अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में सहारा ढूंढती माँ,
क्या कहूं अपने बच्चों को कितना याद करती माँ.....
जब डगमगाते कदम मांगे छड़ी का साथ,
वहां क्यों न, औलाद बढ़ाती अपना हाथ....
आज हमारे देश, समाज में वृद्धावस्था में अपनी संतान का माता-पिता को अकेले छोड़ देना या उन्हें एक उदासीन, दुखी जीवन जीने पर विवश करना बढ़ता जा रहा है। लगभग हर न्यूज चैनलों ,समाचारपत्रों में इस प्रकार की खबर पढ़ने या देखने को हमें मिल जाती है....जहां कांपती झुर्रियो वाले चेहरों से ठहर-ठहर कर बहते आंसू अपनी दर्दनाक कहानी सुना देते हैं। कलयुग का ऐसा भयानक रूप मन को ये सोचने पर मजबूर करता है कि एक औलाद अपने बूढ़े माँ-बाप के साथ ऐसा कैसे कर सकती है। कहीं पिता को कमरे में बंद करना,तो कहीं माँ को बिस्तर पर मरने के लिए छोड़ देना....ये तो चंद उदाहरण है,असल में वास्तविकता और डरावनी है।
जब हम किसी वृद्धा-आश्रम में जाते हैं तो वहां अपनी सेकेंड इनिंग(अंतिम चरण) का आनंद लेते कई वृद्ध जन मिल जाएंगे....जो मुस्कुराते हुए अपनी मित्र मंडली में अंताक्षरी खेलते,कैरम-शतरंज खेलते दिखेंगे, पर जब आप उनसे उनसे थोड़ी देर बात करेंगे तो उस मुस्कुराहट के पीछे छुपा दर्द आपको दिख जाएगा। वो दर्द जो आज भी आश्रम के गेट के बाहर इस उम्मीद से झांकता है कि कहीं उनकी संतान उन्हें लेने तो नहीं आ गई है।
जब से संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार ने जगह लिया है तब से लोग " परिवार " का मतलब पति- पत्नी और बच्चे तक ही सीमित होकर रह गया है,इसमें से दादा-दादी का स्थान नगण्य हो गया है। आज की औलाद को उनके जीवन में अपने माता-पिता का दखल,रोकटोक पसंद नहीं है,उन्हें अपने तरीके से अपनी जिंदगी जीना है। माँ-बाप को अपने सिर पर छत को बचाए रखने के लिए अपनी औलाद के हिसाब से ढलना पड़ रहा है,जैसा वो चाहते हैं वैसा करना पड़ रहा है। ये सब इसलिए ताकि उनका बुढ़ापा सड़कों पर भटकने का मोहताज न बन जाए।
जब हम छोटे होते हैं और हमें ठेस लगती है या हम गिर जाते हैं,तो फौरन हमारी माँ हमें उठाती है और अपनी ममतामयी गोद में बैठाकर बहुत सारा प्यार संग हौसला देती है पर जब उसी माँ को बुढ़ापे में चोट लगती है तो वहां उसे सहारा देकर प्यार करने वाला कोई नहीं होता।
ऐसा नहीं है कि हमारे देश की हर औलाद ऐसी निर्दयी है....अभी भी कुछ संतान अपने माँ-बाप को ईश्वर की तरह पूजती है....लेकिन ऐसे संतानों की संख्या घास में सूई खोजने जैसा है।
अनुगुंजा

