गुरुवार, 12 जनवरी 2023

बूढ़ी माँ

 

अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में सहारा ढूंढती माँ,

क्या कहूं अपने बच्चों को कितना याद करती माँ.....

जब डगमगाते कदम मांगे छड़ी का साथ,

वहां क्यों न, औलाद बढ़ाती अपना हाथ....


आज हमारे देश, समाज में वृद्धावस्था में अपनी संतान का माता-पिता को अकेले छोड़ देना या उन्हें एक उदासीन, दुखी जीवन जीने पर विवश करना बढ़ता जा रहा है। लगभग हर न्यूज चैनलों ,समाचारपत्रों में इस प्रकार की खबर पढ़ने या देखने को हमें मिल जाती है....जहां कांपती झुर्रियो वाले चेहरों से ठहर-ठहर कर बहते आंसू अपनी दर्दनाक कहानी सुना देते हैं। कलयुग का ऐसा भयानक रूप मन को ये सोचने पर मजबूर करता है कि एक औलाद अपने बूढ़े माँ-बाप के साथ ऐसा कैसे कर सकती है। कहीं पिता को कमरे में बंद करना,तो कहीं माँ को बिस्तर पर मरने के लिए छोड़ देना....ये तो चंद उदाहरण है,असल में वास्तविकता और डरावनी है।

जब हम किसी वृद्धा-आश्रम में जाते हैं तो वहां अपनी सेकेंड इनिंग(अंतिम चरण) का आनंद लेते कई वृद्ध जन मिल जाएंगे....जो मुस्कुराते हुए अपनी मित्र मंडली में अंताक्षरी खेलते,कैरम-शतरंज खेलते दिखेंगे, पर जब आप उनसे उनसे थोड़ी देर बात करेंगे तो उस मुस्कुराहट के पीछे छुपा दर्द आपको दिख जाएगा। वो दर्द जो आज भी आश्रम के गेट के बाहर इस उम्मीद से झांकता है कि कहीं उनकी संतान उन्हें लेने तो नहीं आ गई है। 

जब से संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार ने जगह लिया है तब से लोग    " परिवार " का मतलब पति- पत्नी और बच्चे तक ही सीमित होकर रह गया है,इसमें से दादा-दादी का स्थान नगण्य हो गया है। आज की औलाद को उनके जीवन में अपने माता-पिता का दखल,रोकटोक पसंद नहीं है,उन्हें अपने तरीके से अपनी जिंदगी जीना है। माँ-बाप को अपने सिर पर छत को बचाए रखने के लिए अपनी औलाद के हिसाब से ढलना पड़ रहा है,जैसा वो चाहते हैं वैसा करना पड़ रहा है। ये सब इसलिए ताकि उनका बुढ़ापा सड़कों पर भटकने का मोहताज न बन जाए।

जब हम छोटे होते हैं और हमें ठेस लगती है या हम गिर जाते हैं,तो फौरन हमारी माँ हमें उठाती है और अपनी ममतामयी गोद में बैठाकर बहुत सारा प्यार संग हौसला देती है पर जब उसी माँ को बुढ़ापे में चोट लगती है तो वहां उसे सहारा देकर प्यार करने वाला कोई नहीं होता।

ऐसा नहीं है कि हमारे देश की हर औलाद ऐसी निर्दयी है....अभी भी कुछ संतान अपने माँ-बाप को ईश्वर की तरह पूजती है....लेकिन ऐसे संतानों की संख्या घास में सूई खोजने जैसा है।

अनुगुंजा

 



रविवार, 8 जनवरी 2023

हे !!!! भगवान

 


ठंड हो या गर्मी या हो बरसात....इसका प्रतिकूल प्रभाव हर जीव पर पड़ता है,फिर चाहे वो इंसान हो या जानवर।
लेकिन इंसान इतना स्वार्थी है कि उसे बस अपनी तकलीफ दिखती है,अन्य जीव उसे बेजान लगते हैं जैसे उसपर कोई असर ही नहीं पड़ता है।
सड़कों पर भटकने वाले कुत्ते, गाय और उनके बच्चे ठंड से कांपते रहते हैं,उनका पूरा शरीर थरथराता रहता है...आँखों से अपनी बेबसी के आंसू निकलते रहते हैं पर ये सब सड़क पर मौज-मस्ती करने वालों को कहां दिखती है,बल्कि इंसान कहे जाने वाले ये दानव, इस ठंड में उन बेजुबानों पर पानी फेंकते हैं,पत्थर मारते हैं,मानों वो जीव निर्जीव हो।ऐसे हैवानों में दया तो दूर की बात रही,इन्हें अपनी करतूत पर शर्म भी नहीं आती है।
ये तो बात हो गई बेजुबानों को तड़पाने वाले दानवों की। अब इसके बाद कुछ ऐसे महामानव भी हैं जो अपने कामों में इतने व्यस्त हैं कि उन्हें कोई फर्क ही पड़ता कि कौन जानवर ठंड या भूख से मर रहा है। ये महामानव अपनी भागदौड़ वाली जिंदगी में उलझे रहते है,इनके लिए खुद की उपलब्धि, खुद ही सफलता ही मायने रखती है। इनका घर कैसे चलेगा,इनकी थाली में रोटी कैसे आएगी....बस यही इनका दायरा है।ये मानव कभी पलट कर भी नहीं देखते कि कहीं कोई कुत्ता इनकी तरफ उम्मीद भरी नजर से देख रहा है या नहीं।
लेकिन इस स्वार्थ भरे कलयुग में कुछ ऐसे इंसान भी होते हैं जो खुद सड़क पर भीख मांगते हैं या जूता पॉलिश करते हैं पर सड़क पर के इन बेजुबानों की परवाह करते हैं,उन्हें प्यार देते हैं और अपनी एक रोटी का एक टुकड़ा उनको खिलाते हैं। ये खुद सड़क किनारे सोते हैं पर अपनी फटी चादर का एक कोना इन बेजुबानों को देते हैं ।
मेरा सलाम ऐसे धनवानों को, जो अपनी गरीबी में भी इंसानियत निभाना जानते हैं ।
अनुगुंजा


जन्मदिन मम्मी का

  अगर हो सकता तो, मैं तारें तोड़ लाती, तेरी पैरों की पायल में सजा डालती....  कदमों में "माँ" तेरी जन्नत बसती है मेरी, तेरी हर आहट ...