खरना को प्रणाम
अपार श्रद्धा,भक्ति,अराधना के साथ छठ पर्व का " खरना " आज शाम हुआ....सभी छठ व्रती, "छठी माता" के ध्यान में अपनी पूजा की।छठ गीत के साथ साथ " छठी मईया " की आरती भी हुई,सबने आरती ली और छठी मईया को प्रणाम किया...सबको महाप्रसाद मिला...सबने पूरे प्रेम और श्रद्धा के साथ प्रसाद ग्रहण किया।छठ पर्व की महिमा ही न्यारी होती है।सारा वातावरण " माता मय " हो जाता है....एक सुगंध पूरे माहौल में फैल जाती है...मन शांत होकर,आत्मा तृप्त होकर " छठी माता " की भक्ति में रम जाती है....यही होता है महापर्व छठ का प्रभाव। जय छठी माता ।
आज मैंने छठ पर्व पर एक कविता लिखी है-----
ऊपर के फोटो में ये "बच्ची" पूजा का सामान बेच रही थी,इसका बड़ा भाई बहुत तेज आवाज में इससे बोला " कहां थी अबतक? ,कब से हम बैठे हैं "......उस बच्ची और उसके भाई की उम्र में कम से कम पंद्रह से बीस साल का अंतर होगा,उसका भाई इतना परिपक्व होकर भी दुकान पर बैठ नहीं सकता है और वो अपनी छोटी सी बहन से ये उम्मीद करता है कि वो सब संभाल ले.......वाह !!!!!! इसे कहते है " बेटा-बेटी में फर्क करना "....
ऐसा क्यों होता है,कि हमेशा " बेटी पर ये विश्वास किया जाता है कि वो सब संभाल लेगी और बेटा से ये आशा किया जाता है कि वो कुछ अच्छा करेगा "
इस " विश्वास और आशा " की जंग में जीत हमेशा "आशा" की ही होती है...."विश्वास" बस सब झेलता रहता है।
आज सुबह चार बजे मामी और भाई ने एकसाथ सरगही की,मामी ने तो डाभ का पानी पिया और चाय ...और भाई ने ताल मिश्री-पानी पिया और चाय.....,कल सुबह चार बजे ये सरगही करेंगे।
मुझे नृत्य में जरा भी रूचि नहीं है पर मुझे घुंघरू की रूनझुन आवाज बहुत पसंद है।इसलिए मैंने ये घुंघरू वाला ब्रेसलेट लिया है......जिससे निकलने वाली घुंघरू की आवाज़ मुझे बहुत सुंदर लगती है.....
आज की टैग लाइन रही " खरना के महाप्रसाद को नमन "
आज के लिए बस इतना ही.....कल फिर मिलते हैं....
------- अनुगुंजा
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