रविवार, 29 मई 2022

बारिश की बूंदे

 

प्रकृति को " माँ " इसलिए कहा जाता है कि वो अपने बच्चों का कष्ट नहीं देख सकती है। जब भी तपती, तेज, बेचैन कर देने वाली गर्मी पड़ती है जिससे इंसान,जानवर,पक्षी,पेड़-पौधे सब तड़प उठते हैं तब निश्चित रूप से बारिश होने लगती है। 

गर्मी का मौसम जब अपने रौद्र रूप में आता है, तो दिन-रात गर्म हवाएं (जिसे लू कहते हैं) चलने लगती है,पसीना बहुत ज्यादा गिरता है और हवा में नमी के कारण पसीना सूखता नहीं, हर जीव पानी-पानी करता हुआ, पानी की तलाश करता नजर आता है...फिर चाहे वो सड़क पर भटकने वाला आवारा कुत्ता ही क्यों न हो,जो अपनी गर्मी मिटाने के लिए नाले में बैठा रहता है.....या फिर सड़क पर भटकने वाली गाय, जो अपने संस्कार के विपरित उस कठिन स्थिति में भी नहीं जाती है और किसी भी हाल में नाले का पानी नहीं पीती है,बल्कि बंद पड़े नल के पास इस उम्मीद से खड़ी रहती है कि कोई उसे पानी पिला दें। घर के अंदर और बाहर लगे पौधे भी मुरझा जाते हैं,पेड़ों के पत्ते भी पीले पड़ कर गिरने लगते हैं...जमीन की मिट्टी सूखकर दरार के दर्शन कराने लगती है.....कुआं, नदी, तालाब सब सूखने लगता है.......इससे भी बदत्तर हालात तो तब होते हैं जब इंसान,जानवर,पक्षी गर्मी की उमस के कारण सांस भी ठीक प्रकार से नहीं ले पाते हैं और लगता है कि इन सभी जीवों का अब दम निकल जाएगा.....

जब धरती का हर जीव,पेड़-पौधे गर्मी से मरने के कागार पर पहुँच जाते हैं और गर्मी अपने कहर की सारी हदें तोड़ देती हैं तो प्रकृति को हम पर रहम आ जाता है और फिर अचानक बारिश होने लगती है।

इधर कई दिनों से बहुत तेज गर्मी पड़ रही थी....रात को भी "लू" चलने जैसा लग रहा था...ऐसा लग रहा था कि वातावरण से ठंडी हवा जैसे गायब हो गई हो। बेहिसाब पसीना बह रहा था....पौधों में पानी डालते ही पानी जैसे गुम हो जा रहा था गमले की मिट्टी से और पत्ते मुरझाकर सूख रहे थे। हद से ज्यादा पसीना बहने के कारण लगातार तेज प्यास लग रही थी, हमेशा गला सूखा जैसा लग रहा था....पानी पीते-पीते हालत खराब हो गई थी....

लेकिन आज सुबह लगभग पाँच बजे से बारिश होने लगी...और एक झटके में मौसम सुहावना हो गया। कहां गई वो गर्म हवा...कहां गई वो तेज धूप....सब बदल गया और प्रकृति हम पर रहम कर जैसे मुस्कुरा रही थी।

गमले की मिट्टी आज सुबह भींगी-भींगी मिली और साथ में मिट्टी की वो सौंधी सुगंध, सारे वातावरण को खुशनुमा बना रही थी। बारिश की बूंदें पत्तों पर लटकते हुए किसी मोती की तरह चमक रही थी....सारे मुरझाए,धूल-धूप से धुंधले पड़े पत्ते बारिश से साफ होकर अपने कुदरती "हरे" रंग की हरियाली चारों ओर बिखेर रहे थे। फूलों पर भवरे नहीं, बल्कि बारिश की बूंदें सिप के मोती की तरह अपनी सुंदरता दिखा रहे थे। चारों तरफ बहने वाली ठंडी हवाएं हमें शीतलता का एहसास करा रही थी।

