सुबह सुबह की " महालया " ने दस्तक दे दी कि माता रानी आ रही हैं....लेकर नवरात्र का पावन त्योहार। जय माता की ।
सुबह का सवेरा एक अजीब छटा बिखेर रहा था....आश्वीन महीने की शुरूआत से ही प्रकृति माता के रंग में रंग जाती है....वातावरण में धूप-गुगल की सुगंध फैल जाती है और सूर्य की किरण भी एहसास कराती है कि नवरात्रि शुरू होने वाला है।वैसे भी " महालया " के बाद तो मन माता की मिट्टी की मूरत में उनकी सम्पूर्ण छवि पा लेता है।हमारे बिहार में तो नवरात्रि बहुत धूमधाम के साथ मनाई जाती है...खासतौर से हमारे शहर में।साल भर हम सबको इस नौ दिनों का इंतजार रहता है...जब हर चौक,चौराहे पर माता की मूरत की स्थापना होती है,कलश स्थापन किया जाता है और चौबिसो घंटे लॉउडस्पीकर पर माता रानी भजन बजता रहता है।हर घर में शाम की आरती...धूप-गुगल की सुगंध संग धुआं....वातावरण को मनोरम बना देता है।ये नौ दिन कैसे बीत जाते हैं हमें पता भी नहीं चलता है।
हां...सुबह घर की साफ सफाई के बाद मैं अपने पापा के साथ गई अपने चौक पर नवरात्र का सामान लाने....अरे भाई !!!! कल से नवरात्रि शुरू है,कल कलश स्थापन है।कल माता की पहली पूजा है।तो घर के कामों से थकी जब मैं अपने चौक पर पहुंची....तो जो दृश्य देखा,उसने मेरी सारी थकन पल भर में मिटा दी और मुझमें एक नई-ताजी शक्ति का संचार कर दिया।मैं तो बस चारो तरफ नजर घूमा घूमाकर बस देखे जा रही थी...उस दृश्य ने मुझे अपनेआप में समा लिया था,मैं तो अपने चौक पर ही खो गई थी।आप हंस रहे होंगे कि भाई !!! अपने चौक पर कौन खोता है...इस खोने को हम गहरा ध्यान भी कह सकते हैं।चौक पर चारो तरफ माता की लाल-सुनहरी चमकती चूनड़ टंगी हुई थी...हवा से कभी उड़ती ,तो कभी धूप की किरणों से सितारे की तरह चमकती थी चूनड़। ऐसा लग रहा था कि माता के श्रृंगार का सारा सामान हर दुकान पर फैला है...कहीं चूड़िया लाल लाल,तो कहीं सुंदर रिबन...कहीं नेलपॉलिश तो कहीं आलता...कहीं सुंदर माला...तो कहीं हर प्रकार की धूपदानी और मनभावन दीपक अपनी सुंदरता से हमें मोहित कर रहे थे।सुंदर सुंदर कलश भी बिक रहे थे।इन सबके बीच हमारे चौक के शिव मंदिर में माता की मूर्ती बननी शुरू हो गई थी...मगर वो जगह तिरपाल से ढकी थी,लेकिन माता रानी की मूरत की सौंधी खुशबू सबकुछ कह रही थी।इसके साथ साथ फूल और फलो के दुकान भी सजकर खूब शोभा बढ़ा रहे थे।
मेरे पापा थक गए थे पर मेरे अंदर तो गजब की एनर्जी आ गई थी...मुझे न तो तेज धूप की तपिश जला रही थी और न टपकते पसिने की थकन मेरे कदम रोक रही थी।मैं हर दुकान में जा जाकर अपनी पसंद की माता की चूनड़ ले रही थी,धूपदानी,दीपक,गोटा,एकरंगा कपड़ा...सब ले रही थी।मन इतना खुश आज सुबह से पहली बार हुआ था.....मुझे ऐसा लग रहा था कि मेरे घर माता रानी आ रही हैं,तो उनका स्वागत मुझे सबसे अच्छा करना है।
आज मुझे यही एहसास हुआ कि वो " भाव " ही होता है,जो भक्त और भगवान को जोड़ता है.....
मेरी माता रानी से प्रार्थना है कि हम सबपर अपनी कृपा और आशीर्वाद बनाए रखें।आप सबको नवरात्रि की बहुत बहुत मंगलकामना। जय माता की ।
------ अनुगुंजा
कल फिर मिलते हैं....

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