मेरे विचार से नारी कभी भी कमजोर नहीं थी, ये तो वो मानसिकता रही...जो हमेशा नारी के अबला रूप को ही देखा या हमेशा देखना चाहा। हमारी दादी-नानी पूरे घर को संभालने के साथ-साथ गांव की जमीन की समस्या आदि को भी देखती थी.....वो गाय-भैंसों की देखभाल करने के साथ खेतों में बीज,खाद,सिंचाई का भी पूरा ध्यान रखती थी। जरूरत पड़ने पर वो बैलों से हल जोताने का काम भी करती थी। कुएं से पानी निकालना, जमीन पर बैठकर जांता चलाकर आटा,बेसन,सत्तू आदि निकालना...खल-मूसल में मिर्च,हल्दी आदि मसालों को पीसना...ये सब उनके रोज के साधारण कहे जाने वाले काम थे।
नारी हमेशा सशक्त ही रही....वो आंगन की तुलसी से लेकर अपने घर की चौकीदार भी रही....वो बच्चे को जन्म देकर माँ जरूर बनी पर जरूरत पड़ने पर पिता का हर फर्ज भी निभाया।
भारतीय नारी की इस यात्रा में हम जब अपनी दादी-नानी से होते हुए अपनी माँ,फुआ,मौसी,मामी,चाची के दौर में आते हैं तो यहां भी हम औरत के शक्ति रूप का ही दर्शन करते हैं। समय जरूर बदलता है,दौर बदलता है, पीढ़ी बदलती है....पर औरत की ताकत,उसकी हिम्मत वही रहती है। हमने अपने बचपन से लेकर आजतक अपनी माँ, फुआ, मौसी, मामी, चाची को हर क्षेत्र में सर्वोत्तम रूप में ही पाया होगा। फर्क बस इतना रहा कि हमारी दादी-नानी का जीवन गाँव में ज्यादातर बीता और हमारी माताओं का शहर में....
हमारी माँ को भले ही मसाला पिसने के लिए मिक्सर मिला, पिसा-पिसाया आटा मिला होगा...खेती आदि का काम उनके जिम्मे नहीं आया होगा.....लेकिन इससे कहीं अधिक जिम्मेदारियों को उन्होंने बखूबी निभाया होगा। रोज सुबह चार या पांच बजे उठकर जल्दी-जल्दी से बच्चों का, पति का और घर के सभी लोगों का नाश्ता बनाना...फिर बच्चों और पति का टिफिन तैयार करना....बच्चों के स्कूल का बैग,पानी का बोतल तैयार करना, बच्चों के जूतों में पॉलिस करना...ऐसे न जाने कितने काम (जिन्हें हम कभी छोटे-मोटे काम भी कह देते हैं) हमारी मम्मी ने हमारे लिए किया होगा। हमें स्कूल भेजने की जिम्मेदारी भी मम्मी की ही होती थी...फिर चाहे वो हमारी अंगुली पकड़कर पैदल स्कूल तक छोड़कर आती थी या रिक्शा-बस से भेजने की बात होती थी,वो भागते-भागते हमें बस पर समय से चढ़ाती थी ताकि हम स्कूल लेट न हो। हमारे स्कूल जाने से लेकर वापस घर आने तक हमारी मम्मी किसी सुपर वुमन की तरह अपना सब काम कर चुकी होती थी.....फिर हमारे घर आने पर हमें हमारी पसंद का खाना खिलाने से लेकर होमवर्क भी मम्मी ही कराती थी। हमारी परिक्षा और रिजल्ट पर हमसे ज्यादा मम्मी सोचती थी, हमसे ज्यादा उसे डर रहता था कि कहीं हमें कम नम्बर न आ जाए। अपनी हर इच्छा,तमन्ना को हमारी मम्मी ने हम पर वारा है....उसके लिए उसकी पूरी दुनिया उसका परिवार ही रहा है।
आज जब हम अपने सामने आज की नारी को देखते हैं तो मन गर्व से भर जाता है और सिर फक्र से ऊँचा हो जाता है। आज औरत अपने घर-परिवार-बच्चों को देखने के साथ-साथ ऑफिस,बैंक,स्कूल...भी संभाल रही है, इतना ही नहीं वो अपने पति के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर उनके कामों में मदद भी कर रही है। आज मैं एक किराना दुकान में गई,वहां दुकान के मालिक नहीं थे,बल्कि उनकी पत्नी बैठी थी जिन्हें मैं मामी कहती हूँ। वो मामी बहुत अच्छे तरीके से पूरे दुकान का काम संभाल रही थी। मामी से मिलकर बहुत अच्छा लगा, नारी की मजबूत शख्सियत सामने आई।
मेरे मोहल्ले में मैंने एक ऐसी दीदी रहती हैं, जो न केवल अपने बेटे को पढ़ा रही हैं,बल्कि बेहतरीन तरीके से उसकी परवरिश भी कर रही हैं। उनकी बस इतनी पहचान नहीं है...मोहल्ले में उनकी चूड़ी,लहठी,सौंदर्य प्रधान समानों आदि की शॉप(दुकान) है जो पहले छोटी थी पर उनकी मेहनत,लगन और ईमानदारी से बड़ी शॉप (दुकान) बन गई है। ये उस दीदी का हौसला ही है जो अब वो लेडिज रेडिमेड कपड़ों की शॉप(दुकान) भी खोलने जा रही हैं। बात यही खत्म नहीं होती है.....जब वो गर्भवती थी तो अपनी डिलीवरी के अंतिम दिन तक वो शॉप(दुकान) पर बैठी और चंद दिन आराम करने के तुरंत बाद वो फिर से अपने शॉप(दुकान) में बैठ रही हैं। आज जब मैं उनके शॉप पर गई, तो सबसे पहले मैंने उन्हें "बेटी जन्म" की बधाई दी और पूछा बिटिया कहां है? उन्होंने मुस्कुराते हुए वही हाथों से इशारा कर बताया यही हैं...मैं चौंक गई, उन्होंने बहुत अच्छे तरीके से अपनी बच्ची को रखा था उसकी गुलाबी मच्छरदानी भी लगी थी....पंखे के नीचे उनकी बच्ची बड़े आराम से सो रही थी। इस सबके बीच वहीं दीदी अपने बेटे को पढ़ा भी रही थी। ये सब देखकर मन यही कहा......
सैल्यूट भारतीय नारी
------- अनुगुंजा

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