सोमवार, 12 जून 2023

जन्मदिन मम्मी का


 अगर हो सकता तो, मैं तारें तोड़ लाती,

तेरी पैरों की पायल में सजा डालती.... 

कदमों में "माँ" तेरी जन्नत बसती है मेरी,

तेरी हर आहट पर धड़कन चलती है मेरी.... 

आज है तेरा जन्मदिन, जो मेरे मन में उल्लास है भरता,

क्या करूं तेरे लिए,यही सोच चक्र मेरा है चलता.....

कोई भी तोहफा मेरे मन को नहीं भाता,

तेरे आगे सब छोटा ही दिखता जाता.....

ईश्वर से प्रार्थना में मांगू तेरी लम्बी उम्र,

चाहूं बस तुझे मुस्कुराता देखूं मैं ताउम्र.....

बड़ी किस्मत से मिली है मुझे तेरे जैसी माँ,

तुझ-सा न हुआ और न होगा,क्योंकि तू है एक उपमा....

है मेरा परम सौभाग्य, जो बनी मैं तेरी बेटी,

अपने आंचल में तूने मेरे लिए सिर्फ खुशीयां है समेटी....

    ------ अनुगुंजा




सोमवार, 27 फ़रवरी 2023

जिंदगी इनकी भी

 

भूख लगती है इन्हें भी,

गला सूखता है इनका भी....

केवल लोगों के पत्थर खाने को ये नहीं बने,

क्रोध उतारने के लिए ईश्वर ने इन्हें नहीं चुने.....

हक इनको भी है जीवन जीने का,

खुश होकर इंसानों के प्यार को पाने का....

फिर क्यों इन्हें मनुष्य तड़पाते,

जानबूझकर मरने को छोड़ जाते....

क्या कसूर है इनका, इन्हें भी मालूम नहीं,

किस गुनाह पर मिलती सजा,ये अबतक जाने नहीं.....

मासूम आँखे बस निहारे अपने मददगार को,

अनबोलते जीव मांगे सहारा इंसानियत भरे प्यार को.....


जब भी हम सड़कों पर निकलते हैं तो न जाने कितने अनेकों बेजुबान जीव (गाय,कुत्ते,बिल्ली आदि) मिलते होंगे हमें, पर हम उनकी तरफ देखते भी नहीं होंगे,क्योंकि हम अपने कामों में व्यस्त रहे होंगे।

अब दो मिनट यहीं रूकते हैं और एक बार उनकी जगह अपने को रखकर सोचते हैं, जहां हम कई दिनों से भूखे-प्यासे हो,और एक उम्मीद में सबकी तरफ देख रहे हो कि कोई मेरी मदद करेगा पर हर कोई आगे बढ़ जाता है....कैसा महसूस होगा हमें? कितनी निराशा मिलेगी,कितना दुख होगा।

बस यही महसूस करना आज का इंसान लगभग भूल चुका है और स्वार्थ की चादर को रोज खींचकर बढ़ाता जा रहा है। हम ही हम में वो पूरी तरह डूब चुका है। यही कलयुग का सबसे बड़ा श्राप है।

आज लोग अगर जानवरों के प्रति प्यार दिखाना चाहते हैं तो महंगा कुत्ता खरीद लेते हैं और खुद को इंसानियत का मसीह समझ लेते हैं पर वो ये भूल जाते हैं कि दिखावा और असलियत में फर्क होता है। अगर नियत साफ है तो सड़क पर भटकने वाले कुत्तों को भी पाला जा सकता है,उसे अपने घर और दिल में जगह दी जा सकती है पर ऐसा होता नहीं।

अगर कोई आवारा कहा जाने वाला कुत्ता किसी को काटता है या भयानक हमला करता है,तो सब कहते हैं कि उस कुत्ते को मार दो....मेरा बस इतना कहना है कि उस बेचारे को पागल किसने बनाया? किसने उसे इतना खुंखार बनाया? उसके साथ ऐसा क्या हुआ,जो कोई न्यूज चैनल न दिखा सका?

