शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2021

जीव रक्षा परम धर्म

 मैं आजादी में यकिन रखती हूँ,लेकिन मेरे घर में एक तोता है जिसे मेरी नानी ने करीब तीस साल पहले तोता पाला था,अब वो उड़ना भी भूल गया है इसलिए उसे छोड़ नहीं सकते है।उस तोते को हम सब " टूटी " कहते हैं और वो भी हम सबको देखकर " टूटी " ही बोलता है...हमारे घर में एक अपाहिज बिल्ला " छोटू " भी है...मगर तोता और बिल्ला में गजब का प्यार संग भरोसा है,न तो टूटी,छोटू से डरता है और न ही कभी छोटू,टूटी पर अटैक करता है....गजब की समझदारी है दोनों में। इन दोनों को देखकर मैं यही सोचती हूँ कि दोनों की प्रजाति एक दूसरे के साथ शत्रुता की है...फिर ये कैसा अनबोला रिश्ता,जिसमें इतना भरोसा है।काश: इंसान भी इन जीवों से कुछ सबक ले पाता,तो दुनिया आज कुछ और ही होती।

हमारे घर में पेंटिंग का काम चल रहा है,तो दीवारों को घसना,पुट्टी लगाना...ये सब होता रहता है....टूटी का पिंजड़ा हमारे ड्राइंग रूम के पास बरामदे की छत से लटका रहता है..जमीन से काफी दूरी रहती है,मैं तो टेबल पर चढ़कर टूटी का पिजड़ा उतारती हूँ।हमारा सिर्फ चना खाता है,कभी कभी टेस्ट बदलने के लिए सेव खा लेता है।रोटी भी उसे पसंद है।बहुत ज्यादा भावुक है टूटी...और अपना-पराया बहुत पहचानता है,कोई अनजान व्यक्ति को देखते ही फड़फड़ाने लगता है,हम तो रात में भी टार्च जलाकर उसको पानी देते है बस इतना बोल देते हैं " टूटी हम है " और वो पहचान जाता है।टूटी का फेवरेट होता है अपना एक पंजा ऊपर उठाकर " टूक टूक " बोलना,साथ में गोल गोल गर्दन घूमाकर नाचना भी।बहुत प्यारा है हमारा टूटी,पूरे घर की जान तो " छोटू और टूटी " ही हैं...मेरा भाई रोज उन दोनों को पूजा के बाद प्रसाद देते है,छोटू तो शाम की आरती भी लेता है।

कौन कहता है कि बिल्ली मनहूस होती है और तोता कभी सगा नहीं होता...सब झूठ है,एकदम बकवास।ये सब अंधविश्वास है जो इंसान के दिमाग को बीमार कर देते हैं।मेरे विचार में ये  पक्षी- जानवर सबसे बड़े दोस्त होते हैं,जो रिश्ता निभाना जानते हैं।

तो आज जैसे ही पेंटर ने मुझसे कहा कि अभी बरामदे की दीवार-छत का घसना और पुट्टी लगाने का काम शुरू होगा....मैंने तुरंत टूटी का पिजड़ा उतारा और रसोईघर के पास  ले गई...वहां मैं पूरे तीन घंटे तक टूटी के साथ रही,पहले तो खड़ी रही फिर कुर्सी डालकर बैठ गई।बीच बीच में मैं टूटी से बातें भी करती रही,ताकि वो दीवार घसने की आवाज से डरे नहीं।जब बरामदे का काम हो गया,तो मैंने टूटी का पिजड़ा टांगा और शाम के चार बजे खाने को गई।

ये बात बहुत मामूली है पर मेरा इरादा आप सबको ये बताना है कि " जीव रक्षा परम धर्म " है....हम क्या मंत्र जानते है,कितना देर तक ध्यान लगा सकते हैं,कितनी देर तक पूजा कर सकते है,......ये सब बातें तब बेमानी हो जाती है जब हम किसी पक्षी,जानवर के जीवन की रक्षा नहीं कर पाते हैं।ईश्वर की सबसे महान रचना इंसान है,मगर तब ही,जब वो अपना धर्म-कर्म निभाए...और किसी जीव की रक्षा से बड़ा धर्म हो ही नहीं सकता।

मेरी मम्मी हमेशा मुझे एक नई सोच देती है...आज इतने कामों के बीच मेरी मम्मी जोर जोर से " अनु-अनु " पुकार रही थी,मैं दौड़कर गई,सोचा कुछ बहुत जरूरी बात होगी....लेकिन जब मम्मी के पास गई,तो उसने अपनी अंगुली से दिखाने वाला इशारा किया,मैंने नजर झुकाई..तो मम्मी ने कहा कि " देखो !!!! कला हर जगह होती है...हमारी गली में चूना,पुट्टी और पानी के कारण कुछ चित्र बने हैं ".....मैंने देखा तो मुझे ये एबस्ट्रेक्ट आर्ट लगे। किसी ने सही कहा है कि देखने वाली की नजर होती है....जो कलाकार है उसे दीवार पर उखड़े चूने में भी आकृति नजर आएगी,आसमां का बादल भी भोले बाबा का दर्शन कराएगा....जिसकी जैसी सोच,उसे ये दुनिया वैसी ही नजर आएगी।कोई इंसान बुरा नहीं होता है,बल्कि उसकी सोच बुरी होती है।

दिनभर की बातों को चुन चुनकर मैं आपके सामने लाती हूँ....कुछ सबक जीवन को मिलता है और कुछ एहसास मन को होता है।जब मैंने देखा कि पेंटर वाले कितनी खुशी के साथ अपना काम करते हैं...और अपनी भविष्य की योजना के बारे में भी सोचते हैं,तो मुझे लगा कि जब तक हम अपने काम को enjoy नहीं करते,तबतक उसमें अपना best नहीं दे पाते हैं।एक पेंटर पेंटिंग करते हुए अपने साथी से बोल रहा था कि मुझे फास्ट फूड बनाना आता है,कोई काम हो तो बताना।मतलब जो मजदूर वर्ग के लोग होते हैं वो कितने समर्पित होते हैं अपने काम के प्रति।मैंने सबक ले लिया।

आज इतनी बड़ी बड़ी बातों में आज के खाने का वर्णन करना तो भूल ही गई....मेरी मम्मी सादा पराठा भी बहुत मस्त बनाती है,बहुत टेस्टी होता है।मैं अपने पराठे खाने के ढंग के बारे में आपको बताऊंगी,तो आप हंसेंगे....मैं पराठे की तह तह को अलग कर देती हूँ इससे पराठे की परत बहुत पतली हो जाती है एकदम कागज जैसी...फिर एक एक परत खाती हूँ।इससे मुझे बहुत मजा आता है पराठा खाने में।आप जरूर बताना कि आप कैसे खाते हो पराठे??? सभ्य बनकर या मेरे जैसा असभ्य बनकर खाते हो....

तो आज बस इतना ही....कल फिर मिलते हैं...

------ अनुगुंजा

मेरी मम्मी ने जमीन पर बने इसी चित्र को दिखाया था,जिसका चित्रकार हमारी सोच है....आप देखे और बताएं कि आपको क्या दिखा?





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