शुक्रवार, 24 सितंबर 2021

इंसानियत मर गई

कितनी बर्बरता फैल रही है दुनिया में,
 जाने किस क्रोध में भटके घर-गलियों में.... 
इंसान का जीव मात्र से प्रेम जैसे खत्म हो गया,
 क्रूरता का नंगा नाच हर आंगन में शुरू हो गया.... 
कहीं बेटियां साइकिल से घर तक न पहुंच पाती,
 उनकी तैरती लाश नदियों में सवाल लेकर आती.... 
पति-पत्नी का रिश्ता भी तार तार हो रहा, 
एक-दूसरे की हत्या से सातों वचन जल रहा.....
 घर का इकलौता चिराग ही पूरे परिवार को मार डालता, लालच-स्वार्थ में अंधा होकर अपना ही घर उजाड़ देता.....
 जाने किस अंधेरी राह पर बेधड़क बढ़ रहा है घर समाज, 
इस काली खाई में गूंज रही है केवल तबाही की आवाज.... कैसा विकास हो रहा है आज के खून से लतपत कलयुग में, जहां काल भी सोच रहा है मेरा क्या काम रह गया इस प्रलय में..... 
शर्म-अफसोस जैसे शब्द मानव पटल से जैसे मिट गए, 
धीरे धीरे कर " हम " से " मैं " में पूरी विकृत बुद्धि सिमट गए.....। अनुगुंजा


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