं।मैंने बहुत समझाने की कोशिश की...उनके परिवार के उजड़ने की बात भी कही...पर कोई फायदा नहीं हुआ।

मुझे समझ में नहीं आता कि लोग जानबुझकर मौत को गले क्यों लगाते हैं...गुटखा-पान मसाला बनाने वाली कंपनी पैकेट पर चेतावनी लिखकर,कैंसर की फोटो लगाकर अपना पल्ला तो झाड़ लेते हैं...लेकिन मरता तो इंसान ही है....बिहार में गुटखा,तंबाकू,पान मसाला,शराब बैन है पर फिर भी इसकी कालाबाजारी चल रही है और ये जहर बिक रहें हैं...इसकी दोषी जितना सरकार,प्रशासन है उतना ही आम जनता भी है।

चलिए...तो आज के लिए बस इतना ही...कल फिर मिलते हैं...एक नए अनुभव को लेकर...

------- अनुगुंजा




मंगलवार, 28 सितंबर 2021

लता मंगेशकर का जन्मदिन

 आज स्वर कोकिला,भारत रत्न...स्वरों की देवी...लता मंगेशकर दीदी का जन्मदिन है...ईश्वर उनको लम्बी आयु प्रदान करें...उनकी आवाज सदा ऐसे ही गूंजती रहे....मैंने लता दीदी की पेंटिंग बनाई थी...जो आपके सामने है....


सोने की जितिया

 कल रात की हल्की बारिश के साथ ही आज की सुबह सुहावनी थी...धूप तो तेज थी पर गर्मी का एहसास कम हो रहा था।आज मेरे भाई ने अपने दफ्तर से छुट्टी ले रखी थी,इसलिए आज सुबह की " चाय की चुस्की " का मजा ही कुछ और था...यानि मम्मी,पापा,हम,छोटू और भाई सब एकसाथ मिलकर आराम से चाय का आनंद लिया...बहुत मस्त रही सुबह की शुरूआत।

मम्मी ने मुझे बताया कि आज जितिया व्रत का नहाय-खाय है,इसलिए मम्मी का मैंने सरसों के खरी लगाकर बाल धो दिया...मेरी मम्मी का दोनों घुटना खराब हो चुका है,आस्टो अर्थराइटिस के कारण...बिलकुल मुड़ता नहीं है घुटना,इसलिए मैं ही मम्मी का बाल धो देती हूँ।नहाने के बाद जो व्रत करती हैं वो मरूआ का रोटी,नोनी की साग और झिगुनी का सब्जी खाती हैं....लेकिन मैंने ये सब नहीं बनाया,क्योंकि मेरी मामी ने ये सब भेज दिया था,मेरी मामी हर काम में " ए वन " है....वो हर समस्या को पल भर में दूर कर देती है...मैं उन्हें अपने परिवार की " इंदिरा गांधी " मानती हूँ,उनके बिना हमारा परिवार अधूरा है। अरे!!!! एक बात तो बताना ही भूल गई,खाना खाने से पहले पैर रंगा जाता है,मतलब नेलपॉलिश लगाई जाती है.....कल दिनभर मेरी मम्मी न कुछ खाएगी और न पिएगी....परसो सुबह ही वो अपना व्रत खोलेगी,वो भी चावल,झूड़ी,हरा केराव के गोदला ( सब्जी) के साथ....

बहुत कठिन व्रत होता है " जितिया "...मेरी मम्मी की तबियत ठीक नहीं रहती है पर फिर भी वो व्रत करती है....मेरी मम्मी के इस हौसले को मैं प्रणाम करती हूँ।

मेरे घर काम करने वाली बाई ने बोला मेरी मम्मी को कि           " दीदी...बिहान सोना के जितिया( गले में पहनने वाली ) पहनब,काहे की पुत्र के माय सोना के जितिया पहनई छई "....मैंने उस बाई से बोला कि क्यूं  केवल बेटा की माँ ही सोने का जितिया क्यों पहनेगी,बेटी की माँ क्यों नहीं? उसने बोला कि " बेटी के लेल ई व्रत न होए छई,खाली बेटा के लेल "...मैंने उसे बहुत समझाया कि आज बेटा-बेटी दोनों बराबर हैं...लेकिन वो नहीं मानी,मानों पुरानी बीमार सोच से वो जकड़ी हुई थी।

इसके बाद मेरी बाई जाते जाते बोली कि " बेटी के लेल पहने के हई त...चांदी के जितिया मम्मी के बोलू पहने के ".... ये क्या बात हुई बेटा के लिए सोना और बेटी के लिए चांदी....किस युग में जी रहे हैं हम...जहां बेटी कल्पना चावला बनकर अंतरिक्ष तक पहुंच जाती है...वहां बेटी का ये हाल !!!!!! 

