"जीवन एक है तमाशा,लाख मुट्ठी बांध लो..कुछ न हाथ आता"
जब भी हम समझते हैं कि जीवन हमारी बंद मुट्ठी में कैद है,हम इसे जैसा चाहे,वैसा चला सकता है....तभी ऊपर वाला डायरेक्ट डोर खींच कर अपनी अहमियत जता देता है। मेरा भाई दिवाली के लिए लाइटें लेने, मेरे चौक पर के बिजली के दुकान पर गया(जहां से वो हमेशा लाइटें लेता है)..तो वहां किसी महिला को बैठा पाया,जब भाई ने दुकानदार वाले भईया के बारे में पूछा,तो उस महिला ने जवाब दिया कि " उनकी मौत कुछ महीने पहले कोरोना से हो गई है,मैं उनकी पत्नी हूँ "....ये सुनकर भाई अवाक रह गया....
कोई कुछ भी ऊपर लेकर नहीं जाता है, पर फिर भी इंसान कड़वे बोल, बेईमानी का इस्तेमाल करता रहता है....कल एक महिला दुकानदार से मेरी बहस हो गई,मैं उसके दुकान में " बंधन बार " लेने गई थी, पर वो बहुत बदतमीजी से बात की,तो मुझे भी गुस्सा आ गया। अरे !!!! आप दुकानदार है आपका काम है, हर सामान का दाम बताना, और मोलभाव तो होते ही रहते हैं। इसमें इतना गुस्सा होने की क्या बात है? कुछ दुकानदार अपने ग्राहकों से बहुत अच्छा बर्ताव करते हैं और कुछ खुन्नस निकालते हैं.....
आज दोपहर दो बजे से लेकर शाम चार बजे तक,मेरी और पापा की मार्केटिंग हरीसभा,अघोरिया बाजार,कल्याणी,मोतीझील तक होती रही...मम्मी का बार बार फोन आ रहा था,क्योंकि हमने दोपहर का खाना ही नहीं खाया था।असल में जाम को क्रॉस करते-करते हम ये भूल ही गए थे कि हमने खाना नहीं खाया है।मम्मी का गुस्सा तो सातवें आसमान पर था...खाना जो ठंडा हो रहा था। " ट्राफिक जाम " तो हद पार था....पूरा कल्याणी-मोतीझील ब्लॉक हो गया था,हम और पापा पैदल यात्रा करने को मजबूर थे,क्योंकि इस जाम में आप ई-रिक्शा या ऑटो पर नहीं चल सकते हैं।हालांकि ट्राफिक पुलिस थी पर वो लाचार और बेबस दिख रही थी...जैसे उसके बस की बात थी ही नहीं।इस जाम में स्कूटी से बाइक की टक्कर जैसी दुर्घटना भी खूब हो रही थी....लोगों का गुस्सा फट पड़ा था।
जाम का जंग कब मिटेगा शहर से----
मामी की बनाई स्वादिष्ट कढ़ी ------यकिन मानेंं...कढ़ी इतनी टेस्टी थी कि मैं क्या कहूं.....कल मैं मामी से पूछकर आपसे इसकी रेसिपी शेयर करूंगी।कहते हैं....
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