सोमवार, 27 फ़रवरी 2023

जिंदगी इनकी भी

 

भूख लगती है इन्हें भी,

गला सूखता है इनका भी....

केवल लोगों के पत्थर खाने को ये नहीं बने,

क्रोध उतारने के लिए ईश्वर ने इन्हें नहीं चुने.....

हक इनको भी है जीवन जीने का,

खुश होकर इंसानों के प्यार को पाने का....

फिर क्यों इन्हें मनुष्य तड़पाते,

जानबूझकर मरने को छोड़ जाते....

क्या कसूर है इनका, इन्हें भी मालूम नहीं,

किस गुनाह पर मिलती सजा,ये अबतक जाने नहीं.....

मासूम आँखे बस निहारे अपने मददगार को,

अनबोलते जीव मांगे सहारा इंसानियत भरे प्यार को.....


जब भी हम सड़कों पर निकलते हैं तो न जाने कितने अनेकों बेजुबान जीव (गाय,कुत्ते,बिल्ली आदि) मिलते होंगे हमें, पर हम उनकी तरफ देखते भी नहीं होंगे,क्योंकि हम अपने कामों में व्यस्त रहे होंगे।

अब दो मिनट यहीं रूकते हैं और एक बार उनकी जगह अपने को रखकर सोचते हैं, जहां हम कई दिनों से भूखे-प्यासे हो,और एक उम्मीद में सबकी तरफ देख रहे हो कि कोई मेरी मदद करेगा पर हर कोई आगे बढ़ जाता है....कैसा महसूस होगा हमें? कितनी निराशा मिलेगी,कितना दुख होगा।

बस यही महसूस करना आज का इंसान लगभग भूल चुका है और स्वार्थ की चादर को रोज खींचकर बढ़ाता जा रहा है। हम ही हम में वो पूरी तरह डूब चुका है। यही कलयुग का सबसे बड़ा श्राप है।

आज लोग अगर जानवरों के प्रति प्यार दिखाना चाहते हैं तो महंगा कुत्ता खरीद लेते हैं और खुद को इंसानियत का मसीह समझ लेते हैं पर वो ये भूल जाते हैं कि दिखावा और असलियत में फर्क होता है। अगर नियत साफ है तो सड़क पर भटकने वाले कुत्तों को भी पाला जा सकता है,उसे अपने घर और दिल में जगह दी जा सकती है पर ऐसा होता नहीं।

अगर कोई आवारा कहा जाने वाला कुत्ता किसी को काटता है या भयानक हमला करता है,तो सब कहते हैं कि उस कुत्ते को मार दो....मेरा बस इतना कहना है कि उस बेचारे को पागल किसने बनाया? किसने उसे इतना खुंखार बनाया? उसके साथ ऐसा क्या हुआ,जो कोई न्यूज चैनल न दिखा सका?

इस सबका एक ही जवाब है वो है........

" इंसान और उसकी क्रूरता "

हर जीव में बर्दाश्त करने की एक सीमा होती है जिसके पार इंसान हो या जानवर अपना आपा खो ही देता है। एक चींटी भी बचाव में काटती है.......

लेकिन ये अनबोलते जीव अपना पक्ष रख नहीं सकते,इसलिए मानव की सभा में ये अपराधी सिद्ध हो जाते हैं।जिसको जो मन में आता है वो अपना क्रोध व्यक्त करता है और ये बेजुबान सोशल नेटवर्किंग साइट पर आकर अपना दर्द नहीं बता पाते,बस मूक बने रहते हैं।

अनुगुंजा


रविवार, 26 फ़रवरी 2023

चाह जन्मदाता की

माँ-बाप हमारे जीवन की न सिर्फ बुनियाद होते हैं बल्कि ये ही हमारे जीवन की सच्ची खुशी होते हैं,क्योंकि इनके जीवन का सार हम ही होते हैं।

इससे प्यारी मुस्कुराहट मैंने न देखी,

ऐसी निर्मल मासूमियत कहीं न पाई....

मम्मी-पापा जब बन जाते हमारे दोस्त,

तब कहीं बाहर घूमने की चाह हमें न भाए....

घर ही बन जाता आनंद की पाठशाला,

क्योंकि यहीं गुरु संग दोस्त हमें मिल जाए....

माँ-बाप होते सच्चे मित्र किताबों जैसे,

इनके हर पन्नों से हमें जीवन-दर्शन सिखाए.....

हर कठिन डगर पर उम्मीद के फूल खिलते

जब साथ हो हमारे जन्मदाता की दुआए.....

बहुत किस्मत से मिलता माता-पिता का आशीर्वाद,

इनकी प्रार्थनाओं ने ही हमें कर्म करने योग्य बनाए.....

सम्मान संग प्रेम देते रहें हम अपने माँ-बाप को,

चारों धाम संग पावन गंगा का मिले पुण्य यहीं मिल जाए।


वर्तमान समय बहुत व्यस्त समय है,यहां सबकुछ देने के लिए है, बस देने के लिए समय ही नहीं है अपने माता-पिता को....यही सबसे बड़ी समस्या है क्योंकि हमारे मम्मी-पापा को हमसे हमारे थोड़े से समय के अलावा हमसे कुछ नहीं चाहिए। माँ-पापा के साथ बैठकर एक कप चाय पीना,हमारे लिए बहुत मामूली बात हो सकती है पर उनके लिए ये अनमोल पल होता है,हर चाय की एक चुस्की के साथ वो अनेको जीवन जी लेते हैं या ये कहें सारी खुशीयाँ समेट लेते हैं।

किसी Mother's day या father's day का इंतजार मत करो,बल्कि हर दिन थोड़ा सा समय अपने जन्मदाता को दे दो...यही उनका सबसे बड़ा गिफ्ट होगा।

समय के महत्व के आगे माँ-बाप के महत्व को कम न पड़ने दो..... पैसा,सहूलियत, सुख-सुविधा,ऐशो आराम....ये सब हल्का तब हो जाता है जब हमारे माता-पिता अपने घर की खिड़की या बालकोनी या छत से आसमान को निहारते हैं या सड़क पर चलने वाली गतिविधि को चुपचाप बस देखते हैं या टीवी या किसी पार्क को अपने मन को बहलाने का जरिया या साधन बना लेते हैं। 

कोई भी पार्क, टीवी....औलाद की कमी पूरी नहीं कर सकता,ये तो बस उनका वक्त के साथ किया गया एक समझौता होता है....जिसे नाम दिया जाता है " बदलाव " का

अनुगुंजा



 

जन्मदिन मम्मी का

  अगर हो सकता तो, मैं तारें तोड़ लाती, तेरी पैरों की पायल में सजा डालती....  कदमों में "माँ" तेरी जन्नत बसती है मेरी, तेरी हर आहट ...