मंगलवार, 17 मई 2022

दस बजिया फूल

 आप सोच रहे होंगे कि क्या फूल भी घड़ी देखता है...जो उसे दस बजिया (यानि दस बजे) फूल कहते हैं.....

असल में ये सच है....ये फूल खिलता जरूर है पर सुबह दस बजे के बाद खुद-ब-खुद मुरझा जाता है....या कहे मर जाता है। इसे हम इस फूल का स्वभाव भी कह सकते हैं...आप भी नीचे देखे इस फूल को----


फूल को देखते ही आप इसे पहचान गए होंगे....आपके भी गमले में ये फूल जरूर होगा....कागज की तरह कोमल होता है ये फूल और रंग भी कितना प्यारा है इसे हम गुलाबी रंग कहेंगे या रानीकलर.??? आप कमेंट में जरूर बताए।
आज एक और फूल की बात मैं कर रही हूँ...वो है " सूर्यमुखी " का फूल...जो सूरज की दिशा में ही हमेशा घूमता रहता है...नीचे उसकी फोटो डाल रही हूँ----
सूर्यमुखी की खेती होती है....इससे तेल भी बनता है और भी बहुत-सी चीजे इसके फूलों से बनती है।
कहने का यही अर्थ है कि पेड़-पौधे न सिर्फ जीवित होते हैं,सांस लेते हैं...बल्कि इनमें एहसास और समझ भी होती है।
जब इंसान किसी भी पेड़ पर कुल्हाड़ी चलाता है तो उस पेड़ की बस चीख नहीं निकलती....बाकी दर्द,तड़प,पीड़ा तो पेड़ को होती ही है। कितनी बार हम देखते हैं कि कुछ गमले के पौधों के जगह को हम जब बदलते हैं तो वो पौधे मुरझाने लगते है,मानो वो कह रहे हो, कि उन्हें ये जगह पसंद नहीं है,उन्हें अपनी पुरानी वाली जगह पर रख दो। बहुत बार जब हम दो गमलों को किसी कारणवश अलग कर देते है तो भी उनके पौधे मुरझाने लगते है...मानो वो बोल रहे हो, कि मुझे मेरे दोस्त से अलग मत करो।

जब इंसान अपने घर में लगे पौधों से बात करता है,तो उसे जरूर ये एहसास होता है कि पौधे उसे सुन रहे हैं और उन पौधों का बहुत अच्छी तरह विकास भी होता है,वो खूब फूल भी देते हैं।जिस तरह वार्तालाप या बातचीत किसी भी रिश्ते को मजबूत बनाती है उसी तरह पेड़-पौधों से बात करना,उन्हें हमारा मित्र बनाता है और हम एक अटूट बंधन में बंध जाते हैं।हम मुस्कुराकर अपनी खुशी बताते हैं और पेड़-पौधे...  खूब सारे फल-फूल,स्वच्छ हवा देकर झूमते हुए अपनी खुशी जताते हैं और बिना कुछ बोले हमें दिल से मित्र मान लेते हैं।

तो प्रकृति के साथ इंसान का ऐसा रिश्ता है मेरी नजर में....यही कारण है कि जब प्रकृति क्रोधित होती है मानव द्वारा की गई तबाही पर...तो सिर्फ और सिर्फ विनाश ही होता है।

हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि " प्रकृति है तो ये धरती है और धरती है तो इंसान है "
मेरी मम्मी जब भी अपने छत पर लगे पौधों को पानी नहीं दे पाती है तो वो तड़प उठती है....जब उसके पौधों को पानी मिल जाता है तो मम्मी तृप्त हो जाती है और उसका मन शांत हो जाता है।मुझे कई बार लगता है कि मम्मी के लिए वो सिर्फ पौधे नहीं,बल्कि उनके औलाद के समान हैं।

शायद इसी बातों को ध्यान में रखकर बिहार सरकार ने जनजीवन हरियाली पर काम करना शुरू किया है....लेकिन इसमें केवल सरकार के करने से कुछ नहीं होगा,जबतक आम जनता की इसमें भागीदारी नहीं होती.....सबके कोशिश से ही हमारी धरती पर हरियाली रहेगी और हमें स्वच्छ हवा मिलेगी।
   
                                          अनुगुंजा



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