" चहक " उठी बाल वाटिका की क्यारी,
जब मुस्कुराई " छोटी चिड़िया " प्यारी.....
गुरुजनों का हाथ पकड़े चलता बचपन,
मासूमों की मुस्कुाहट से खिल उठता उपवन.....
नन्हेें-नन्हें पग दौड़ लगाते अपने विद्यालय की ओर,
खिलखिलाता बाल मन झूमे, जैसे बारिश में नाचे मोर....
ज्ञान का मंदिर देता बच्चों को खुशहाली का खुला आसमान,
जहाँ उनके सपनों की उड़ान, पार कर जाए सातों जहान....
चहकते हुए बच्चे देते अपनी मनचाही स्वतंत्र अभिव्यक्ति,
उनकी तोतली जुबान बोले जैसे सीप में हो अमृत मोती....
चहक की मासूम महक से सुगंधित हमारा भारत,
विद्यालयों में जाने को हैं तैयार, मुस्कुराते मासूमों की सूरत...
नन्ही मुठ्ठियों में बंद होगी " टिम-टिम वाले छोटे तारों " की चमक,
मासूम आँखें देखेंगी " नानी की मोरनी " की चहकती चहक....
खेल-खेल में बच्चों संग शिक्षक खोलेंगे अनुपम ज्ञान का द्वार,
उनकी छोटी-सी " कागज़ की नाव " करेगी इंद्रधनुष को पार....
चहक से सदा चहकती रहेगी विद्यालय की चौखट,
जिसके आंगन सुनाई देगी " छुक-छुक रेलगाड़ी " की आहट...
चहक से मजबूत बनेगी भारतीय शिक्षा की बुनियाद,
इसकी रोशनी से मिलेगी हर मासूम को आनंद की सौगात।
---------- अनुगुंजा

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