आज सुबह सुबह मेरी काम वाली बाई हाथों में एक थैला लिए आई और बोली " बाप रे बाप !!! ई धनिया के पत्ता पचास रूपये देलई ह...अतेक महंगाई में का खतई गरीब आदमी "....ये बोलकर वो लग गई अपने काम में....असल में मम्मी ने ही उससे धनिया का पत्ता मंगवाया था,सोयाबिन की सब्जी में डालने के लिए,मेरी मम्मी बहुत मस्त सोयाबिन की सब्जी बनाती है...मैं चाह कर भी मम्मी जैसी सब्जी नहीं बना पाती हूँ...शायद इसे ही माँ का प्यार कहते हैं जो उसके बनाए खाने के स्वाद से झलकता है। मेरी नानी जैसी आलू टमाटर की सब्जी बनाती थी वैसी सब्जी मैंने आजतक नहीं खाई..2013 में मेरी नानी गुजर गई पर उनके हाथ का स्वाद आज भी मेरी जुबां पर है।बहुत याद आती है नानी की।मेरी नानी मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी...मेरी हर कविता,लेख को बहुत ध्यान से सुनती थी और सटीक कमेंट भी देती थी।मेरी नानी मेरे साथ रोज शाम 7:30 बजे BBC रेडियो सुनती थी....उसे देश-दुनिया की पूरी खबर रहती थी,इराक में क्या हुआ? पाकिस्तान का विदेश मंत्री कौन है? सब उसको पता रहता था। मेरी नानी सिर्फ अपना नाम लिखना जानती थी...पर रोज गीता पढ़ती थी,मुझसे पहले न्यूज पेपर वही पढ़ती थी।एक दिन मेरे सिर पर हाथ रखकर नानी ने आशीर्वाद दिया और बोली कि तुम एक दिन हिन्दुस्तान की राष्ट्रपति बनोगी....तब मैं खूब हंसी थी।मेरी नानी की दुआओ की कोई सीमा नहीं थी।आज आप सबसे बात करते हुए अचानक नानी की याद आ गई.....सो शेयर कर लिया।
जैसा की आप सब जानते हैं कि मेरे घर में पेंटिंग चल रही है, हमारे घर का पूजा वाला कमरा सबसे बड़ा है और बहुत सारा सामान से भरा हुआ है...हम सब ये सोच कर ही सहम जाते थे कि उस कमरे की पेंटिंग कैसे होगी? ,क्योंकि पेंटिंग से पहले हमें पूरा कमरा खाली करना होगा,कैसे होगा ये विशाल काम?.....हम एक तरह से आजकल आजकल कर टाल रहे थे उस कमरे को खाली कराने वाले काम को....हमें खासकर मुझे तो ये बहुत मुश्किल काम लग रहा था,मेरी मम्मी की तो रातों की नींद ही उड़ गई थी...वो बोल रही थी ये सामान कहां रखेंगे? वो सामान कहां रखेंगे?......ऊपर से बेहिसाब की बारिश...जो पहले गुलाब चक्रवात के रूप में आई और अब शाहिन चक्रवात के रूप में बस बरस रही है और पूरे शहर को डूबा रही है।
आज सुबह जब पेंटर सब आए,तो मैंने भी मन ही मन में सोचा कि ये " मुझसे नहीं होगा " क्योंकि मेरे पीठ में झुठ्ठा(दर्द) घुस गया था,जिसके बारे में मैं आपको पिछले ब्लॉग में बता चुकी हूँ।सांस लेने में भी मुझे दर्द हो रहा था...और अभी भी हो रहा है।लेकिन जैसे ही काम शुरू हुआ,अचानक मैं दर्द- वर्द सब भूल गई और लग गई कमरे को खाली करने के अभियान में...मैंने अकेले ही पेंटरों की सहायता से न सिर्फ पूरा कमरा खाली करवा लिया,बल्कि कमरे की दीवारों पर पुट्टी देने का काम भी शुरू हो गया....
जब मैंने खाली हुए कमरे को देखा तो यही सोचा कि इस काम के लिए मैं इतनी चिंतित थी और give up कर चुकी थी...उस वक्त मैंने यही निश्चय किया कि अब मैं ये कभी नहीं सोचूंगी कि " मुझसे नहीं होगा "....मुझसे ही होगा और मैं ही करूंगी,इस विश्वास पर अडिग रहूंगी।
असल में वक्त में बहुत ताकत होती है ये कमजोर से कमजोर इंसान को परिस्थिति की आग में तपाकर लोहा बना देती है।कोई जन्मजात मजबूत(बोल्ड) नहीं होता,समय उसे बना देता है।इसलिए हमें हर चुनौती का सामना डटकर करना चाहिए,उससे भागना नहीं चाहिए और कभी नहीं सोचना चाहिए कि मुझसे नहीं होगा.....
अंत में यही कहूंगी कि " चुनौती हमें आजमाती है "....चलिए आज बस इतना ही कल फिर मिलते हैं।
------- अनुगुंजा
ये रेखाचित्र मैंने बनाया...पेन से...

Thanks...please share
जवाब देंहटाएंSuperb painting
जवाब देंहटाएंThank you...please share my blog
हटाएं👍👍👍👍👍
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