इस सबका एक ही जवाब है वो है........

" इंसान और उसकी क्रूरता "

हर जीव में बर्दाश्त करने की एक सीमा होती है जिसके पार इंसान हो या जानवर अपना आपा खो ही देता है। एक चींटी भी बचाव में काटती है.......

लेकिन ये अनबोलते जीव अपना पक्ष रख नहीं सकते,इसलिए मानव की सभा में ये अपराधी सिद्ध हो जाते हैं।जिसको जो मन में आता है वो अपना क्रोध व्यक्त करता है और ये बेजुबान सोशल नेटवर्किंग साइट पर आकर अपना दर्द नहीं बता पाते,बस मूक बने रहते हैं।

अनुगुंजा


रविवार, 26 फ़रवरी 2023

चाह जन्मदाता की

माँ-बाप हमारे जीवन की न सिर्फ बुनियाद होते हैं बल्कि ये ही हमारे जीवन की सच्ची खुशी होते हैं,क्योंकि इनके जीवन का सार हम ही होते हैं।

इससे प्यारी मुस्कुराहट मैंने न देखी,

ऐसी निर्मल मासूमियत कहीं न पाई....

मम्मी-पापा जब बन जाते हमारे दोस्त,

तब कहीं बाहर घूमने की चाह हमें न भाए....

घर ही बन जाता आनंद की पाठशाला,

क्योंकि यहीं गुरु संग दोस्त हमें मिल जाए....

माँ-बाप होते सच्चे मित्र किताबों जैसे,

इनके हर पन्नों से हमें जीवन-दर्शन सिखाए.....

हर कठिन डगर पर उम्मीद के फूल खिलते

जब साथ हो हमारे जन्मदाता की दुआए.....

बहुत किस्मत से मिलता माता-पिता का आशीर्वाद,

इनकी प्रार्थनाओं ने ही हमें कर्म करने योग्य बनाए.....

सम्मान संग प्रेम देते रहें हम अपने माँ-बाप को,

चारों धाम संग पावन गंगा का मिले पुण्य यहीं मिल जाए।


वर्तमान समय बहुत व्यस्त समय है,यहां सबकुछ देने के लिए है, बस देने के लिए समय ही नहीं है अपने माता-पिता को....यही सबसे बड़ी समस्या है क्योंकि हमारे मम्मी-पापा को हमसे हमारे थोड़े से समय के अलावा हमसे कुछ नहीं चाहिए। माँ-पापा के साथ बैठकर एक कप चाय पीना,हमारे लिए बहुत मामूली बात हो सकती है पर उनके लिए ये अनमोल पल होता है,हर चाय की एक चुस्की के साथ वो अनेको जीवन जी लेते हैं या ये कहें सारी खुशीयाँ समेट लेते हैं।

किसी Mother's day या father's day का इंतजार मत करो,बल्कि हर दिन थोड़ा सा समय अपने जन्मदाता को दे दो...यही उनका सबसे बड़ा गिफ्ट होगा।

समय के महत्व के आगे माँ-बाप के महत्व को कम न पड़ने दो..... पैसा,सहूलियत, सुख-सुविधा,ऐशो आराम....ये सब हल्का तब हो जाता है जब हमारे माता-पिता अपने घर की खिड़की या बालकोनी या छत से आसमान को निहारते हैं या सड़क पर चलने वाली गतिविधि को चुपचाप बस देखते हैं या टीवी या किसी पार्क को अपने मन को बहलाने का जरिया या साधन बना लेते हैं। 

कोई भी पार्क, टीवी....औलाद की कमी पूरी नहीं कर सकता,ये तो बस उनका वक्त के साथ किया गया एक समझौता होता है....जिसे नाम दिया जाता है " बदलाव " का

अनुगुंजा



 

गुरुवार, 12 जनवरी 2023

बूढ़ी माँ

 

अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में सहारा ढूंढती माँ,

क्या कहूं अपने बच्चों को कितना याद करती माँ.....

