मंगलवार, 12 अक्टूबर 2021

पुरानी चिट्ठी

 हर दिन खास हो,ये जरूरी नहीं होता....कभी कभी मामूली दिन भी महत्वपूर्ण बन जाता है।आज के सुबह की शुरूआत माता रानी के भजन से हुई....यही तो सबसे खास बात होती है नवरात्रि की,सारा वातावरण माता मय हो जाता है।

जैसा कि मैंने अपने कल के ब्लॉग में बताया था कि मेरी मम्मी खाना कभी बर्बाद नहीं होने देती...तो आज मम्मी ने सुबह सुबह मेरे भाई के लिए नाश्ता बनाया,क्योंकि उसे सुबह ही सीतामढ़ी के लिए निकलना था।मेरे भाई को सिर्फ बाहर का खाना पसंद आता है जैसे-मिक्सचर,आलू भुजिया,कुछ-कुछ,डोसा,पिज्जा....घर का खाना खाने में हमेशा उसकी आनाकनी रहती है।यही कारण है कि मेरा भाई देखने में बहुत दुबला-पतला लगता है,ये बुरा परिणाम है फास्ट फूड खाने का।

लेकिन माँ तो माँ होती है,वो हमेशा अपने बच्चे को कुछ खिला देने का प्रयास करती रहती है।तो रोज सुबह मम्मी 6 बजे उठती है और लग जाती है भाई के लिए नाश्ता बनाने में...रोटी,दाल,आलू का कुड़ कुड़ भुजिया( बिना लहसून-प्याज का ),लाल मिर्चा का भरा अचार,पापड़...ये होता है भाई का नाश्ता।केसरॉल में रोटी बनाकर रखती है ताकि रोटी गर्म रहे...सही में माँ जैसा कोई नहीं हो सकता।लेकिन इतनी मेहनत के बाद मेरा भाई खाता है एक या आधी रोटी....मम्मी बहुत गुस्सा करती है पर वो नहीं मानता।तो आज भी मेरे भाई ने खाई सिर्फ एक रोटी....तो बाद में मेरी मम्मी ने बची हुई दो रोटी का मस्त इस्तेमाल किया....प्लेट पर दोनो रोटी फैलाई,उसमें आलू का भुजिया डाला और रोटी को गोल गोल घूमाकर वो रोल बनाया...जिसे हम सबने कभी न कभी जरूर खाया होगा।मुझे तो बहुत अच्छा लगता है रोटी का सबसे कॉमन रोल...जिसे बनाना सबको आता है।

नाश्ता करने के बाद मैंने सोचा कि अपने फेसबुक पेज के लिए कविता लिखना शुरू करती हूँ....लेकिन तभी टीवी पर नब्बे के दशक की सबसे सुपर हिट फिल्म शुरू हो गई....जिसमें आमिर खान और पूजा भट्ट है....पहचान करें कौन सी फिल्म है?...इस फिल्म के सभी गाने बहुत चले थे,अनुपम खेर की अदाकारी भी बेमिशाल थी।उम्मीद करती हूँ आप फिल्म का नाम पहचान गए होंगे...अगर हां,तो कमेंट में जरूर लिखे।

उस टाइम के फिल्मों की बात ही कुछ और होती थी...फिल्म के गाने हम आज भी गुनगुनाते हैं।अगर हम और पहले की फिल्मों की बात करें...जिसे हम गोल्डेन एरा कहते हैं..जो मन झूम उठता है....मुझे तो सारे ओल्ड गाने ही पसंद है,खासकर के सुरो की देवी लता मंगेशकर,मोहम्मद रफी,मुकेश,किशोर कुमार....इनके अनमोल गानों की तो मैं फैन हूँ।

