आज के समय में " मॉल " शहर के विकसित होने का मतलब है,ये हमें बताता है कि अब हमारा शहर भी तरक्की कर रहा है।जब भी मॉल में हम जाते हैं तो एकसाथ बहुत सारा सामान हमें दिख जाता है,हमें दूसरे दुकान भटकने की जरूरत नहीं होती है।अच्छा लगता है,जब भी हम मॉल जाते हैं।कभी-कभी तो हम ऐसे ही "टाइम पास" के इरादे से भी "मॉल" घूम आते हैं, इससे मूड एकदम फ्रेश हो जाता है।समय-समय पर मॉल में बहुत सारे "ऑफर या छूट" भी आते रहते हैं,इससे हम "एक पर एक फ्री" का लाभ भी उठा सकते हैं।
तो आज मैं और भाई गए " मॉल ".....और जरूरत का सामान खरीदा....हमें बहुत अच्छा लग रहा था,इसलिए कुछ फोटो मॉल के अंदर की ऊपर डाली है।
श्रद्धा,भक्ति और हिम्मत का दूसरा नाम है मेरी "मम्मी दीदी"....
नारी सशक्तिकरण पर बहुत बात होती है पर मेरी नजर में मेरी मम्मी दीदी(मौसी) सबसे सशक्त नारी है।वो शरीर से बहुत लाचार है पर उसका मन बहुत पॉजिटिव है,वो कभी अपनी बीमारी पर चर्चा नहीं करती,दुख नहीं मनाती.....बस प्यारी-सी मुस्कान लिए मुस्कुराती रहती है।मैं बिलकुल अपनी मम्मी दीदी जैसी ही हूँ....उससे मेरा "सौ में सौ" लक्षण मिलता है...मेरे दिल के बहुत करीब है मेरी मम्मी दीदी।आप तो जानते ही हैं कि मम्मी दीदी हमारे घर की " पंडित जी " है....पूजा-पाठ,नियम-धर्म सब उससे पूछ कर ही हम करते है।नाना जी बोलते थे कि तीन साल की उम्र से मम्मी दीदी पूजा करती है.....उसकी इसी अपार भक्ति के कारण हमारा परिवार धर्म को समझ पाया है...मम्मी दीदी कभी "बाहरी आडम्बर" को नहीं मानती है।आज भाई और मैं "मम्मी दीदी" से मिलने और आशीर्वाद लेने उसके घर गए,मम्मी दीदी "महापर्व छठ व्रत" पूरी श्रद्धा के साथ करती है।जब हम स्कूटी से उसके घर जा रहे थे तो पूरे रास्ते छठ पर्व की रौनक अपनी छटा बिखेर रही थी...कहीं छठी माता का गीत बज रहा था,तो कहीं नारियल-गागर नींबू-ईख-फल से सजी थी दुकानें.....सारा वातावरण भक्तिमय हो रहा था।जय छठी माता।
मामी ने भेजा छठ पर्व का प्रथम प्रसाद-----
आज "नहाय-खाय" है....जिसका वर्णन मैं कल के ब्लॉग में कर चुकी हूँ। आज के प्रसाद को " प्रथम प्रसाद " बोला जाता है,जिसका बहुत ज्यादा महत्व होता है।हर साल मेरी मामी हमें इस महापर्व का प्रथम प्रसाद भेजती हैं,जिसका स्वाद सच में पवित्र,पावन,भक्ति से स्वादिष्ट होता है,जिसका वर्णन करना मुश्किल है।प्रसाद में अरबा चावल-कद्दू चना का दाल-आलू, परवल, मिर्चा का पकौड़ा,भुजिया आदि रहता है....इस पर्व की महिमा ही है कि जब हम प्रथम प्रसाद खाते हैं तो ये हमारी अंतरात्मा तक को पवित्र कर शुद्ध देता है।प्रसाद खाने का नियम है कि इसे प्लेट में बिलकुल छोड़ा नहीं जाता है,बल्कि पूरा खाया जाता है।एक-एक अन्न के दाने का महत्व होता है।मेरी मामी भी पूरी नियम-निष्ठा से छठ व्रत करती हैं।इस साल से मेरा भाई भी महापर्व छठ करना शुरू किया है....वो भी पूरे नियम-निष्ठा और श्रद्धा के साथ ये व्रत कर रहा है।
आज की टैग लाइन रही " जय छठी माता "
आज के लिए बस इतना ही,कल फिर मिलते हैं....
------ अनुगुंजा
Jai chathi maa
जवाब देंहटाएंजय छठी माता
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