कल और आज में इतना बड़ा अंतर केवल प्रकृति ही कर सकती है।  गर्मी से बेचैन कल का मन, आज ठंडी सुकून के झूले में झूल रहा है। जब मन खुश होता है तो वो हर बात पर झूमता है,कोई भी गाना गाता-सुनता-गुनगुनाता है, अच्छे-अच्छे पकवान बनाने का मन करता है, मन हँसता है और चारों तरफ केवल मुस्कुराहट बांटता है। ये सब केवल और केवल प्रकृति के ममतामयी कृपा से ही संभव होता है। वरना गर्मी से सभी जीव केवल परेशान ही रहता है और केवल नकारात्मक बातें ही सोंचता और करता है। ये बात इंसानों के अलावा जानवरों और पक्षियों पर भी लागू होता है....कई बार अधिक गर्मी से बेचैन होकर कुत्ते आपस में लड़ते हैं या इंसानों पर हमला भी कर देते हैं। इसी तरह प्यास से तड़प रही गाय भी कभी-कभी अपनी सींग मारकर इंसानों को जख्मी कर देती है। तो ये होता है असर....अगर प्रकृति रूठ जाए तो.....

बारिश के बाद की हरियाली से केवल हमारा मन ही पुलकित नहीं होता है, बल्कि हमारी आँखें भी इस सुंदर दृश्य को अपनी नजरों में समेटकर अमृत की ठंडक पाती है। हमारी सांसें, हमारा शरीर, हमारा रोम-रोम, इस प्राकृतिक सौंदर्य की अनुभूति करता है और विधाता का शुक्रिया अदा करता है।

" प्रकृति वरदान बने या अभिशाप....ये इंसानों पर निर्भर करता है। "

अनुगुंजा


शनिवार, 21 मई 2022

हवा के विरूद्ध

 

है तू भारत की नारी,

तुझमे नहीं कोई लाचारी.....

तेरे हौसलों से झूकता आसमां,

इस धरती की है तू ही माँ......

जननी कदमों में तेरे सारा जहान,

तुझ-सा न हुआ कभी कोई महान.....

हमेशा हवा के विरूद्ध तू है रहती,

मुश्किले तेरे आगे सदा झूकती.....

विपरीत परिस्थिति भी तुझे डिगा न पाती,

हर प्रतिकूल को अनुकूल तू बना जाती.....

बिना रोटी वाली थाली में खाना खिलाती,

अपने बच्चे के लिए चाँद को मामा बनाती..... 

रूठे बच्चे को सपनों वाली कहानी में घूमाती,

लाल परी की कल्पना में बच्चे की इच्छापूर्ती कराती.....

कुएं से पानी निकालते बदली हाथों की लकीरों को,

घर का बोझ उठाकर किया दरकिनार हर तकरीरों को.....

भींगी लकड़ी में फूंक मारकर आग जलाकर भोजन पकाती,

उस धुएं की घुटन में सांस लेकर सांसों के लिए लड़ना बताती.... 

छप्पर की छेद से बरसती बूंदों को अपने आंचल से रोकती,

ऐ माँ ! ये असंभव तू ही केवल कैसे कर लेती......

                       ---------- अनुगुंजा






शुक्रवार, 20 मई 2022

भारत की नारी


मेरे विचार से नारी कभी भी कमजोर नहीं थी, ये तो वो मानसिकता रही...जो हमेशा नारी के अबला रूप को ही देखा या हमेशा देखना चाहा। हमारी दादी-नानी पूरे घर को संभालने के साथ-साथ गांव की जमीन की समस्या आदि को भी देखती थी.....वो गाय-भैंसों की देखभाल करने के साथ खेतों में बीज,खाद,सिंचाई का भी पूरा ध्यान रखती थी। जरूरत पड़ने पर वो बैलों से हल जोताने का काम भी करती थी। कुएं से पानी निकालना, जमीन पर बैठकर जांता चलाकर आटा,बेसन,सत्तू आदि निकालना...खल-मूसल में मिर्च,हल्दी आदि मसालों को पीसना...ये सब उनके रोज के साधारण कहे जाने वाले काम थे।