तो अपनी फेवरेट फिल्म को देखने के बाद जब मैंने न्यूजपेपर पढ़ा( लोग सुबह पढ़ते हैं न्यूजपेपर,लेकिन मैं दोपहर को पढ़ती हूँ)....तो थोड़ा सोच में पड़ गई,आखिर देश का ये हाल क्यों है? तो मुझे लगा कि सत्ता,प्रशासन की कुर्सी पर बैठे लोगों के पैर कभी जमीन से जुड़े ही नहीं...वो जनता की तकलिफ को जान ही नहीं पाएं...1947 से लेकर आजतक यही हाल है।तो बस इसी सोच के आधार पर कार्टून बनाया है...जिसका फोटो ब्लॉग में डाल दूंगी,आप भी देख लें।साथ में एक छोटी सी कविता भी लिखी है....ये सब मैं अपने फेसबुक पेज के लिए करती हूँ,सोचा आज आपको दिखाती हूँ।

इंसान कुछ भी ज्यादा सहन नहीं कर पाता है,जब बारिश ज्यादा होती है तो धूप की चाह होती है और जब धूप तपाती है तो हम वर्षा चाहते हैं।आज धूप बहुत ज्यादा थी और घर में भी पेंटिंग का काम लगा हुआ है....सो आज शाम को निकली मार्केटिंग के लिए।नवरात्रि की पूजा के लिए कुछ सामान लेना था,साथ में कल महाअष्टमी है तो मेरा और मेरे भाई का व्रत है...इसलिए फलहारी का सामान भी लेना था।मैं तो फल,साबूदाना की खीर,मखाना खाती हूँ पुष्पांजलि के बाद....पर मेरा भाई लगभग पूरा दिन सिर्फ पानी-चाय पीकर ही रहता है...जब मम्मी बहुत डांटती है तो थोड़ा मखाना खा लेता है।

हां....शाम को जब मैं अपने चौक पर गई सामान खरीदने....तो माता रानी की भव्य प्रतिमा का दर्शन भी हो गया,चौक पर बहुत भीड़ थी...गाड़ी सब का जाम लग गया था,लेकिन इस सबके बावजूद सब भक्तों को माँ का दर्शन बहुत अच्छे से हो रहा था...यही तो कृपा है माँ की।माता के मनभावन चेहरे पर से नजर नहीं हट रही थी....बस मन कर रहा था कि देखते रहूं।सबसे अच्छी बात मुझे ये लगी कि माता के आशीर्वाद से बाजार में रौनक,चहल-पहल सब लौट आई,जो कोरोना के कारण कहीं गुम हो गई थी।मेरी माँ से यही प्रार्थना है कि अब वो सन्नाटा,खामोशी....और लॉकडाऊन न लौटे।बाजार भजन,भक्ति और भक्त से सजा था....लाल चूनड़ चमक रही थी।

हालाकि मुझे मेरी पसंद का एक मुँह वाला बड़ा दीपक नहीं मिला...मगर कोई बात नहीं,मम्मी ने बताया कि भाई पहले ही वैसा दीपक ले आया है।आज भाई को बोल दिया है सीतामढ़ी से लौटते समय पानी वाला नारियल ले ले...सप्तमी,अष्टमी और नौमी को चढ़ाया जाता है।शाम को मम्मी और हम भजन गाते हैं....भाई धूप,गुगुल,कपूर,गोईठा को धूपदानी में सुलगाकर उसके धुएं को हमारे घर के मंदिर में दिखाता है...फिर पूरे घर के हर कमरे में धूपदानी दिखाता है...तुलसी के पौधे को भी दिखाता है।

तो चलिए आज बहुत बात हो गई...कल फिर मिलते हैं,हां...मेरी कविता और स्केचिंग देखना न भूले।साथ में बहुत पुराना मिला खत भी है....जिसकी लिखाई भी मिट चुकी है पर आपको यादों के एहसास के जहान में ले जाने के लिए उसका फोटो डाली हूँ।मटमैले रंग का फटा पुराना कागज,जिसपर पड़ी सिलवटे भी उसे फाड़ देती है...लिखाई की स्याही धुंधली पड़ गई है पर एक एहसास जिन्दा है वो है " किसी अपने ने ही लिखा होगा "

----- अनुगुंजा







कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Please do not enter any spam link in the comment box.

जन्मदिन मम्मी का

  अगर हो सकता तो, मैं तारें तोड़ लाती, तेरी पैरों की पायल में सजा डालती....  कदमों में "माँ" तेरी जन्नत बसती है मेरी, तेरी हर आहट ...