मंगलवार, 5 अक्टूबर 2021

घर का हृदयस्थल रसोईघर

सुबह की शुरूआत सूर्यदेव की सुनहरी धूप के साथ हुई...पक्षी चहचहा रहे थे,हल्की मंद मंद हवा चल रही थी.....और मौसम बहुत सुहावना लग रहा था।नीला नीला आसमां और उसमें उड़ते पंक्षी मन मोह रहे थे...मन कह रह था " स्वागत करती सुबह वाली भोर,हर मन में नाचे मयूर चहूं ओर ".....

अब बारी आती है सुबह वाली प्रसिद्ध " चाय की चुस्की " की,जिसके बिना हर बिहारी का दिन अधूरा होता है...चाय के साथ पारले जी बिस्कीट हम सबका फेवरेट है,हां ये बात जरूर है कि जरा- सा ध्यान इधर-उधर जाता है और झट से बिस्कीट गल कर चाय में ही गिर जाता है....और हम मुँह ताकते रह जाते हैं या फिर चम्मच से उसे निकालते हैं।चाय से सारी थकन मिट जाती है पता नहीं इसमें क्या लॉजिक है पर ऐसा हमारे साथ तो जरूर होता है।कभी कभी दोपहर में भी हम चाय पर मेहरबान हो जाते है और एक कप पी ही लेते हैं।वैसे हमने भी सुना है कि ज्यादा चाय नहीं पीना चाहिए,इससे खाने की भूख मर जाती है।

आज आप सोच रहे होंगे कि हम चाय पर इतनी बात क्यों कर रहें हैं...तो भाई-बहन एक बात बताएं कि चाय हमारे घर में कहां बनती है? जवाब है " रसोईघर "....जो आज का हमारा बात करने का मुद्दा है।किसी के महत्व का एहसास हमें तब होता है जब उसकी या तो कमी होती है या उसपर कोई खतरा आता है।हम सब जानते हैं कि हमारा " हृदय " हमारे शरीर का सबसे नाजुक अंग होता है, ये कब धोखा दे जाए... कोई नहीं बता सकता है।देखते ही देखते इंसान की मौत हो जाती है जिसे कभी हार्ट अटैक कहा जाता है तो कभी कार्डियक अरेस्ट कहा जाता है।हमारे सुख-दुख का एहसास सबसे पहले हमारे दिल को होता है...शायद इसलिए ये कमजोर भी होता है और समय पड़ने पर बलवान भी बन जाता है।इन्हीं सब गुणों के कारण हमारे जीवन में हमारे हृदय यानि दिल का बहुत महत्व है....इसलिए हम प्यार से बोलते हैं कि ये दृश्य मेरे दिल को छू गया,मेरी मम्मी मेरे दिल में रहती है...या मेरा बिल्ला ' छोटू ' मेरा दिल है।

अभी तक मैंने ये नहीं जाना था कि हमारा घर ही क्या..हर घर का हृदयस्थल उसका " रसोईघर " होता है,जिससे हमारा पूरा घर चलता है।मेरे घर में आज पेंट कराने की बारी रसोईघर की थी,सो साफ-सफाई के साथ शुरू हो गया रसोईघर को खाली कराने वाला काम,ताकि पेंट अच्छे से हो सके।अगर दूसरी जुबान में बोले तो आज रसोईघर हमारा बंद था...यानि सम्पूर्ण          " लॉकडाउन " लग था....रसोईघर का सारा सामान इधर उधर घर में फैला था...सबकुछ तहस-नहस नजर आ रहा था। खाना तो बना नहीं सकते थे इसलिए हमलोगों ने बाहर से खाना आर्डर किया....वो कहते है न " होम डिलीवरी "...,खाने में हमने तवा रोटी और हांडी पनीर की सब्जी मंगवाई थी....भाई!!!!! हद तो तब हो गई जब दोपहर दो बजे का आर्डर तीन बजे तक नहीं आया,बार बार कॉल करना पड़ा उस रेस्टोरेंट में....हर बार बोला कि आपका आर्डर जा रहा है,फिर कहा कि जाम में फंस गया है....फिर उसके बाद डिलीवरी वाले लड़के को हमारे घर का पता बताते बताते मेरा तो हलक में जुबान अटक गया,अंत में शाम चार बजे हमें खाना मिला और हम सबने खाया। मैंने उस रेस्टोरेंट में कॉल करके खूब शिकायत की...मेरा गुस्सा ज्यादा इसलिए था क्योंकि मुझे जोर की भूख लगी थी...सुबह से केवल चाय बिस्कीट ही खाई थी...पेट में चूहे कूद रहे थे और ऊपर से ये देरी...रसोईघर की हालत ऐसी थी कि वहां कुछ भी बनाया नहीं जा सकता था...सो हम सब रेडिमेड नाश्ते पर ही सुबह से चल रहे थे।

एक दिन की रसोईघर की तालाबंदी ने हमें...खासकर मुझे समझा दिया कि सचमुच रसोईघर हमारे घर का हृदयस्थल होता है।इसके थम जाने से पूरा घर अस्त-व्यस्त हो जाता है...हम हर चीज के लिए मोहताज बन जाते हैं।रसोईघर में केवल खाना नहीं पकता है,बल्कि यहां घर को सुचारू रूप से चलाने वाली शक्ति का वास भी होता है...ये घर की व्यवस्था को बनाता है और हमें जीवनदायी ताकत देता है। मेरी बात से न सिर्फ हर गृहणी,बल्कि हर वो महिला-पुरूष सहमत होंगे जो रसोईघर में अपना समय व्यतीत करते हैं...कुछ अच्छा और कुछ नया बनाने का प्रयास करते हैं।

ये रसोईघर की महिमा ही है कि जब कोई नयी दुल्हन अपने ससुराल आती है तो " चौका छुआने " की रस्म की जाती है...बिहार में रसोईघर को चौका कहते हैं और जब नयी बहू पहली बार रसोईघर में कुछ मीठा बनाती है तो उसे चौका छुआना कहते हैं।छोटे बच्चे को अन्नप्राशन की रस्म कराई जाती है जिसमें चावल की खीर बच्चे को चांदी के चम्मच से खिलाई जाती है।परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु हो जाने पर भी कई दिनों तक भोजन में परहेज किया जाता है...मतलब केवल चावल-बिना हल्दी का दाल बनता है।जब घर में नया चूल्हा आता है तो उसको भी पूजा जाता है।

कहने का अर्थ है कि जीवन के हर पड़ाव पर रसोईघर महत्वपूर्ण बनकर " घर का हृदयस्थल " बना रहता है।

चलिए आज के लिए...बस इतना ही,कल फिर मिलते हैं....

------ अनुगुंजा




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