नारी हमेशा सशक्त ही रही....वो आंगन की तुलसी से लेकर अपने घर की चौकीदार भी रही....वो बच्चे को जन्म देकर माँ जरूर बनी पर जरूरत पड़ने पर पिता का हर फर्ज भी निभाया।

भारतीय नारी की इस यात्रा में हम जब अपनी दादी-नानी से होते हुए अपनी माँ,फुआ,मौसी,मामी,चाची के दौर में आते हैं तो यहां भी हम औरत के शक्ति रूप का ही दर्शन करते हैं। समय जरूर बदलता है,दौर बदलता है, पीढ़ी बदलती है....पर औरत की ताकत,उसकी हिम्मत वही रहती है। हमने अपने बचपन से लेकर आजतक अपनी माँ, फुआ, मौसी, मामी, चाची को हर क्षेत्र में सर्वोत्तम रूप में ही पाया होगा। फर्क बस इतना रहा कि हमारी दादी-नानी का जीवन गाँव में ज्यादातर बीता और हमारी माताओं का शहर में....

हमारी माँ को भले ही मसाला पिसने के लिए मिक्सर मिला, पिसा-पिसाया आटा मिला होगा...खेती आदि का काम उनके जिम्मे नहीं आया होगा.....लेकिन इससे कहीं अधिक जिम्मेदारियों को उन्होंने बखूबी निभाया होगा। रोज सुबह चार या पांच बजे उठकर जल्दी-जल्दी से बच्चों का, पति का और घर के सभी लोगों का नाश्ता बनाना...फिर बच्चों और पति का टिफिन तैयार करना....बच्चों के स्कूल का बैग,पानी का बोतल तैयार करना, बच्चों के जूतों में पॉलिस करना...ऐसे न जाने कितने काम (जिन्हें हम कभी छोटे-मोटे काम भी कह देते हैं) हमारी मम्मी ने हमारे लिए किया होगा। हमें स्कूल भेजने की जिम्मेदारी भी मम्मी की ही होती थी...फिर चाहे वो हमारी अंगुली पकड़कर पैदल स्कूल तक छोड़कर आती थी या रिक्शा-बस से भेजने की बात होती थी,वो भागते-भागते हमें बस पर समय से चढ़ाती थी ताकि हम स्कूल लेट न हो। हमारे स्कूल जाने से लेकर वापस घर आने तक हमारी मम्मी किसी सुपर वुमन की तरह अपना सब काम कर चुकी होती थी.....फिर हमारे घर आने पर हमें हमारी पसंद का खाना खिलाने से लेकर होमवर्क भी मम्मी ही कराती थी। हमारी परिक्षा और रिजल्ट पर हमसे ज्यादा मम्मी सोचती थी, हमसे ज्यादा उसे डर रहता था कि कहीं हमें कम नम्बर न आ जाए। अपनी हर इच्छा,तमन्ना को हमारी मम्मी ने हम पर वारा है....उसके लिए उसकी पूरी दुनिया उसका परिवार ही रहा है।

आज जब हम अपने सामने आज की नारी को देखते हैं तो मन गर्व से भर जाता है और सिर फक्र से ऊँचा हो जाता है। आज औरत अपने घर-परिवार-बच्चों को देखने के साथ-साथ ऑफिस,बैंक,स्कूल...भी संभाल रही है, इतना ही नहीं वो अपने पति के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर उनके कामों में मदद भी कर रही है। आज मैं एक किराना दुकान में गई,वहां दुकान के मालिक नहीं थे,बल्कि उनकी पत्नी बैठी थी जिन्हें मैं मामी कहती हूँ। वो मामी बहुत अच्छे तरीके से पूरे दुकान का काम संभाल रही थी। मामी से मिलकर बहुत अच्छा लगा, नारी की मजबूत शख्सियत सामने आई।

