आज सुबह से ही पता नहीं क्यों नानी की बहुत याद आ रही थी।जुबान पर बार बार नानी के हाथों की बनी सरसो वाली आलू- टमाटर की सब्जी का स्वाद आ रहा था।आप जानते हैं मेरी नानी दस से पंद्रह मिनट में सब्जी बना लेती थी,तेल में दो सूखी लाल मिर्च,तेजपत्ता, फिर जीरा का फोड़न डाला....उसके पहले ही सिलबट्टा पर सरसो,जीरा,मरीच,लहसून,धनिया,हल्दी को पीस लेती थी..फोड़न डालने के तुरंत बाद प्याज डालती थी टमाटर तो वो सीधे डाल देती थी बाद में छोलनी से कड़ाई में ही टमाटर के टुकड़े कर लेती थी...फिर पीसा मसाला डालती और आलू डालकर...थोड़ा सा चला लेती थी,फिर पानी डालकर ढक देती थी...और हो जाती थी नानी की स्वादिष्ट सब्जी तैयार।न देर तक भूनना,न प्लेट में रखकर चाकू से कटिंग....सब ताबड़तोर करती थी।
गजब का स्वाद होता था नानी के हाथों में....ये भी बात है कि आज से दस साल पहले की सब्जी का स्वाद और आज के बनावटी स्वाद में बहुत अंतर है।पहले जब एक टमाटर सब्जी में पड़ता,तो एक अलग स्वाद आता था...जो आज गायब है।फूल गोभी का भी वही हाल है...कोई टेस्ट ही नहीं है एकदम बेस्वाद।ये सब खेतों में हद से ज्यादा कीटनाशक,आर्टिफिशियल खाद डालने के कारण हो रहा है।किसान ज्यादा पैदावार के चक्कर में जहर पड़ोस रहे हैं थाली में।
तो आज मैंने तय किया कि मैं आज नानी के जैसी आलू-टमाटर की सरसो वाली सब्जी बनाने की पूरी कोशिश करूंगी....इस काम में मेरी मम्मी ने बहुत मदद की...जब मैं कोई तरकीब नानी की भूल जाती,तो मम्मी याद दिला देती थी।आज हमारे रसोईघर में तीन पीढ़ी कहीं न कहीं एक साथ थी....नानी इस दुनिया में नहीं है पर हर पल हमारे एहसासों में मौजूद है।सब्जी में नानी वाली बात तो नहीं आई...पर सबको सब्जी अच्छी लगी।
कभी कभी एक खाना हमें यादों के गलियारे में ले जाता है,और हम खो जाते हैं।
खाना बनाते बनाते...अचानक मैंने देखा कि एक काली तितली उड़ती हुई हमारे रसोईघर में आ गई है।हमारी खिड़की पर जाली लगा हुआ है...पर इसके बावजूद वो तितली लगातार बाहर निकलने की कोशिश करती रही।उसकी लगातार कोशिश का ये नतिजा हुआ कि वो हमारे रसोईघर के दरवाजे से बड़ी शान के साथ बाहर निकल गई।
थी तो ये एक सामान्य कही जाने वाली बात...पर इसने मेरे मन में कुछ अभिव्यक्ति को व्यक्त किया,आप भी महसूस करें और बताएं कि मैंने सही सोचा या नहीं.....
मैंने सोचा कि आज भी हमारे देश की औरतें रसोईघर के जाले से बाहर नहीं निकल पाई हैं....कुछ औरते प्रयास बहुत करती हैं पर जाले में कहीं न कहीं फंस कर रह जाती हैं।उनकी पंखों की फड़फड़ाहट को परिवार-समाज कभी समझ नहीं पाता है।उनकी उड़ान गैस पर जलती सब्जी से निकले धुएं में लुप्त हो जाती है।लेकिन जो नारी ठान लेती है कि उसे बाहर निकलना है...अपनी पहचान बनानी है एक औरत के रूप में,वो लगातार प्रयास करती रहती है भले ही उसके कुछ पंख ही क्यों न टूट जाए...लेकिन अंत में उसे दरवाजा मिलता है और वो शान के साथ गुलामी से मुक्त होकर आजाद होती है।एक तितली ने सोच की किताब ही रच डाली।
मैं रोज कई महिलाओं से मिलती हूँ....जैसे मेरी काम वाली बाई,सब्जी बेचने वाली,कूड़ा-कचरा फेंकने वाली...लेकिन एक बात सबमें मुझे एकसमान दिखती है वो हैं उनकी आँखें।सबकी आँखों में कहीं न कहीं कुछ छूट जाने की पीड़ा दिखती है,किसी को शिक्षा नहीं मिली,किसी की प्रतिभा छूट गई...किसी का लगातार अपने पति-बेटे से मार खाने के कारण उसका आत्मसम्मान ही छूट गया।खैर ये मेरी सोच है।
अभी जब मैं ब्लॉग लिख रही हूँ तो मेरे चौक पर माता रानी का भजन बज रहा है....
चलिए फिर कल मिलते हैं....
------ अनुगुंजा
हां...अपनी बनाई सब्जी का फोटो आपको दिखाती हूँ,साथ में उस नन्ही तितली का भी....
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