प्रकृति को " माँ " इसलिए कहा जाता है कि वो अपने बच्चों का कष्ट नहीं देख सकती है। जब भी तपती, तेज, बेचैन कर देने वाली गर्मी पड़ती है जिससे इंसान,जानवर,पक्षी,पेड़-पौधे सब तड़प उठते हैं तब निश्चित रूप से बारिश होने लगती है।
गर्मी का मौसम जब अपने रौद्र रूप में आता है, तो दिन-रात गर्म हवाएं (जिसे लू कहते हैं) चलने लगती है,पसीना बहुत ज्यादा गिरता है और हवा में नमी के कारण पसीना सूखता नहीं, हर जीव पानी-पानी करता हुआ, पानी की तलाश करता नजर आता है...फिर चाहे वो सड़क पर भटकने वाला आवारा कुत्ता ही क्यों न हो,जो अपनी गर्मी मिटाने के लिए नाले में बैठा रहता है.....या फिर सड़क पर भटकने वाली गाय, जो अपने संस्कार के विपरित उस कठिन स्थिति में भी नहीं जाती है और किसी भी हाल में नाले का पानी नहीं पीती है,बल्कि बंद पड़े नल के पास इस उम्मीद से खड़ी रहती है कि कोई उसे पानी पिला दें। घर के अंदर और बाहर लगे पौधे भी मुरझा जाते हैं,पेड़ों के पत्ते भी पीले पड़ कर गिरने लगते हैं...जमीन की मिट्टी सूखकर दरार के दर्शन कराने लगती है.....कुआं, नदी, तालाब सब सूखने लगता है.......इससे भी बदत्तर हालात तो तब होते हैं जब इंसान,जानवर,पक्षी गर्मी की उमस के कारण सांस भी ठीक प्रकार से नहीं ले पाते हैं और लगता है कि इन सभी जीवों का अब दम निकल जाएगा.....
जब धरती का हर जीव,पेड़-पौधे गर्मी से मरने के कागार पर पहुँच जाते हैं और गर्मी अपने कहर की सारी हदें तोड़ देती हैं तो प्रकृति को हम पर रहम आ जाता है और फिर अचानक बारिश होने लगती है।
इधर कई दिनों से बहुत तेज गर्मी पड़ रही थी....रात को भी "लू" चलने जैसा लग रहा था...ऐसा लग रहा था कि वातावरण से ठंडी हवा जैसे गायब हो गई हो। बेहिसाब पसीना बह रहा था....पौधों में पानी डालते ही पानी जैसे गुम हो जा रहा था गमले की मिट्टी से और पत्ते मुरझाकर सूख रहे थे। हद से ज्यादा पसीना बहने के कारण लगातार तेज प्यास लग रही थी, हमेशा गला सूखा जैसा लग रहा था....पानी पीते-पीते हालत खराब हो गई थी....
लेकिन आज सुबह लगभग पाँच बजे से बारिश होने लगी...और एक झटके में मौसम सुहावना हो गया। कहां गई वो गर्म हवा...कहां गई वो तेज धूप....सब बदल गया और प्रकृति हम पर रहम कर जैसे मुस्कुरा रही थी।
गमले की मिट्टी आज सुबह भींगी-भींगी मिली और साथ में मिट्टी की वो सौंधी सुगंध, सारे वातावरण को खुशनुमा बना रही थी। बारिश की बूंदें पत्तों पर लटकते हुए किसी मोती की तरह चमक रही थी....सारे मुरझाए,धूल-धूप से धुंधले पड़े पत्ते बारिश से साफ होकर अपने कुदरती "हरे" रंग की हरियाली चारों ओर बिखेर रहे थे। फूलों पर भवरे नहीं, बल्कि बारिश की बूंदें सिप के मोती की तरह अपनी सुंदरता दिखा रहे थे। चारों तरफ बहने वाली ठंडी हवाएं हमें शीतलता का एहसास करा रही थी।
कल और आज में इतना बड़ा अंतर केवल प्रकृति ही कर सकती है। गर्मी से बेचैन कल का मन, आज ठंडी सुकून के झूले में झूल रहा है। जब मन खुश होता है तो वो हर बात पर झूमता है,कोई भी गाना गाता-सुनता-गुनगुनाता है, अच्छे-अच्छे पकवान बनाने का मन करता है, मन हँसता है और चारों तरफ केवल मुस्कुराहट बांटता है। ये सब केवल और केवल प्रकृति के ममतामयी कृपा से ही संभव होता है। वरना गर्मी से सभी जीव केवल परेशान ही रहता है और केवल नकारात्मक बातें ही सोंचता और करता है। ये बात इंसानों के अलावा जानवरों और पक्षियों पर भी लागू होता है....कई बार अधिक गर्मी से बेचैन होकर कुत्ते आपस में लड़ते हैं या इंसानों पर हमला भी कर देते हैं। इसी तरह प्यास से तड़प रही गाय भी कभी-कभी अपनी सींग मारकर इंसानों को जख्मी कर देती है। तो ये होता है असर....अगर प्रकृति रूठ जाए तो.....
बारिश के बाद की हरियाली से केवल हमारा मन ही पुलकित नहीं होता है, बल्कि हमारी आँखें भी इस सुंदर दृश्य को अपनी नजरों में समेटकर अमृत की ठंडक पाती है। हमारी सांसें, हमारा शरीर, हमारा रोम-रोम, इस प्राकृतिक सौंदर्य की अनुभूति करता है और विधाता का शुक्रिया अदा करता है।
" प्रकृति वरदान बने या अभिशाप....ये इंसानों पर निर्भर करता है। "
अनुगुंजा