मेरे मोहल्ले में मैंने एक ऐसी दीदी रहती हैं, जो न केवल अपने बेटे को पढ़ा रही हैं,बल्कि बेहतरीन तरीके से उसकी परवरिश भी कर रही हैं। उनकी बस इतनी पहचान नहीं है...मोहल्ले में उनकी चूड़ी,लहठी,सौंदर्य प्रधान समानों आदि की शॉप(दुकान) है जो पहले छोटी थी पर उनकी मेहनत,लगन और ईमानदारी से बड़ी शॉप (दुकान) बन गई है। ये उस दीदी का हौसला ही है जो अब वो लेडिज रेडिमेड कपड़ों की शॉप(दुकान) भी खोलने जा रही हैं। बात यही खत्म नहीं होती है.....जब वो गर्भवती थी तो अपनी डिलीवरी के अंतिम दिन तक वो शॉप(दुकान) पर बैठी और चंद दिन आराम करने के तुरंत बाद वो फिर से अपने शॉप(दुकान) में बैठ रही हैं। आज जब मैं उनके शॉप पर गई, तो सबसे पहले मैंने उन्हें "बेटी जन्म" की बधाई दी और पूछा बिटिया कहां है? उन्होंने मुस्कुराते हुए वही हाथों से इशारा कर बताया यही हैं...मैं चौंक गई, उन्होंने बहुत अच्छे तरीके से अपनी बच्ची को रखा था उसकी गुलाबी मच्छरदानी भी लगी थी....पंखे के नीचे उनकी बच्ची बड़े आराम से सो रही थी। इस सबके बीच वहीं दीदी अपने बेटे को पढ़ा भी रही थी। ये सब देखकर मन यही कहा......

                 सैल्यूट भारतीय नारी

                              ------- अनुगुंजा


मंगलवार, 17 मई 2022

दस बजिया फूल

 आप सोच रहे होंगे कि क्या फूल भी घड़ी देखता है...जो उसे दस बजिया (यानि दस बजे) फूल कहते हैं.....

असल में ये सच है....ये फूल खिलता जरूर है पर सुबह दस बजे के बाद खुद-ब-खुद मुरझा जाता है....या कहे मर जाता है। इसे हम इस फूल का स्वभाव भी कह सकते हैं...आप भी नीचे देखे इस फूल को----


फूल को देखते ही आप इसे पहचान गए होंगे....आपके भी गमले में ये फूल जरूर होगा....कागज की तरह कोमल होता है ये फूल और रंग भी कितना प्यारा है इसे हम गुलाबी रंग कहेंगे या रानीकलर.??? आप कमेंट में जरूर बताए।
आज एक और फूल की बात मैं कर रही हूँ...वो है " सूर्यमुखी " का फूल...जो सूरज की दिशा में ही हमेशा घूमता रहता है...नीचे उसकी फोटो डाल रही हूँ----
सूर्यमुखी की खेती होती है....इससे तेल भी बनता है और भी बहुत-सी चीजे इसके फूलों से बनती है।
कहने का यही अर्थ है कि पेड़-पौधे न सिर्फ जीवित होते हैं,सांस लेते हैं...बल्कि इनमें एहसास और समझ भी होती है।
जब इंसान किसी भी पेड़ पर कुल्हाड़ी चलाता है तो उस पेड़ की बस चीख नहीं निकलती....बाकी दर्द,तड़प,पीड़ा तो पेड़ को होती ही है। कितनी बार हम देखते हैं कि कुछ गमले के पौधों के जगह को हम जब बदलते हैं तो वो पौधे मुरझाने लगते है,मानो वो कह रहे हो, कि उन्हें ये जगह पसंद नहीं है,उन्हें अपनी पुरानी वाली जगह पर रख दो। बहुत बार जब हम दो गमलों को किसी कारणवश अलग कर देते है तो भी उनके पौधे मुरझाने लगते है...मानो वो बोल रहे हो, कि मुझे मेरे दोस्त से अलग मत करो।

