रविवार, 24 अप्रैल 2022

माँ

 

" माँ " शब्द में है समाया ये संसार,                                   
 
जाने क्यों इस शब्द को सुनते ही आते आंसू ....               

आंसुओं में भावनाओं का सागर है " माँ ",  
 
इस रिश्ते के वर्णन में नौ महीने भी कम पड़ जाते....  

" माँ " की गोद में सिर रख पाते हैं हम सुकून,                           
ऐसी शांति स्वर्ग में भी नहीं है मिल पाती....                   

हमारे बालों में जब " माँ " अपनी अंगुली है फेरती,                    
चारों धाम का दर्शन एक पल में है मिल जाता....               

 इस दुनिया में केवल हमारे लिए है सोचती " माँ ",                 

उसकी पूरी जिन्दगी हमारे चारों ओर है घूमती....           

हमारी तकलीफ को बिना बोले " माँ " है सुन लेती,               

उसके हाथ केवल हमारे लिए दुआ में है उठते....          

भगवान से भी हमारे लिए है लड़ जाती " माँ ",                   

अपने लिए कभी कुछ नहीं है मांगती " माँ "....                  

इस जहान में खुशनसीबों को है मिलता " माँ " का साथ,  

 किस्मत वाले ही थाम पाते " माँ " का हाथ                       

 " माँ " के कंधों पर हमारा बचपन जीवन अंत तक खेलता,        
 हमारा भार भी " माँ " को मुस्कुराहट ही दे जाता....        

कभी नहीं थकती है " माँ ",                                          

अपने बच्चे के आँखों में खुद को देखती है " माँ "....

अनुगुंजा

रविवार, 17 अप्रैल 2022

कौन है बोझ?

 

बेटियों को कोई पराया धन कहता है, तो कोई कहता है "बोझ"... कन्या के जन्म पर खुशी में थाली की जगह अपना सिर पीटते हैं हमारे समाज के ठेकेदार कहे जाने वाले लोग।माँ की कोख से लेकर मृत्यु की शय्या तक बेटी,अपने वजूद की लड़ाई ही लड़ती रहती है।अगर किसी माँ ने बेटा को जन्म न देकर,बेटी को जन्म दिया होता है...तो पूरे परिवार के सामने वो माँ बिना किसी अपराध के दोषी बन जाती है...या हम ये कहें कि पुत्री को जन्म देकर,जैसे वो पापी बन गई है। बेटी जन्म के बाद से ही माँ पर दुबारा माँ बनकर पुत्र को जन्म देने का अघोषित दबाब बनाना शुरू हो जाता है...और फिर क्या बेटे के इंतजार में बेटियों की लम्बी लाइन खड़ी हो जाती है।

मुझे समझ में नहीं आता कि हम कौन से समाज या परिवार में जी रहे हैं,जिसकी सोच इतनी बीमार और कुंठित है कि ये बेटी के महत्व को आजतक समझ ही नहीं सका। आज बेटी हर क्षेत्र में हर मायनों में बेटों से कहीं बेहतर है,बेटी अपनी हर जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभा रही है।बेटी,बहन,पत्नी,बहू,माँ....जैसी हर भूमिका में नारी अपना सौ प्रतिशत दे रही है...वो बिना किसी सैलरी के मल्टी टास्किंग जॉब कर रही है वो भी साल के 365 दिन....फिर भी उसके काम में नुक्स निकाले जाते हैं,ये सही नहीं,वो सही नहीं...इसी के चारों ओर लड़की नाचती रहती है।

कहते हैं अब समय बदला रहा....मैं कहती हूँ समय जरूर बदला है पर पुरूषप्रधान सोच वहीं की वहीं है।बेटे को कुल का दीपक कहा जाता है पर लोग ये भूल जाते हैं कि अंधेरा "रौशनी" से ही मिटता है।

मैंने रास्ते में एक छोटी बच्ची को सिर पर बोझ उठाए, हाईवे पार करते हुए देखा,तो मैं इस सोच में पड़ गई कि "कौन है बोझ?" 

---- अनुगुंजा

जन्मदिन मम्मी का

  अगर हो सकता तो, मैं तारें तोड़ लाती, तेरी पैरों की पायल में सजा डालती....  कदमों में "माँ" तेरी जन्नत बसती है मेरी, तेरी हर आहट ...