आज महाअष्टमी है...तो आज मेरा व्रत है,मुझे पूजा-पाठ का कोई ज्ञान नहीं है मैं तो बस अपनी मम्मी दीदी( बड़ी मौसी) से पूछ पूछ कर सब करती हूँ।आज नाखून काटना है या नहीं...जैसी छोटी से छोटी बात मैं अपनी मम्मी दीदी से ही फोन पर पूछती हूँ....अगर मम्मी दीदी बाथरूम में रहती है तो मेरी बड़ी बहन पूजा दीदी,हमारे वार्तालाप के बीच का माध्यम बनती है और वो मम्मी दीदी से पूछकर मुझे फोन पर बता देती है।मम्मी अपनी बड़ी बहन यानि मेरी मम्मी दीदी को " पंडित जी " कहती है।पूजा-पाठ के मामले में मैं और मेरा भाई मम्मी की बात नहीं सुनते हैं..बस फोन घूमा देते हैं मम्मी दीदी को।सब विश्वास-विश्वास की बात है,मेरी मम्मी दीदी को बहुत जानकारी है पूजा-पाठ का।ये सब देखकर मम्मी कभी कभी गुस्सा जाती है और बोलती है " अरे!!! हमको भी पता है "....पर हम नहीं मानते।
तो बस आज मैं और मेरा भाई गए माता के दर्शन को गए और पुष्पांजलि भी की,हम दोनों का व्रत था।वहां मुझे मेरी प्रिय सहेली देबोश्री मैम और चैताली मैम( स्कूल में हम सब साथ में पढ़ाते थे) मिली...बहुत अच्छा लगा उन सबसे मिलकर,पुरानी यादें और बातें ताजा हो गई।वहां पंडाल में गर्मी और उमस बहुत थी पर हम सब धराधर फोटो( खासतौर से सेल्फी) लेना नहीं भूले।
वक्त हमेशा चलता रहता है,बीता हुआ कल कभी वापस नहीं आता है,बस यादें रह जाती हैं।ऐसे में जब हम अपने पुराने दोस्त से मिलते हैं तो मन कितना खुश हो जाता है...लगता है वक्त ठहर गया है।जीवन में एक नई ऊर्जा का संचार हो जाता है,किसी ने सही कहा है कि रिश्ते-नाते भगवान बनाता है पर दोस्त हम खुद बनाते हैं।बातें तो सबसे होती है लेकिन दोस्त कोई कोई ही बनता है।बहुत किस्मत से अच्छा दोस्त मिलता है,मैं इस मामले में बहुत लकी हूँ....अभी तक मेरी जिस से भी दोस्ती हुई,सब बहुत अच्छी रही।मेरी सबसे अच्छी दोस्त मेरी नानी थी,हम ' बेस्ट फ्रेंड ' थे,हैं और हमेशा रहेंगे।
महाअष्टमी और नौमी को सुहागन महिलाएं " खोइछा " भरती हैं...जिसमें लाल कपड़े या लाल चूनड़ में सुहाग की सब निशानी,सिंदूर-बिंदी,चना,बताशा,चावल आदि बांधकर माता रानी को चढ़ाती हैं।साथ में दीपक,अगरबत्ती,धूप भी माता को दिखाया जाता है।बहुत ज्यादा भीड़ लगी थी आज और कल भी रहेगी...मेरी मम्मी तो कल " खोइछा " भरेगी।आज जब मैं लौट रही थी तो मैंने अपने चौक पर महिलाओं की बहुत लम्बी लाइन देखी....सब खोइछा भरने आई थी।उनकी भक्ति को प्रणाम।
हमारे घर के दो कमरों के बीच एक दरवाजा है,जो हमेशा बंद ही रहता है।आज जब खिड़की-दरवाजे की पेंटिंग हो रही थी तो पेंटर ने बोला कि हमें बीच वाला दरवाजा खोलना होगा,तब ही पेंटिंग हो पाएगी।तो फिर हमने खोल दिया वो दरवाजा....काम शुरू हो गया,लेकिन दरवाजा के खुलते मैंने कुछ महसूस किया जो आपके साथ शेयर करती हूँ।रिश्तों में मामूली सी बात को लेकर हम बातचीत बंद कर देते हैं,अपने मन और भावना के हर खिड़की-दरवाजों को भी बंद कर देते हैं....जो बिलकुल बेमतलब का होता है।हमारी नाराजगी कब अहम,अहंकार,इगो में बदल जाता है इसका पता हमें भी नहीं चलता।हमारी बेवकूफी और पहले पहल न करने की जिद रिश्तों को तोड़ देती है।लेकिन इस सबके बीच अगर हम अपने मनमुटाव को छोड़ कर वो बीच का दरवाजा खोल देते हैं तो पलक झपकते सब बदल जाता है।बस जरूरत है कि हम उस बीच के दरवाजे को जल्दी खोले,नहीं तो अगर उसपर ताला पड़ गया तो कभी रिश्तों में पड़ी गांठ नहीं खुल पाती है।बीच का दरवाजा खुलने से हम बड़ी आसानी से एक कमरे से दूसरे कमरे में जा पा रहे थे,ये बदलाव अच्छा लग रहा था।हालाकि पेंटर ने वो दरवाजा फिर से बंद कर दिया,पर वो दरवाजा पाठ पढ़ा गया।
आज चुकी हमारा व्रत था तो मम्मी ने हमारे लिए सिंघाड़ा का आटा,पोस्ता दाना,आलू,सेंधा नमन,हरि मिर्च,धनिया को मिलाकर बहुत टेस्टी पकौड़ी बनाई।बहुत कुड़ कुड़ पकौड़ी थी जैसा की मेरे भाई को पसंद है।हमने सेव भी खाया और मखाना भी खाया....ताकि कमजोरी न हो।
तो आज सभी महाअष्टमी का व्रत करने वाले को प्रणाम करती हूँ...कल फिर मिलते हैं...
----- अनुगुंजा
वो बीच का दरवाजा----
हमारे चौक की माता की प्रतिमा....जय माँ
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