" मैं " शब्द में सिमटती पूरी दुनिया,
हर बात में खुद को आगे रखती दुनिया....
इस " मैं " के जाल से कोई न निकला,
इसलिए कलयुग स्वार्थ की भेंट चढ़ा....
" मैं " के अलावा और कोई न दिखता,
हर आईने में इंसान खुद को ही निहारता.....
" मैं " की दर्द-दुख-पीड़ा को मनुष्य रखता सर्वोपरी,
अपनी तकलीफ के आगे दूसरों का दर्द करें अनदेखी....
इस " मैं " का सुख भी इंसान के लिए सर्वप्रथम होता,
इसके सामने अन्य के दुखों को सदा नजरअंदाज करता....
" मैं " की मुस्कुराहट को फिका लगे दूसरों के आँखों के आंसू,
इस पूरे ब्रम्हांड में मानव केवल " मैं " को लेकर ही बनता जिज्ञासु.....
हर प्रकार के दोषों पर भारी पड़ती " मैं " की मोहमाया,
इसके कहर को इंसान अभी तक न समझ पाया.....
अनुगुंजा
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