रविवार, 26 सितंबर 2021

आज इतवार है

 शनिवार की रात नींद बहुत अच्छी आती है,क्योंकि हमें पता होता है कि कल " इतवार " है...अरे!!! मतलब रविवार ,अंग्रेजी में कहे तो संडे है.....

पहली शर्त हम अपनी मम्मी से कर लेते हैं कि मम्मी कल इतवार है तो हमें देर तक सोने देना,हर बात को सिरे से इनकार करने वाली मम्मी झट से मान जाती है.....कितना सुकून लेकर आता है ये संडे.....

सोमवार से शनिवार तक की थकन संडे की उम्मीद मात्र से मिट जाती है...सप्ताह का बचा हुआ हर काम हम रविवार की छुट्टी के नाम कर देते हैं....मुझे लगता है कि हम रविवार को ताज पहनाकर सिंहासन पर बैठाते है,और बाकि दिनों को प्रजा बनाकर रख देते हैं....

सबसे ज्यादा गुस्सा तब आता है जब हमारी योजना ताश के पत्तो के घर के समान बिखर जाती है...सोचे रहते हैं कि पूरा संडे हम आराम और सुकून में बिताएंगे,टीवी देखकर उसके विज्ञापन का भी आनंद लेंगे...पर तभी हमारा ही बचा हुआ काम सिर पर तांडव करने लगता है...मतलब , पेंटर आ जाते हैं घर की रंगाई पोताई करने...जिन्हें हमने ही बोला था संडे को आना....मन खिन्न हो उठता है पर क्या करें ये पेंटिंग का काम भी जरूरी है....तो फिर सारी उम्मीदों,योजनाओं को धूल में उड़ाते हुए...लग जाते हैं कमरे को खाली करने वाली व्यवस्था में.....

शाम की " चाय की चुस्की " को हम कैसे भूल सकते हैं...इसका तो पूरे परिवार को इंतजार रहता है...और हमारे " छोटू जी " भी तो होते हैं...जिनका परिचय पिछले ब्लॉग में करा दिया है....आज की शाम की चाय नए पेंट की महक लिए थोड़ी धूल से लथपथ होगी...लेकिन इसके बावजूद शानदार होगी...क्योंकि परिवार साथ होगा....

कल से सोमवार की दौड़ शुरू हो जाएगी...देखते हैं कर्तव्य पथ कल क्या और कहां तक दौड़ाता है....आखिर चलना ही जीवन का नाम है....

कल फिर मिलते हैं कुछ खट्टी मिट्टी बातों के साथ....

-------अनुगुंजा



4 टिप्‍पणियां:

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