रविवार, 9 अक्टूबर 2022

आदमखोर बाघ

 


अभी पूरे बिहार में...या हम ये कहें पूरे देश में आदमखोर बाघ के मारे जाने की खबर सुर्खियों में है। हर जगह यही आ रहा है कि वो बाघ आदमखोर था,उसने इतने लोगों की जान ली...अच्छा हुआ जो ये मारा गया। लोग,मीडिया सब मृत बाघ की तस्वीर को एक बहुत बड़ी उपलब्धी के रूप में प्रस्तुत कर गौरवांवित हो रहे हैं। जो इंसानों से टकराएगा,वो मारा जाएगा....वाली कहावत चीख-चीखकर हर लहजे में बोली जा रही है। लोग मृत बाघ के साथ सेल्फी ले रहें हैं...उसे अपने हाथों से नोच-नोचकर न जाने कौन-सी बहादूरी दिखा रहे हैं। गांव वाले खुश,प्रशासन खुश,बाघ को मारने वाले(हाथी पर बैठे) शूटर खुश......सब जश्न मना रहे हैं....बदला पूरा हुआ....इंसानों ने अपने दर्द,जख्म,आंसू का हिसाब ले लिया। यहां पर                 " आदमखोर बाघ " को मारने की इंसानों के जयजयकार वाली गाथा समाप्त होती है।

एक माँ का संघर्ष----

" माँ " शब्द पर केवल इंसानों का कॉपीराइट नहीं है, इस शब्द का मायना इंसान-जानवर-पक्षी....या सभी जीवों के लिए एकसमान होता है। " माँ केवल माँ होती है। " 

एक बाघिन अपने नन्हें शावकों को उनके पिता ( बाघ ) से बचाने के लिए मारी मारी फिरती है। वो माँ जानती थी कि अगर उसका पिता( बाघ ) सामने आ गया,तो वो अपने शावकों को उनके पिता के जानलेवा कहर से नहीं बचा पाएगी। अपने बच्चों को बचाने लिए वो माँ भटकती रही.....जबतक उसके बच्चे बड़े नहीं हो गए,तबतक वो " माँ " संघर्ष करती रही।

क्यों? बना वो बाघ आदमखोर------

आज हमारे देश में जंगल सिमटते जा रहे हैं...जंगलों का दायरा निरंतर कम होता जा रहा है। जंगल के हर हिस्सों पर इंसानी पैठ बढ़ता जा रहा है.....विकास,मनोरंजन,स्वार्थ के नाम पर लोग    " जंगल सफारी " के नाम पर कहीं न कहीं जानवरों के इलाकों में हस्तक्षेप कर रहे हैं या हम ये कहें की अतिक्रमण हो रहा है,तो गलत नहीं होगा।

जब हम इंसानों से उसका घर छीना जाता है तो इंसान             " खानाबदोश या रिफ्यूजी या बेघर " कहलाते हैं, वैसे इंसान सड़कों पर,गलियों में घूम घूमकर खाना मांगते हैं......

अब जरा इंसानों की जगह जंगली जानवरों को रखकर देखें....तो हमें पता चलेगा कि क्या इन्हें हम " आदमखोर " कह सकते हैं? 

जानवर तो हमेशा अपने स्वभाव, प्रकृति के हिसाब से ही चलता है, ये इंसानों की तरह बदलता नहीं। जानवर को जब भूख लगेगी,तो वो सबसे आसानी से मिलने वाला भोजन ही चाहेगा....जिसे इंसानी जुबान में शिकार कह सकते हैं। जिस जगह एक बार उसे आसानी से भोजन मिल जाता है वहीं जानवर बार बार जाता है,अपनी भूख को मिटाने के लिए। जैसे अगर हम आवारा कुत्ते को एक बार अपने घर के बाहर भोजन दे देते हैं तो वो कुत्ता वहीं बार बार आता है ताकि उसकी भूख मिट जाए।

क्या बाघ को मारना ही अंतिम उपाय था?----

जहां बाघ विलुप्त जीवों की श्रेणी में आते हैं....जहां इनकी घटती संख्या चिंता का कारण बन जाता है....वहां एक बाघ को हाथी पर बैठे शूटरों द्वारा गोली मरवाना कहां तक उचित है? 

क्या बाघ को सूई द्वारा बेहोश करके चिड़ियाघर या दूर जंगल या किसी नेशनल पार्क में छोड़ा नहीं जा सकता था....जो उसे इतनी दरिंदगी के साथ मारा गया और उसके बाद उसके शव के साथ जो व्यवहार हुआ....उसे देखकर क्या हम खुद को इंसान कह सकते हैं?

ये कैसी बहादूरी?------

एक बाघ को घेरकर हाथ पर बैठे शूटरों ने गोली से मारा और अपनी तस्वीर खिचवाई( जिसे हमने कई समाचारपत्रों में भी देखा).....किस लिहाज में इसे हम बहादूरी कहेंगे? मेरे विचार से ये कायरता है।

मेरी आत्मा तक को रोना आया.....

जब मोबाइल पर ये विडियो आया कि उस मरे बाघ का चेहरा  इंसान हाथों से नोंच रहे हैं....और वो " जंगल का राजा " मरा पड़ा है....ये देखकर आंसू निकल आए।

 ------अनुगुंजा


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