हमारे घर में हुए नए नए पेंट में आज कुछ हलचल दिखी...घबराए नहीं,ये कोई भूकम्प की हरकत नहीं थी....बल्कि दो चींटी की शरारत थी।घर की रेलिंग पर दो नन्ही चींटी अपना भारी भरकम ( उसके हिसाब से ) खाना लेकर चलने की बड़ी तगड़ी कोशिश कर रही थी।कभी खाना गिरता,तो कभी दोनों टकरा जाती...पर हौसला न छोड़ा,चलते-गिरते-पड़ते अपने बिल तक पहुंच ही गई।ये सब देखकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा था...और तब मुझे लगा कि आखिर क्यों हर हिम्मत-हौसले की बात में चींटी का जिक्र आता है...हर कविता,लेख में ये नन्ही चींटी मौजूद रहती है।इनके लिए कोई भी लक्ष्मणरेखा खींच दो,ये पार कर ही जाती है...इनका हौसला,निडरता सदा हम इंसानों को प्रेणना देता रहेगा।
अब बात आज के दूसरे हौसले की....जो कामयाब न हो सका...लेकिन जिसे सुनकर आप जरूर हंसेंगे।मेरी मम्मी बहुत जुझारू है जो ठान लेती है उसे करके ही दम लेती है।मेरे मम्मी के दोनों घुटनों में ऑस्ट्रोअर्थराइटिस है..मुड़ता बिलकुल नहीं है। मेरी मम्मी एक सेकेंड के लिए भी बैठना नहीं चाहती है,हमेशा चलती रहती है काम करती रहती है....उसका ये जज्बा सलाम करने योग्य है।मैं हमेशा उसके पीछे भागती रहती हूँ,उसका सारा काम करने की पूरी कोशिश भी करती हूँ...और बैठने के लिए बोलती रहती हूँ,पर वो नहीं मानती और मुझे ही डांट देती है।खैर मम्मी की डांट में भी प्यार ही होता है।
हां....यहां तो मैंने अपनी मम्मी के नेचर के बारे में बता दिया,अब बताती हूँ आज की बात......मेरी मम्मी हर बची हुई चीज का पूरी तरह से इस्तेमाल करने की बहुत कोशिश करती है,कोई सामान फेंकना उसकी नियत में ही नहीं है...इसलिए हमारे घर में पुराना कबाड़ कुछ ज्यादा ही इकठ्ठा हो जाता है।खाली बोतल से लेकर प्लास्टिक का बैग तक वो जमा करती है,अगर हम फेंक देते हैं तो घर में तीसरा विश्व युद्ध हो जाता है।तो हमारी मम्मी ने बाजार से डब्बे में पैक वाला गुलाब जामुन मंगवाया...जिसे हम सबने बड़ी चाव से चट कर दिया,अब बारी आई उसके रस (चाशनी) की।फिर मम्मी ने सोचा कि क्यों न उस चाशनी में मैदा सानकर ठकुआ बनाया जाए....बड़ी मेहनत के साथ मम्मी ने बनाया पर वो ठकुआ,....लेकिन वो ठकुआ की जगह गुलगुला जैसा मुलायम बन गया।पर मेरी मम्मी निराश नहीं हुई...उसे खुद खाया और मुझे भी खिलाया.....पर उसके स्वाद पर मुझसे कोई विशेष टिप्पणी नहीं ली।शायद वो जानती थी कि मैं क्या बोलूंगी।फिर उसके बाद कई बार उस चाशनी में ट्राई हुआ ठकुआ बनाना पर असफल रहा।जब चाशनी खत्म हो गई...तो मम्मी ने मामी से भी सलाह मशवरा लिया,और बात आ गई चीनी को गर्म कर मैदा में मिलाकर बनाने की।
आज सुबह जहां मैं पनीर की सब्जी बनाने की तैयारी कर रही थी...वहीं रसोईघर से खटपट की आवाज आई,मैं दौड़कर गई तो देखा मम्मी " मिशन ठकुआ 5( पांच बार ट्राई कर चुकी थी) " में लगी हुई थी।मैं कुछ बोलने से पहले हंस पड़ी....और हंसते हुए बोली " जा !!!! मम्मी फिर से ठकुआ बना रही हो ".... ये सुनते ही मम्मी पूरे आत्मविश्वास के साथ बोली आज सही बनेगा।लेकिन काफी समय बाद मम्मी पसीने से तड़बतड़ होकर रसोईघर से बाहर आई और टूटा हुआ ठकुआ मेरे मुँह में खिलाते हुए बोली " आज मोइन(घी) ज्यादा पड़ गया था इसलिए ठकुआ टूट गया "....मैंने मम्मी को गले से लगा लिया,उसके गालों को खूब प्यार से खींचा और बोला कि " ये ठकुआ नहीं,तुम्हारा हौसला है "।
कभी कभी हमें अपने माता-पिता के हौसले को बनाए रखने के लिए उन्हें उनकी मनमर्जी का काम करने देना चाहिए....इससे उनके अंदर कुछ करने की जिद आती है और यही जिद उन्हें बीमारी से लड़ने की ताकत भी देती है।
मेरी मम्मी का ठकुआ वाला हौसला जो सफल नहीं हुआ...पर मेरी बनाई पनीर की सब्जी अच्छी बन गई।मेरा भाई चुनाव ड्यूटी के बाद घर आया था...सो सोचा कुछ अच्छा खाना बनाते हैं,चुकी नवरात्रि चल रही है इसलिए शाकाहारी खाना ही बनाना था...इसलिए पनीर की सब्जी बनाई।सबको पसंद आई।जीरा-सरसो-सूखा लाल मिर्च,तेजपत्ता का फोड़न तेल में डाला,फिर लहसून-अदरक-जीरा-मरीच-प्याज-टमाटर को मिक्सी में पिसकर पेस्ट बनाकर डाला....उसके बाद हल्दी,धनिया पाऊडर,लाल मिर्च पाऊडर,गर्म मसाला पाऊडर,नमक....डालकर पंद्रह मिनट तक भूना,फिर पानी डाला और अंत में कटा पनीर डाला...बस बन गई पनीर की सब्जी।
तो आज के लिए....बस इतना ही,कल फिर मिलते हैं...
------ अनुगुंजा
मम्मी का ठकुआ बनाने का प्रथम चरण----
मेरी बनाई पनीर की सब्जी----
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