शनिवार, 21 मई 2022

हवा के विरूद्ध

 

है तू भारत की नारी,

तुझमे नहीं कोई लाचारी.....

तेरे हौसलों से झूकता आसमां,

इस धरती की है तू ही माँ......

जननी कदमों में तेरे सारा जहान,

तुझ-सा न हुआ कभी कोई महान.....

हमेशा हवा के विरूद्ध तू है रहती,

मुश्किले तेरे आगे सदा झूकती.....

विपरीत परिस्थिति भी तुझे डिगा न पाती,

हर प्रतिकूल को अनुकूल तू बना जाती.....

बिना रोटी वाली थाली में खाना खिलाती,

अपने बच्चे के लिए चाँद को मामा बनाती..... 

रूठे बच्चे को सपनों वाली कहानी में घूमाती,

लाल परी की कल्पना में बच्चे की इच्छापूर्ती कराती.....

कुएं से पानी निकालते बदली हाथों की लकीरों को,

घर का बोझ उठाकर किया दरकिनार हर तकरीरों को.....

भींगी लकड़ी में फूंक मारकर आग जलाकर भोजन पकाती,

उस धुएं की घुटन में सांस लेकर सांसों के लिए लड़ना बताती.... 

छप्पर की छेद से बरसती बूंदों को अपने आंचल से रोकती,

ऐ माँ ! ये असंभव तू ही केवल कैसे कर लेती......

                       ---------- अनुगुंजा






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