जब डगमगाते कदम मांगे छड़ी का साथ,

वहां क्यों न, औलाद बढ़ाती अपना हाथ....


आज हमारे देश, समाज में वृद्धावस्था में अपनी संतान का माता-पिता को अकेले छोड़ देना या उन्हें एक उदासीन, दुखी जीवन जीने पर विवश करना बढ़ता जा रहा है। लगभग हर न्यूज चैनलों ,समाचारपत्रों में इस प्रकार की खबर पढ़ने या देखने को हमें मिल जाती है....जहां कांपती झुर्रियो वाले चेहरों से ठहर-ठहर कर बहते आंसू अपनी दर्दनाक कहानी सुना देते हैं। कलयुग का ऐसा भयानक रूप मन को ये सोचने पर मजबूर करता है कि एक औलाद अपने बूढ़े माँ-बाप के साथ ऐसा कैसे कर सकती है। कहीं पिता को कमरे में बंद करना,तो कहीं माँ को बिस्तर पर मरने के लिए छोड़ देना....ये तो चंद उदाहरण है,असल में वास्तविकता और डरावनी है।

जब हम किसी वृद्धा-आश्रम में जाते हैं तो वहां अपनी सेकेंड इनिंग(अंतिम चरण) का आनंद लेते कई वृद्ध जन मिल जाएंगे....जो मुस्कुराते हुए अपनी मित्र मंडली में अंताक्षरी खेलते,कैरम-शतरंज खेलते दिखेंगे, पर जब आप उनसे उनसे थोड़ी देर बात करेंगे तो उस मुस्कुराहट के पीछे छुपा दर्द आपको दिख जाएगा। वो दर्द जो आज भी आश्रम के गेट के बाहर इस उम्मीद से झांकता है कि कहीं उनकी संतान उन्हें लेने तो नहीं आ गई है। 

जब से संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार ने जगह लिया है तब से लोग    " परिवार " का मतलब पति- पत्नी और बच्चे तक ही सीमित होकर रह गया है,इसमें से दादा-दादी का स्थान नगण्य हो गया है। आज की औलाद को उनके जीवन में अपने माता-पिता का दखल,रोकटोक पसंद नहीं है,उन्हें अपने तरीके से अपनी जिंदगी जीना है। माँ-बाप को अपने सिर पर छत को बचाए रखने के लिए अपनी औलाद के हिसाब से ढलना पड़ रहा है,जैसा वो चाहते हैं वैसा करना पड़ रहा है। ये सब इसलिए ताकि उनका बुढ़ापा सड़कों पर भटकने का मोहताज न बन जाए।

जब हम छोटे होते हैं और हमें ठेस लगती है या हम गिर जाते हैं,तो फौरन हमारी माँ हमें उठाती है और अपनी ममतामयी गोद में बैठाकर बहुत सारा प्यार संग हौसला देती है पर जब उसी माँ को बुढ़ापे में चोट लगती है तो वहां उसे सहारा देकर प्यार करने वाला कोई नहीं होता।

ऐसा नहीं है कि हमारे देश की हर औलाद ऐसी निर्दयी है....अभी भी कुछ संतान अपने माँ-बाप को ईश्वर की तरह पूजती है....लेकिन ऐसे संतानों की संख्या घास में सूई खोजने जैसा है।

अनुगुंजा

 



रविवार, 8 जनवरी 2023

हे !!!! भगवान

 


