" माँ " शब्द में है समाया ये संसार,
अनुगुंजा
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" माँ " शब्द में है समाया ये संसार,
अनुगुंजा
बेटियों को कोई पराया धन कहता है, तो कोई कहता है "बोझ"... कन्या के जन्म पर खुशी में थाली की जगह अपना सिर पीटते हैं हमारे समाज के ठेकेदार कहे जाने वाले लोग।माँ की कोख से लेकर मृत्यु की शय्या तक बेटी,अपने वजूद की लड़ाई ही लड़ती रहती है।अगर किसी माँ ने बेटा को जन्म न देकर,बेटी को जन्म दिया होता है...तो पूरे परिवार के सामने वो माँ बिना किसी अपराध के दोषी बन जाती है...या हम ये कहें कि पुत्री को जन्म देकर,जैसे वो पापी बन गई है। बेटी जन्म के बाद से ही माँ पर दुबारा माँ बनकर पुत्र को जन्म देने का अघोषित दबाब बनाना शुरू हो जाता है...और फिर क्या बेटे के इंतजार में बेटियों की लम्बी लाइन खड़ी हो जाती है।
मुझे समझ में नहीं आता कि हम कौन से समाज या परिवार में जी रहे हैं,जिसकी सोच इतनी बीमार और कुंठित है कि ये बेटी के महत्व को आजतक समझ ही नहीं सका। आज बेटी हर क्षेत्र में हर मायनों में बेटों से कहीं बेहतर है,बेटी अपनी हर जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभा रही है।बेटी,बहन,पत्नी,बहू,माँ....जैसी हर भूमिका में नारी अपना सौ प्रतिशत दे रही है...वो बिना किसी सैलरी के मल्टी टास्किंग जॉब कर रही है वो भी साल के 365 दिन....फिर भी उसके काम में नुक्स निकाले जाते हैं,ये सही नहीं,वो सही नहीं...इसी के चारों ओर लड़की नाचती रहती है।
कहते हैं अब समय बदला रहा....मैं कहती हूँ समय जरूर बदला है पर पुरूषप्रधान सोच वहीं की वहीं है।बेटे को कुल का दीपक कहा जाता है पर लोग ये भूल जाते हैं कि अंधेरा "रौशनी" से ही मिटता है।
मैंने रास्ते में एक छोटी बच्ची को सिर पर बोझ उठाए, हाईवे पार करते हुए देखा,तो मैं इस सोच में पड़ गई कि "कौन है बोझ?"
---- अनुगुंजा
अगर हो सकता तो, मैं तारें तोड़ लाती, तेरी पैरों की पायल में सजा डालती.... कदमों में "माँ" तेरी जन्नत बसती है मेरी, तेरी हर आहट ...