शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2022

मैं

 " मैं " शब्द में सिमटती पूरी दुनिया,

हर बात में खुद को आगे रखती दुनिया....

इस " मैं " के जाल से कोई न निकला,

इसलिए कलयुग स्वार्थ की भेंट चढ़ा....

" मैं " के अलावा और कोई न दिखता,

हर आईने में इंसान खुद को ही निहारता.....

" मैं " की दर्द-दुख-पीड़ा को मनुष्य रखता सर्वोपरी,

अपनी तकलीफ के आगे दूसरों का दर्द करें अनदेखी....

इस " मैं " का सुख भी इंसान के लिए सर्वप्रथम होता,

इसके सामने अन्य के दुखों को सदा नजरअंदाज करता....

" मैं " की मुस्कुराहट को फिका लगे दूसरों के आँखों के आंसू,

इस पूरे ब्रम्हांड में मानव केवल " मैं " को लेकर ही बनता जिज्ञासु.....

हर प्रकार के दोषों पर भारी पड़ती " मैं " की मोहमाया,

इसके कहर को इंसान अभी तक न समझ पाया.....

अनुगुंजा





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