ठंड हो या गर्मी या हो बरसात....इसका प्रतिकूल प्रभाव हर जीव पर पड़ता है,फिर चाहे वो इंसान हो या जानवर।
लेकिन इंसान इतना स्वार्थी है कि उसे बस अपनी तकलीफ दिखती है,अन्य जीव उसे बेजान लगते हैं जैसे उसपर कोई असर ही नहीं पड़ता है।
सड़कों पर भटकने वाले कुत्ते, गाय और उनके बच्चे ठंड से कांपते रहते हैं,उनका पूरा शरीर थरथराता रहता है...आँखों से अपनी बेबसी के आंसू निकलते रहते हैं पर ये सब सड़क पर मौज-मस्ती करने वालों को कहां दिखती है,बल्कि इंसान कहे जाने वाले ये दानव, इस ठंड में उन बेजुबानों पर पानी फेंकते हैं,पत्थर मारते हैं,मानों वो जीव निर्जीव हो।ऐसे हैवानों में दया तो दूर की बात रही,इन्हें अपनी करतूत पर शर्म भी नहीं आती है।
ये तो बात हो गई बेजुबानों को तड़पाने वाले दानवों की। अब इसके बाद कुछ ऐसे महामानव भी हैं जो अपने कामों में इतने व्यस्त हैं कि उन्हें कोई फर्क ही पड़ता कि कौन जानवर ठंड या भूख से मर रहा है। ये महामानव अपनी भागदौड़ वाली जिंदगी में उलझे रहते है,इनके लिए खुद की उपलब्धि, खुद ही सफलता ही मायने रखती है। इनका घर कैसे चलेगा,इनकी थाली में रोटी कैसे आएगी....बस यही इनका दायरा है।ये मानव कभी पलट कर भी नहीं देखते कि कहीं कोई कुत्ता इनकी तरफ उम्मीद भरी नजर से देख रहा है या नहीं।
लेकिन इस स्वार्थ भरे कलयुग में कुछ ऐसे इंसान भी होते हैं जो खुद सड़क पर भीख मांगते हैं या जूता पॉलिश करते हैं पर सड़क पर के इन बेजुबानों की परवाह करते हैं,उन्हें प्यार देते हैं और अपनी एक रोटी का एक टुकड़ा उनको खिलाते हैं। ये खुद सड़क किनारे सोते हैं पर अपनी फटी चादर का एक कोना इन बेजुबानों को देते हैं ।
मेरा सलाम ऐसे धनवानों को, जो अपनी गरीबी में भी इंसानियत निभाना जानते हैं ।
अनुगुंजा


रविवार, 4 दिसंबर 2022

उड़ान


 है तेरे नंगे पांव तो क्या,

तेरे हर पग रचेंगे नया इतिहास....

है तेरे साथ गरीबी का साया तो क्या,

विश्व दर्पण में दुनिया देखेगी तेरी पहचान....

है तेरे पंख टूटे हुए तो क्या,

तेरी उड़ान एक नया आसमान पाएगी.....

रचनात्मकता न जाने तेरे बस्ते की औकात,

कल्पना तेरी गढे, तेरे भविष्य की बुनियाद.....

खुला आसमां न पूछेगा, कहाँ से तू आया,

उड़ान तेरी कहेगी, क्या सफलता में तूने है पाया.....

है तुझे भी अधिकार बनाने का सुनहरा भविष्य,

बस हर स्कूल में सत्य-ईमानदार रहे " गुरु-शिष्य ".....

गुरु की गरिमा सदा रहे ऊँची हर विद्यालय में,

कर्तव्य पथ पर चले हमेशा बन शिक्षक रूप में.....

हर बच्चे की छुपी योग्यता पहचाने सिर्फ शिक्षक,

तभी तो कहते इन्हें अंधेरे से उजाले तक ले जाने वाला मार्गदर्शक.....

अज्ञान से निकालकर ज्ञान की राह पर लाते गुरु,

हर बच्चे को उड़ान के काबिल बनाते गुरु......

अनुगुंजा


शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2022

मैं

 " मैं " शब्द में सिमटती पूरी दुनिया,

हर बात में खुद को आगे रखती दुनिया....

इस " मैं " के जाल से कोई न निकला,

इसलिए कलयुग स्वार्थ की भेंट चढ़ा....

" मैं " के अलावा और कोई न दिखता,

हर आईने में इंसान खुद को ही निहारता.....