मैंने जब गुगल पर सर्च किया इस जितिया व्रत के बारे में,तो कहीं पर भी मुझे ये नहीं मिला कि ये केवल बेटे के लिए किया जाता है...हर जगह संतान के लम्बी आयु की चर्चा की गई थी...और संतान तो बेटा- बेटी दोनों होता है,इस व्रत को     जीवित्पुत्रिका कहते हैं....जैसा शब्द से लग रहा है कि इसमें पुत्री का जिक्र है.....फिर ये बीमार सोच किसने डाली दिमाग में???? कौन है दोषी???? 

मेरे हर सवाल का जवाब मेरी मम्मी ही होती है...मेरी मम्मी ने मुझे समझाया कि पहले के जमाने में ज्यादातर केवल बेटा ही काम करने घर से बाहर जाता था,बेटी घर में रहती थी...इसलिए ऐसी सोच बनी की केवल बेटे के जीवन की रक्षा के लिए जितिया व्रत माताओं को रखना चाहिए....आज समय बदल चुका है अब बेटी...बेटों से बहुत आगे निकल चुकी है,बेटी अपनी काबलियत हर क्षेत्र में साबित कर चुकी है....इसलिए अब " बेटा-बेटी " दोनों के लिए...." सोने की जितिया "....

मेरी मम्मी के उत्तर ने मेरे मन को शांत किया....लेकिन हमें       " मेरे घर में काम करने वाली बाई " जैसी सोच वाले लोगों की सोच को बदलने की कोशिश करनी चाहिए....मैं तो ये कोशिश जरूर करूंगी...आखिर हम से ही तो समाज बनता है....

चलिए मिलते हैं कल....एक नई सुबह लेकर....

----- अनुगुंजा





सोमवार, 27 सितंबर 2021

पुत्री मोह क्यों नहीं

 सोमवार की सुबह बहुत तेज धूप के साथ शुरू हुई,उमस भरी गर्मी मन की जमीन को तपिश का एहसास करा रही थी।चाय के बाद दिनचर्या रोटी-आलू का भूजिया वाले नास्ते के साथ आगे बढ़ी....दोपहर के खाने में आज मम्मी कद्दू की सब्जी बना रही है वो भी धनिया के पत्ते के साथ,जैसा की मुझे पसंद है।

कल " बेटी दिवस " था...whats app के status पर सब अपनी बेटी के साथ वाली फोटो लगा रहे थे...कुछ तो वीडियो भी डाल रहे थे...मानों तीज-त्योहार की तरह ये एक प्रथा बन गई है कि जो " डे " हो,उसके अनुसार फोटो डालो प्रतियोगिता होनी ही चाहिए...मुझे इसमें कोई बुराई नहीं दिखती,बल्कि अपने रिश्तों के प्यार को थोड़ा प्रकट करना अच्छा लगता है।

मेरी मम्मी को स्मार्ट फोन इस्तेमाल करना नहीं आता है,ये जानते हुए भी मम्मी से थोड़ा मजाक करने के इरादे से मैं पूछी कि आज ' बेटी दिवस ' है तुमने क्या किया मेरे लिए? फोन पर मेरी फोटो भी नहीं डाली...तुमको जरा भी " पुत्री मोह " नहीं है....

ये सुनकर मम्मी थोड़ा मुस्कुराई और बोली कि आज मेरे पैर के घुटने के अर्थराइटिस का दर्द बहुत चरम पर था,पर जब सब्जी वाली कद्दू लाई तो हम यही सोचे कि ये तुमको अच्छा लगेगा...हम नहीं जानते थे कि आज बेटियों का दिन है,मेरे लिए तो हर पल बेटियों का होता है...उसके बाद जो मम्मी बोली वो सुनकर मैं नि:शब्द रह गई...मम्मी ने बोला कि ' मोह ' स्वार्थ का प्रतिक है इसलिए ये बेटों के हिस्से जाता है जिसे " पुत्र मोह " कहा जाता है...मगर बेटियां तो परमार्थ का प्रतिक है,जीवन के आधार का प्रतिक है और नि: स्वार्थ प्रेम का प्रतिक है...इसलिए " पुत्री मोह " नहीं होता.....

आज मम्मी की बात सुनकर मेरे आँखों से आंसू निकल आए....जीवन हर दिन हमें हमेशा कुछ न कुछ सिखाता रहता है ,लेकिन मेरे जीवन में पाठ मेरी मम्मी ही सिखाती है.... एक बार फिर से मम्मी ने जीवन को दर्शन दिया।

Thank you Mummy

------ अनुगुंजा

मेरी बनाई पेंटिंग.....





