कौन है कहता कि नारी होती कमजोर....है ये सफेद झूठ कि हर कदम पर चाहे नारी सहारा...
घरों में काम करने वाली बाई से लेकर बड़े-बड़े दफ्तरों में ऊँचे पद पर बैठी कोई महिला ऑफिसर....सब यही हर बार कहती है कि " नारी का रूप सबल है "
सुबह सुबह जब हम बस में यात्रा करते हैं तो हम ये पाते हैं कि भारी तादात में महिलाएं शिक्षक हैं....लगभग पूरी बस अलग अलग स्कूलों में जाने वाली महिला शिक्षकों से भरी रहती है....बस पर चढ़ती-उतरती महिलाएं अपने अपने घर और स्कूल के बीच की भागदौड़ के अनुभवों को बांटती हैं...साथ ही साथ विभिन्न सामाजिक समस्याओं पर खुलकर अपने विचार बेखौफ होकर अभिव्यक्त करती है। उनकी मुस्कुराहट,खिलखिलाती हँसी बस यात्रा को बहुत आनंदायक बना देती है। सभी महिलाएं बस पर अनजान होकर भी बहुत अपनी लगती है,उनका एक-दूसरे के साथ बर्ताव बहुत प्यारा लगता है।बस पर हमें यही महसूस होता है कि वास्तव में हम " नारी " देश की आधी आबादी हैं और हम पर घर-परिवार,समाज,देश और खासतौर से "शिक्षा" की जिम्मेदारी है।
ये जरूरी नहीं की बस पर सभी महिलाएं शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ी हो,कई महिलाएं सब्जीवाली भी होती है जो अपने माथे पर अपने कर्तव्य का बोझा उठाते हुए बस पर चढ़ती हैं....
ये अनुभव मेरे लिए बहुत नया नया है...पर मन को बहुत सुकून देने वाला है...इसलिए सोचा कि आप सबसे साझा करूं।
मेरी कविता----
है सशक्त तू,
क्योंकि तू है नारी.....
नहीं है तुझमें छिपी कोई लाचारी,
तू है खुलकर जीने की अधिकारी....
देवी का रूप तुझमें है समाया,
फिर समाज ने तुझे क्यों बेबस पाया.....
तेरे कंधे देते हैं सबको बहुत मजबूत सहारा,
फिर तुझे किसने अबला पुकारा....
घर-आंगन की तुलसी से लेकर चौखट की मर्यादा तू,
आंचल से बरसती ममता की बारिश तू.....
बेटी,बहन,बहू,पत्नी बनकर तू बस कर्तव्य निभाती जाती,
लेकिन तेरे मन की आवाज दुनिया क्यों न सुन पाती....
सबकी इच्छा तू चुपचाप पूरी करती जाती,
पर अपनी बारी पर तू क्यों मौन हो जाती....
अपनी अभिव्यक्ति को व्यक्त कर नारी,
नहीं है तू माटी की गुड़िया बेचारी....
-------- अनुगुंजा

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