" मैं " की दर्द-दुख-पीड़ा को मनुष्य रखता सर्वोपरी,

अपनी तकलीफ के आगे दूसरों का दर्द करें अनदेखी....

इस " मैं " का सुख भी इंसान के लिए सर्वप्रथम होता,

इसके सामने अन्य के दुखों को सदा नजरअंदाज करता....

" मैं " की मुस्कुराहट को फिका लगे दूसरों के आँखों के आंसू,

इस पूरे ब्रम्हांड में मानव केवल " मैं " को लेकर ही बनता जिज्ञासु.....

हर प्रकार के दोषों पर भारी पड़ती " मैं " की मोहमाया,

इसके कहर को इंसान अभी तक न समझ पाया.....

अनुगुंजा





बुधवार, 12 अक्टूबर 2022

Happy birthday papa

 

जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई पापा,

आपके साथ रहती हूँ बनके आपका ही साया....

करती हूँ  आपसे हद से ज्यादा प्यार,

क्योंकि आप में ही है मेरा पूरा संसार.... 

सिखती रहती हूँ मैं, आपसे रोजाना,

आपकी बातों में मिले ज्ञान खजाना....

फिक्र रहती है मुझे आपकी हर पल,

आप ही हैं मेरे सपनों का आधार स्थल.....

आपकी सलामती सदा मेरे आँखों के सामने रहे,

आपकी मासूम मुस्कुराहट हमेशा आपके चेहरे पर खिलती रहे.....

   अनुगुंजा




रविवार, 9 अक्टूबर 2022

आदमखोर बाघ

 


अभी पूरे बिहार में...या हम ये कहें पूरे देश में आदमखोर बाघ के मारे जाने की खबर सुर्खियों में है। हर जगह यही आ रहा है कि वो बाघ आदमखोर था,उसने इतने लोगों की जान ली...अच्छा हुआ जो ये मारा गया। लोग,मीडिया सब मृत बाघ की तस्वीर को एक बहुत बड़ी उपलब्धी के रूप में प्रस्तुत कर गौरवांवित हो रहे हैं। जो इंसानों से टकराएगा,वो मारा जाएगा....वाली कहावत चीख-चीखकर हर लहजे में बोली जा रही है। लोग मृत बाघ के साथ सेल्फी ले रहें हैं...उसे अपने हाथों से नोच-नोचकर न जाने कौन-सी बहादूरी दिखा रहे हैं। गांव वाले खुश,प्रशासन खुश,बाघ को मारने वाले(हाथी पर बैठे) शूटर खुश......सब जश्न मना रहे हैं....बदला पूरा हुआ....इंसानों ने अपने दर्द,जख्म,आंसू का हिसाब ले लिया। यहां पर                 " आदमखोर बाघ " को मारने की इंसानों के जयजयकार वाली गाथा समाप्त होती है।

एक माँ का संघर्ष----

" माँ " शब्द पर केवल इंसानों का कॉपीराइट नहीं है, इस शब्द का मायना इंसान-जानवर-पक्षी....या सभी जीवों के लिए एकसमान होता है। " माँ केवल माँ होती है। " 

एक बाघिन अपने नन्हें शावकों को उनके पिता ( बाघ ) से बचाने के लिए मारी मारी फिरती है। वो माँ जानती थी कि अगर उसका पिता( बाघ ) सामने आ गया,तो वो अपने शावकों को उनके पिता के जानलेवा कहर से नहीं बचा पाएगी। अपने बच्चों को बचाने लिए वो माँ भटकती रही.....जबतक उसके बच्चे बड़े नहीं हो गए,तबतक वो " माँ " संघर्ष करती रही।

क्यों? बना वो बाघ आदमखोर------

आज हमारे देश में जंगल सिमटते जा रहे हैं...जंगलों का दायरा निरंतर कम होता जा रहा है। जंगल के हर हिस्सों पर इंसानी पैठ बढ़ता जा रहा है.....विकास,मनोरंजन,स्वार्थ के नाम पर लोग    " जंगल सफारी " के नाम पर कहीं न कहीं जानवरों के इलाकों में हस्तक्षेप कर रहे हैं या हम ये कहें की अतिक्रमण हो रहा है,तो गलत नहीं होगा।

जब हम इंसानों से उसका घर छीना जाता है तो इंसान             " खानाबदोश या रिफ्यूजी या बेघर " कहलाते हैं, वैसे इंसान सड़कों पर,गलियों में घूम घूमकर खाना मांगते हैं......