रविवार, 26 सितंबर 2021

आज इतवार है

 शनिवार की रात नींद बहुत अच्छी आती है,क्योंकि हमें पता होता है कि कल " इतवार " है...अरे!!! मतलब रविवार ,अंग्रेजी में कहे तो संडे है.....

पहली शर्त हम अपनी मम्मी से कर लेते हैं कि मम्मी कल इतवार है तो हमें देर तक सोने देना,हर बात को सिरे से इनकार करने वाली मम्मी झट से मान जाती है.....कितना सुकून लेकर आता है ये संडे.....

सोमवार से शनिवार तक की थकन संडे की उम्मीद मात्र से मिट जाती है...सप्ताह का बचा हुआ हर काम हम रविवार की छुट्टी के नाम कर देते हैं....मुझे लगता है कि हम रविवार को ताज पहनाकर सिंहासन पर बैठाते है,और बाकि दिनों को प्रजा बनाकर रख देते हैं....

सबसे ज्यादा गुस्सा तब आता है जब हमारी योजना ताश के पत्तो के घर के समान बिखर जाती है...सोचे रहते हैं कि पूरा संडे हम आराम और सुकून में बिताएंगे,टीवी देखकर उसके विज्ञापन का भी आनंद लेंगे...पर तभी हमारा ही बचा हुआ काम सिर पर तांडव करने लगता है...मतलब , पेंटर आ जाते हैं घर की रंगाई पोताई करने...जिन्हें हमने ही बोला था संडे को आना....मन खिन्न हो उठता है पर क्या करें ये पेंटिंग का काम भी जरूरी है....तो फिर सारी उम्मीदों,योजनाओं को धूल में उड़ाते हुए...लग जाते हैं कमरे को खाली करने वाली व्यवस्था में.....

शाम की " चाय की चुस्की " को हम कैसे भूल सकते हैं...इसका तो पूरे परिवार को इंतजार रहता है...और हमारे " छोटू जी " भी तो होते हैं...जिनका परिचय पिछले ब्लॉग में करा दिया है....आज की शाम की चाय नए पेंट की महक लिए थोड़ी धूल से लथपथ होगी...लेकिन इसके बावजूद शानदार होगी...क्योंकि परिवार साथ होगा....

कल से सोमवार की दौड़ शुरू हो जाएगी...देखते हैं कर्तव्य पथ कल क्या और कहां तक दौड़ाता है....आखिर चलना ही जीवन का नाम है....

कल फिर मिलते हैं कुछ खट्टी मिट्टी बातों के साथ....

-------अनुगुंजा



शनिवार, 25 सितंबर 2021

शनिवार का सूर्य

  अरे !!! भाई-बहन आप ये मत सोचने लग जाए कि मैं आपसे शनिदेव या सूर्य देव की बात करने जा रही हूँ....या पूजा-पाठ पर कुछ कहने जा रही हूँ....

आज शनिवार का दिन है,सुबह जब मैं उठी तो देखा की नाउम्मीदी के बादल छट गए थे...और आशा की नई सुबह की शुरूआत हो चुकी थी।सूर्य देव अपनी चमक से पूरी धरती को रौशन कर रहे थे....मन में उमंग और उत्साह ये दृश्य देखकर ही आ गया था।

आज मन में अचानक आया कि आज बेसन की सब्जी बनाते हैं,तो फिर क्या मम्मी और हम मिलकर शुरू हो गए ' मिशन बेसन की सब्जी ' को पूरा करने....तभी एक गड़बड़ हो गई,दही थोड़ा ज्यादा पड़ गया और सब्जी में थोड़ा खटापन आ गया....ये छोटी सी गड़बड़ी मुझे जीवन चक्र में घटने वाली कुछ नकारात्मक बात की तरह लगी,जब हम बहुत दुखी हो जाते हैं तो सब बुरा दिखने लगता है और जीवन में खटास आ जाती है.....लेकिन मेरी हर परेशानी को मेरी मम्मी पल भर में दूर कर देती है तो बस आटा का गोली बनाकर सब्जी में डाला और सब्जी का खटास दूर कर दिया।एक मामूली से आटे के गोले ने बिगड़ा काम बना दिया...

असल में हमारे जीवन में परेशानी ज्यादा कठीन नहीं होती है वो बहुत मामूली होती है ये तो हमारी नकारात्मक सोच होती है जो राई को पहाड़ बना देती है....हमें ऐसे वक्त जरूरत होती है उम्मीद के उसी आटे के गोले के जो जीवन के स्वाद को ठीक कर दें।

तो बस यही रहा आज का शनिवार का सूर्य....जो एक सबक दें गया...

शाम होने को है...और हम सब बैठ गए है " चाय " की चुस्की लेने...वो भी पूरे परिवार के साथ....हमारे पास हमारा प्यारा      " छोटू " भी है...अरे !!! छोटू से तो आपको मिलवाया ही नहीं,वो तो हमारे परिवार का सबसे मुख्य सदस्य है...वो है बिल्ला,जो अपाहिज है पर हमारे घर की मुस्कान है।

चलिए फिर मिलते हैं.....