जब इंसान अपने घर में लगे पौधों से बात करता है,तो उसे जरूर ये एहसास होता है कि पौधे उसे सुन रहे हैं और उन पौधों का बहुत अच्छी तरह विकास भी होता है,वो खूब फूल भी देते हैं।जिस तरह वार्तालाप या बातचीत किसी भी रिश्ते को मजबूत बनाती है उसी तरह पेड़-पौधों से बात करना,उन्हें हमारा मित्र बनाता है और हम एक अटूट बंधन में बंध जाते हैं।हम मुस्कुराकर अपनी खुशी बताते हैं और पेड़-पौधे...  खूब सारे फल-फूल,स्वच्छ हवा देकर झूमते हुए अपनी खुशी जताते हैं और बिना कुछ बोले हमें दिल से मित्र मान लेते हैं।

तो प्रकृति के साथ इंसान का ऐसा रिश्ता है मेरी नजर में....यही कारण है कि जब प्रकृति क्रोधित होती है मानव द्वारा की गई तबाही पर...तो सिर्फ और सिर्फ विनाश ही होता है।

हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि " प्रकृति है तो ये धरती है और धरती है तो इंसान है "
मेरी मम्मी जब भी अपने छत पर लगे पौधों को पानी नहीं दे पाती है तो वो तड़प उठती है....जब उसके पौधों को पानी मिल जाता है तो मम्मी तृप्त हो जाती है और उसका मन शांत हो जाता है।मुझे कई बार लगता है कि मम्मी के लिए वो सिर्फ पौधे नहीं,बल्कि उनके औलाद के समान हैं।

शायद इसी बातों को ध्यान में रखकर बिहार सरकार ने जनजीवन हरियाली पर काम करना शुरू किया है....लेकिन इसमें केवल सरकार के करने से कुछ नहीं होगा,जबतक आम जनता की इसमें भागीदारी नहीं होती.....सबके कोशिश से ही हमारी धरती पर हरियाली रहेगी और हमें स्वच्छ हवा मिलेगी।
   
                                          अनुगुंजा



रविवार, 15 मई 2022

विशालतम परिवार

 


ये पूरा भारत देश ही है हमारा परिवार,

एक सौ चालीस करोड़ लोगों का संसार.....

न कोई जाति-धर्म के भेदभाव की दीवार,

भारत-माता के आंगन में खेले ये विशाल परिवार.....

मना रही दुनिया आज अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस, 

हिन्दुस्तान के कमल में खिलता भारतीयता का पारस....

जहां रहते चार बर्तन,वहां तो होती थोड़ी खटपट,

लेकिन हमारी एकता पर पड़ता न कोई असर....

नहीं होता कम हमारा प्यार और स्नेह अपने परिवार पर,

ईद पर होली की खुशबू से महकती धरती हर साल पर....

कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैला हिन्दुस्तानी परिवार,

हर घर पर लहरता तिरंगा करके देशभक्ति की हुंकार....

अनेकता में एकता की उपमा है हमारा भारत देश,

दीवाली संग रमजान की चमक में चमकता हर वेश....

सेवई की खीर में गुजिया की मिठास जुबां पर आती,

मिलकर रहना पूरी दुनिया को हमारी भारतीयता बताती.....

गर्व है हमें...जो है हमारा इतना बड़ा परिवार,

हर हिन्दुस्तानी लगाता " जय हिन्द " की पुकार.....

                                  अनुगुंजा

जन्मदिन मम्मी का

  अगर हो सकता तो, मैं तारें तोड़ लाती, तेरी पैरों की पायल में सजा डालती....  कदमों में "माँ" तेरी जन्नत बसती है मेरी, तेरी हर आहट ...