अब जरा इंसानों की जगह जंगली जानवरों को रखकर देखें....तो हमें पता चलेगा कि क्या इन्हें हम " आदमखोर " कह सकते हैं? 

जानवर तो हमेशा अपने स्वभाव, प्रकृति के हिसाब से ही चलता है, ये इंसानों की तरह बदलता नहीं। जानवर को जब भूख लगेगी,तो वो सबसे आसानी से मिलने वाला भोजन ही चाहेगा....जिसे इंसानी जुबान में शिकार कह सकते हैं। जिस जगह एक बार उसे आसानी से भोजन मिल जाता है वहीं जानवर बार बार जाता है,अपनी भूख को मिटाने के लिए। जैसे अगर हम आवारा कुत्ते को एक बार अपने घर के बाहर भोजन दे देते हैं तो वो कुत्ता वहीं बार बार आता है ताकि उसकी भूख मिट जाए।

क्या बाघ को मारना ही अंतिम उपाय था?----

जहां बाघ विलुप्त जीवों की श्रेणी में आते हैं....जहां इनकी घटती संख्या चिंता का कारण बन जाता है....वहां एक बाघ को हाथी पर बैठे शूटरों द्वारा गोली मरवाना कहां तक उचित है? 

क्या बाघ को सूई द्वारा बेहोश करके चिड़ियाघर या दूर जंगल या किसी नेशनल पार्क में छोड़ा नहीं जा सकता था....जो उसे इतनी दरिंदगी के साथ मारा गया और उसके बाद उसके शव के साथ जो व्यवहार हुआ....उसे देखकर क्या हम खुद को इंसान कह सकते हैं?

ये कैसी बहादूरी?------

एक बाघ को घेरकर हाथ पर बैठे शूटरों ने गोली से मारा और अपनी तस्वीर खिचवाई( जिसे हमने कई समाचारपत्रों में भी देखा).....किस लिहाज में इसे हम बहादूरी कहेंगे? मेरे विचार से ये कायरता है।

मेरी आत्मा तक को रोना आया.....

जब मोबाइल पर ये विडियो आया कि उस मरे बाघ का चेहरा  इंसान हाथों से नोंच रहे हैं....और वो " जंगल का राजा " मरा पड़ा है....ये देखकर आंसू निकल आए।

 ------अनुगुंजा


रविवार, 28 अगस्त 2022

चहक की पहल

 




" चहक " उठी बाल वाटिका की क्यारी,

जब मुस्कुराई " छोटी चिड़िया " प्यारी.....

गुरुजनों का हाथ पकड़े चलता बचपन,

मासूमों की मुस्कुाहट से खिल उठता उपवन.....

नन्हेें-नन्हें पग दौड़ लगाते अपने विद्यालय की ओर,

खिलखिलाता बाल मन झूमे, जैसे बारिश में नाचे मोर....

ज्ञान का मंदिर देता बच्चों को खुशहाली का खुला आसमान,

जहाँ उनके सपनों की उड़ान, पार कर जाए सातों जहान....

चहकते हुए बच्चे देते अपनी मनचाही स्वतंत्र अभिव्यक्ति,

उनकी तोतली जुबान बोले जैसे सीप में हो अमृत मोती....

चहक की मासूम महक से सुगंधित हमारा भारत,

विद्यालयों में जाने को हैं तैयार, मुस्कुराते मासूमों की सूरत...