------------अनुगुंजा





शुक्रवार, 24 सितंबर 2021

संसार आतंकवाद पर चुप क्यों


 

इंसानियत मर गई

कितनी बर्बरता फैल रही है दुनिया में,
 जाने किस क्रोध में भटके घर-गलियों में.... 
इंसान का जीव मात्र से प्रेम जैसे खत्म हो गया,
 क्रूरता का नंगा नाच हर आंगन में शुरू हो गया.... 
कहीं बेटियां साइकिल से घर तक न पहुंच पाती,
 उनकी तैरती लाश नदियों में सवाल लेकर आती.... 
पति-पत्नी का रिश्ता भी तार तार हो रहा, 
एक-दूसरे की हत्या से सातों वचन जल रहा.....
 घर का इकलौता चिराग ही पूरे परिवार को मार डालता, लालच-स्वार्थ में अंधा होकर अपना ही घर उजाड़ देता.....
 जाने किस अंधेरी राह पर बेधड़क बढ़ रहा है घर समाज, 
इस काली खाई में गूंज रही है केवल तबाही की आवाज.... कैसा विकास हो रहा है आज के खून से लतपत कलयुग में, जहां काल भी सोच रहा है मेरा क्या काम रह गया इस प्रलय में..... 
शर्म-अफसोस जैसे शब्द मानव पटल से जैसे मिट गए, 
धीरे धीरे कर " हम " से " मैं " में पूरी विकृत बुद्धि सिमट गए.....। अनुगुंजा


बुधवार, 22 सितंबर 2021

स्वतंत्रता दिवस का जयघोष


 

सुबह आएगी

 चाहे अंधेरा कितना भी हो गहरा,लेकिन सुबह आती है।काले रंग पर सुरज की रौशनी उजाला फैलाती है।जब हमें लगने लगता है कि अब कुछ नहीं हो सकता है

 तभी उम्मीद की एक ज्योत हौसला दे जाती है।अपना पहला ब्लॉग मैं हिम्मत के नाम समर्पित करती हूँ।
                             अनुगुंजा


हिम्मत को सलाम

 एक दिन 

मैंने देखा कि एक नन्ही सी चींटी 

एक बाल्टी पानी में गिर गई थी और वो अपने हाथ पैर 

चलाकर उस पानी से निकलने की कोशिश कर रही थी।ये सब देख मुझसे रहा नहीं गया और मैंने पानी में एक 

चम्मच को डाला, ये सोचकर कि उस चम्मच पर चढ़ कर वो चींटी बाहर आ जाएगी।लेकिन मेरी इंसानी सोच को उस चींटी ने गलत साबित 
किया और वो उस चम्मच के सहारे बाहर नहीं आई।मगर उसने हिम्मत नहीं हारी,अपना हौसला नहीं खोया 
और अपने विश्वास को टूटने नहीं दिया।वो लगातार कोशिश करती रही ,कभी किनारे तक पहुँच कर ,वो वापस पानी में चली जाती थी।तभी मैंने देखा कि उसने अपने शरीर को हवा के रूख के विपरीत कर लिया और फिर हवा के झोंके तले,वो छोटी 
चींटी पानी से बाहर आ गई।इस कुछ मिनट के घटना चक्र में उस चींटी ने बहुत कुछ
 सीखा दिया।उसने ये बता दिया कि हमारी हार तभी होती है जब हम 
हार मानते है।
                 

 अनुगुंजा

कोटि कोटि प्रणाम


 गुरु चरणों में करते हम वंदन,

इनकी कृपा ही है हमारा जीवन....

हर अंधेरा दूर कर देते हैं मेरे दाता,

इनकी दया से ही भक्त मझधार पार कर पाता....

दुख की छाया को कृपा सुख में बदलते,

हर पीड़ा को गुरुवर पल में हर लेते.....

असफलता में हार कर भी हारने न देते,

जीत की उम्मीद को हौसलों से उड़ान देते.....

समझ में आता क्यों आता गोविंद से पहले गुरु का नाम,

क्योंकि तीनों लोक में गुरु चरण में ही है समाया चारों धाम.....

करते हैं हम कोटि कोटि नमन गुरु चरणों में,

इनका आशीर्वाद रहें सदा हर पल जीवन में.....

                                                    अनुगुंजा



जन्मदिन मम्मी का

  अगर हो सकता तो, मैं तारें तोड़ लाती, तेरी पैरों की पायल में सजा डालती....  कदमों में "माँ" तेरी जन्नत बसती है मेरी, तेरी हर आहट ...