सोमवार, 4 अक्टूबर 2021

भूली बिसरी यादें

 हम अपने जीवन में इतने उलझे रहते हैं कि यादों के लिए जगह ही नहीं बचती...सुबह जल्दी उठना,जल्दी जल्दी नाश्ता बनाना है और सबको खिलाना है...फिर काम पर भी जाना है वहां की मल्टीटास्कींग जिम्मेदारी को जो निभाना है...ऑफिस में भी टांग खींचो प्रतियोगिता लगी रही है हर बार सावधान रहना पड़ता है और हमेशा खुद को किसी भी परिक्षा के लिए तैयार रखना पड़ता है....वरना नौकरी गई हाथ से....जिन्दगी के इस भागमभाग में " हम " कहीं नहीं रहते हैं,वहां तो हाड-मांस का एक योद्धा होता है जो बस लड़ता ही रहता है....

गृहणी जो कभी माँ,कभी बहन-बेटी के रूप में घर का सबसे प्रमुख हिस्सा " रसोई " देखती हैं...उनकी परेशानी भी कहीं से कामकाजी महिलाओं से कम नहीं होती,उन्हें तो साल के 365 दिन लगे रहना होता है वैसे काम में जिसमें न तो उन्हें कोई प्रमोशन मिलती है और न ही पगार....बस निॆभाते चलना है,की राह पर वो चलती रहती हैं।मैं जब भी अपनी मम्मी को देखती हूँ और उसके काम करने के जज्बे को सलाम करने का मन करता है....सभी माताओं को मेरा सलाम,वो हैं तो ही हम हैं।

हां...तो बात चली थी हमारी जिन्दगी की,हम कर्तव्य पथ पर चलते रहते हैं,चलते क्या है दौड़ते रहते हैं....मगर अचानक भूली बिसरी यादों की एक ठोकर लगती है और हम वहां रूक जाते हैं।आपके साथ भी जरूर ऐसा हुआ होगा...जब अचानक दादा जी का चश्मा मिल गया होगा या नानी की छड़ी..जिसे पकड़ कर वो चलती थी...या फिर कोई पुराना सा लेदर या टीन का बक्सा,जिसमें पुरानी फोटो,हमारे टूटे खिलौने,या हमारे मैट्रिक परिक्षा का एडमिट कार्ड मिला होगा......इन सब को छूकर,देखकर हमारी आँखों के सामने वो पुरानी फिल्म जरूर चलने लगती है जिसमें हम उस समय में लौट जाते हैं जब ये यादें घट रही होंगी।जीवन की भागदौड़ में जैसे यादों का एक ठहराव मिल जाता है,जो तपती धूप में शीतल छाया देता है और हम किसी थके राहगीर की भांति थोड़ा विश्राम कर लेते हैं।इस समय हमारे मन में जहां एक तरफ मासूम सा सुकून होता है वहीं उनको याद कर आँखों में आंसू भी आ जाते हैं।सुख-दुख का ऐसा संगम शायद ही हमें कभी मिलता है....मुस्कुराहट की मिठास संग आँखों की नमी का खारापन....यही देन होती है यादों की।

यादें हमें रूलाती क्यों हैं? इसका जवाब शायद यही हो सकता है कि यादें बीत चुकी हैं और दुबारा लौटकर कभी नहीं आएंगी....उन यादों में जो हमारे अपने थे वो भी गुजर चुके है और कभी दुबारा हमसे नहीं मिलेंगे....तो बस इसी अफसोस का दर्द आँखों से छलक पड़ता है।

आज मुझे मेरे नाना जी का पुराना माइक मिला,जिसमें उन्होंने कई बार रिकॉडिंग की थी....मेरे नाना जी बहुत प्रसिद्ध बांसुरी वादक थे...ऑल इंडिया रेडियो पर उनका प्रोग्राम होता था...तब तो मेरा जन्म भी नहीं हुआ था..मम्मी बताती है।वो माइक टूट चुका है पर आज भी ऐसा लगता है कि मेरे नाना जी उस माइक पर बांसुरी बजा रहे हैं।मैंने उस माइक को संभाल कर रख दिया है।

मुझे सबसे ज्यादा गुस्सा वैसे स्वार्थी लोगों पर आता है जो इन यादों को फेंक देते हैं या किसी को दे देते हैं...मतलब घर में जगह नहीं देते हैं।क्या लेकर इंसान आता है और क्या लेकर जाता है....कुछ भी नहीं,ये तो यादें ही होती है जो अमर होती हैं।मेरे पापा तो दादा जी का सारा सामान बहुत संभाल कर रखा है,उनके समय का बड़ा-सा एक रूपया वाला नोट भी संभाल रखा है...यादों को संभालने की आदत शायद मुझे मेरे पापा से मिली है।

चलिए आज के लिए बस इतना ही....यादों को संभाल कर रखे,वो अनमोल होती हैं।कल फिर मिलेंगे.....

------ अनुगुंजा

ये मेरे नाना जी की पेंटिंग है जिसे मैंने बनाया है....




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