नन्ही मुठ्ठियों में बंद होगी " टिम-टिम वाले छोटे तारों " की चमक,

मासूम आँखें देखेंगी " नानी की मोरनी " की चहकती चहक....

खेल-खेल में बच्चों संग शिक्षक खोलेंगे अनुपम ज्ञान का द्वार,

उनकी छोटी-सी " कागज़ की नाव " करेगी इंद्रधनुष को पार....

चहक से सदा चहकती रहेगी विद्यालय की चौखट,

जिसके आंगन सुनाई देगी " छुक-छुक रेलगाड़ी " की आहट...

चहक से मजबूत बनेगी भारतीय शिक्षा की बुनियाद,

इसकी रोशनी से मिलेगी हर मासूम को आनंद की सौगात।

      ---------- अनुगुंजा


रविवार, 14 अगस्त 2022

हैं हम हिन्दुस्तानी

 

"जय हिन्द" के नारे संग उदघोष करता हिन्दुस्तान,

"इनकलाब जिन्दाबाद" गूंजे माटी से आसमान....

तीन रंगों से सजा हमारा तिरंगा ,है हमारा अभिमान,

इसके खातिर हर भारतीय मिटा सकता अपनी जान....

धन्य हैं हम सवा सौ करोड़ भारतीय,जो जनमे भारत में,

भारत-माता की ममता की छांव में रहें हम ,हर जन्म में....

धर्म-भाषा है अलग पर कहलाते पहले हम हिन्दुस्तानी,

अनेकता में एकता की शक्ति ने रची भरत से भारत की कहानी....

आजादी के 75 साल------

आज हम सब हिन्दुस्तानी अपने देश "हिन्दुस्तान" की आजादी का जश्न मना रहें हैं। पूरे 75 साल हो गए भारत को स्वतंत्र हुए.....

अंग्रेज किसी चोर या लुटेरे की भांति भारत में आए और धीरे-धीरे करके पूरे देश को अपना गुलाम बना लिया।

 पहले अंग्रेजों ने " फूट डालो और राज करो " के तहत काम किया....फिर आसमान में आजाद उड़ान भरने वाली " सोने की चिड़िया " कब पिंजड़े में कैद हो गई,इसका शुरूआत में पता ही चला और जब एहसास हुआ गुलामी का तब तक बहुत देर हो चुकी थी....अंग्रेजी शासन का पंजा पूरे हिन्दुस्तान को अपनी गिरफ्त में ले चुका था।

गुलामी की घुटन क्या होती है इसका एहसास हिन्दुस्तान को होने लगा था। कहते हैं किसी को इतना मत दबाओ की वो विद्रोह कर बैठे....यही हुआ भारत के साथ,इसे भारत के इतिहास का नवजागरण ही कहेंगे...जहां हर भारतीय अपने देश को आजाद करने का सपना देखने लगा। जब इतने सारे लोगों का एक ही सपना हो,तो क्रांति की मशाल जल उठेगी न....

क्रांति की मशाल जलती रहे,इसके लिए क्रांतिकारियों ने अपने लहू से जलाए रखा इस मशाल को।

आज की आजादी अनेको वीर क्रांतिकारियों की कुर्बानी के बाद ही मिली है। न जाने कितने देशभक्त फांसी पर झूल गए होंगे, न जाने कितनो ने अपनी छाती पर गोली खाई होगी...

आज हम अपने देश की आजादी का 75 साल पूरे होने का जश्न मना रहें है....तो हमें ये कभी नहीं भूलना चाहिए कि ये स्वतंत्रता अनमोल है,इसका सदा सम्मान करें।

 ---- अनुगुंजा

                       जय हिन्द






जन्मदिन मम्मी का

  अगर हो सकता तो, मैं तारें तोड़ लाती, तेरी पैरों की पायल में सजा डालती....  कदमों में "माँ" तेरी जन्नत बसती है मेरी, तेरी हर आहट ...